7 मार्शलों की बैकडोर एंट्री, चयनित अभ्यर्थी अब तक नियुक्ति का इंतजार करते रहे
विधानसभा सचिवालय में मार्शल के पदों पर भर्ती का मामला करीब ढाई दशक बाद भी खत्म नहीं हुआ है। साल 2001 में भर्ती निकली। अभ्यर्थियों ने फिजिकल और रिटेन परीक्षा दी। प्रक्रिया पूरी होने के बाद 7 पदों की फाइनल चयन सूची जारी हुई। चयनित अभ्यर्थियों को अब सिर्फ नियुक्ति पत्र का इंतजार था।
सरकार बदली, कहानी पलटी
चयनित अभ्यर्थियों को जॉइनिंग मिलती, उससे पहले सरकार बदल गई। इसके बाद आरोप है कि पहले से चयनित 7 अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने के बजाय दूसरी व्यवस्था से 7 लोगों को मार्शल के पद पर एंट्री दे दी गई। यानी परीक्षा देकर मेरिट में आए अभ्यर्थी बाहर रह गए और कथित बैकडोर एंट्री वाले नौकरी करने लगे।
17 साल चला मामला
इसके बाद यह विवाद कोर्ट तक पहुंच गया। मामला करीब 17 साल तक चला। आखिरकार कोर्ट के आदेश के बाद बैकडोर से नियुक्त किए गए लोगों को नौकरी से हटाया गया। लेकिन असली सवाल यहीं से खड़ा हुआ, जब पुरानी चयन सूची मौजूद थी, तो उसमें चयनित अभ्यर्थियों को नौकरी क्यों नहीं दी गई?
पुरानी सूची की जगह नई भर्ती
बैकडोर नियुक्तियां हटने के बाद भी 2001 में चयनित अभ्यर्थियों की राह साफ नहीं हुई। उन्हें नियुक्ति देने के बजाय विधानसभा सचिवालय ने ऑल इंडिया लेवल पर सिर्फ 5 पदों के लिए नई भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी। नई भर्ती की प्रक्रिया भी पूरी कर ली गई है। ऐसे में वर्षों पहले चयनित अभ्यर्थी आज भी नियुक्ति पत्र की बाट जोह रहे हैं।
अभ्यर्थियों का सवाल क्या है?
अभ्यर्थियों का सवाल सीधा है, जब चयन प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और 7 पदों की फाइनल सूची जारी हो चुकी थी, तो उन पर फैसला क्यों नहीं हुआ? अगर बाद में पद खाली हुए, तो पुराने चयनित अभ्यर्थियों के दावे पर विचार क्यों नहीं किया गया? क्या नई भर्ती पुराने चयनित अभ्यर्थियों के अधिकार को खत्म कर देती है?
भविष्य पर भारी पड़ा इंतजार
यह सिर्फ नौकरी का विवाद नहीं है। इन अभ्यर्थियों की उम्र, करियर और अवसर भी इस लंबे इंतजार में निकल गए। 2001 में नौकरी की तैयारी कर रहे अभ्यर्थी आज जीवन के अलग पड़ाव पर पहुंच चुके हैं। सवाल यह भी है कि इतने साल तक सरकारी प्रक्रिया और कानूनी लड़ाई के बीच उनका नुकसान कौन भरेगा?
कोर्ट की शरण में अभ्यर्थी
विधानसभा सचिवालय के जवाब और नियुक्ति की प्रक्रिया से परेशान कुछ अभ्यर्थियों ने अब कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। मामला सिर्फ 7 पदों का नहीं है। सवाल सरकारी भर्ती में चयन, मेरिट और प्रक्रिया की विश्वसनीयता का है। अभ्यर्थियों को इंतजार है कि आखिर 25 साल पुरानी चयन सूची का भविष्य क्या होगा।
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