बस्तर में 66 स्कूल डेंजर घोषित, जान दांव पर लगाने को मजबूर मासूम
NEWS IN SHORT
- बस्तर जिले के 66 सरकारी स्कूल भवन 'डेंजर' घोषित।
- मरम्मत के लिए शिक्षा विभाग के पास बजट नहीं है।
- बारिश में टपकती छतों के कारण पालक बेहद चिंतित हैं।
- 113 बच्चे एक छोटे से आंगनबाड़ी में पढ़ रहे।
- शासन से अब तक फंड की मंजूरी नहीं मिली है।
NEWS IN DETAIL
सरकार का नारा है "पढ़ेगा इंडिया, तो बढ़ेगा इंडिया", लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में इस नारे की जमीनी हकीकत डराने वाली है। जून महीने से नया शिक्षा सत्र शुरू होने में अब एक महीने से भी कम का वक्त बचा है, लेकिन जिले के 66 सरकारी स्कूल भवनों की हालत इतनी बदतर है कि शिक्षा विभाग ने खुद इन्हें डेंजर जोन यानी अति जर्जर घोषित कर दिया है। ये इमारतें इतनी कमजोर हो चुकी हैं कि कभी भी ढह सकती हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इन खतरनाक भवनों की मरम्मत के लिए विभाग के पास बजट ही नहीं है।
पढ़ाई छोड़ सूखी जगह ढूंढते हैं बच्चे
मानसून की दस्तक करीब है और टपकती छतों व दरकती दीवारों को देखकर बच्चों के माता-पिता खौफ में हैं। पालकों को डर है कि बारिश के दौरान कोई बड़ा हादसा न हो जाए, इसी वजह से कई ग्रामीणों ने बच्चों को स्कूल भेजने से कतराना शुरू कर दिया है। ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों का एक ही हाल है। बारिश शुरू होते ही छतों से पानी टपकना आम बात है, जिसके बाद बच्चे पढ़ाई छोड़कर कमरों में सूखी जगह तलाशने को मजबूर हो जाते हैं। इस बदहाली से केवल छात्र ही नहीं, बल्कि शिक्षक भी मानसिक तनाव में हैं।
कहीं आंगनबाड़ी में 113 बच्चे
डोंगरीगुड़ा (तेली मारेंगा): यहाँ का प्राथमिक शाला भवन 1961 में बना था, जो अब खंडहर बन चुका है। स्कूल में 113 बच्चे दर्ज हैं, जिन्हें बैठने की जगह न होने के कारण पास के एक छोटे से आंगनबाड़ी केंद्र में शिफ्ट किया गया है। विडंबना देखिए कि जिस कमरे में सिर्फ 20 बच्चों की जगह है, वहाँ 113 मासूम ठूंस-ठूंस कर बैठने को मजबूर हैं।
तोकापाल (बारूपाटा): यहाँ का 56 साल पुराना स्कूल भवन मौत का कुआं बना हुआ है। सरकारी फाइलों में इसे 'अति जर्जर' दर्ज कर विभाग ने पल्ला झाड़ लिया है, लेकिन सुधार के नाम पर एक ईंट नहीं रखी गई। यहाँ 29 बच्चे रोज डर के साए में भविष्य संवार रहे हैं।
सुरीपाटा प्राइमरी स्कूल: सड़क निर्माण के बाद इस स्कूल का परिसर नीचे हो गया है। बारिश होते ही पूरा स्कूल तालाब बन जाता है। मजबूरी में बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें दूसरे गांव (डिमरापाल) के स्कूल में शिफ्ट करना पड़ता है।
बदहाली को लेकर DEO ने कही कई बातें
इस बदहाली को लेकर बस्तर के जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) बीआर बघेल ने कहा की "हमने जिले के 60 से अधिक अति जर्जर प्राथमिक और मिडिल स्कूलों की सूची डीपीआई (DPI) को भेजी है। स्कूल प्रबंधक हर साल मरम्मत के लिए रिमाइंडर भेजते हैं, जिसकी जानकारी शासन को दी जा चुकी है। हालांकि, मरम्मत के लिए अभी फंड की मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन उम्मीद है कि जल्द ही फंड मिल जाएगा।"
अधिकारियों के इस 'जल्द ही' के भरोसे के बीच, नए सत्र में भी बस्तर के मासूम बच्चे इन्हीं खतरनाक छतों के नीचे बैठने को मजबूर होंगे। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा?
निष्कर्ष
बस्तर के सरकारी स्कूलों की यह बदहाली शिक्षा व्यवस्था के दावों की पोल खोलती है। बजट की कमी के कारण नौनिहालों के भविष्य और जान दोनों को दांव पर लगाया जा रहा है। यदि मानसून से पहले प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो यहाँ कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है।
FAQ
Q1. बस्तर में कितने स्कूल भवन खतरनाक हैं?
Ans. 66 स्कूल भवन अति जर्जर घोषित हैं।
Q2. जर्जर स्कूलों में बच्चे कहाँ पढ़ रहे हैं?
Ans. तंग आंगनबाड़ियों, खंडहरों या दूसरे गांवों के स्कूलों में।
Q3. स्कूलों की मरम्मत कब तक होगी?
Ans. शासन को सूची भेजी गई है, फंड मिलते ही काम होगा।
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