नक्सलवाद से निकलकर विकास की राह पर बस्तर; जहां रातें डर में गुजरती थीं, अब वहां सपने जगमगा रहे

The Sootr | Mar 26, 2026, 15:27 IST
Impact Feature
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में बस्तर अब नक्सलवाद के अंधेरे से बाहर निकलकर विकास, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की नई रोशनी की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है।

Raipur. छत्तीसगढ़ में बड़ा बदलाव हो रहा है। जो इलाके कभी नक्सल हिंसा, डर और पिछड़ेपन के लिए जाने जाते थे, वे अब विकास, भरोसे और नई उम्मीदों की पहचान बन रहे हैं। खासकर बस्तर क्षेत्र में यह बदलाव साफ दिखाई दे रहा है, जहां वर्षों से फैला नक्सलवाद अब खात्मे की ओर है और लोग सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं।



मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार और केंद्र सरकार के सहयोग से चल रहे अभियान का असर जमीन पर दिखने लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को खत्म करने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए प्रदेश में मिशन मोड में काम चल रहा है।



आंकड़ों में दिख रहा बड़ा बदलाव

जनवरी 2024 से फरवरी 2026 के बीच की स्थिति इस बदलाव की गवाही देती है। इस अवधि में करीब 532 नक्सली मारे गए। 2700 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया और 2004 माओवादी गिरफ्तार किए गए।



सुरक्षा बलों ने लगभग 1100 अत्याधुनिक हथियार भी बरामद किए हैं, जिनमें AK-47, INSAS, SLR और मोर्टार जैसे हथियार शामिल हैं। मारे गए नक्सलियों में संगठन के छह पोलिट ब्यूरो और केंद्रीय समिति के सदस्य शामिल रहे हैं, जबकि 17 स्पेशल जोनल कमेटी के सदस्यों को भी खत्म किया गया है। ये आंकड़े बताते हैं कि नक्सलवाद अब खात्मे की ओर है।



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आत्मसमर्पण के बाद नई जिंदगी

आज छत्तीसगढ़ में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए सात पुनर्वास केंद्र चल रहे हैं। अब तक करीब 1,700 पूर्व नक्सलियों को कौशल प्रशिक्षण देकर मुख्यधारा से जोड़ा गया है। इनमें करीब 410 महिलाएं शामिल हैं।



सरकार ने पुनर्वास को सिर्फ आत्मसमर्पण तक सीमित नहीं रखा है। इसमें रोजगार, सम्मानजनक जीवन और आत्मनिर्भरता को भी शामिल किया गया है। आत्मसमर्पण करने वालों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर, तीन साल तक हर महीने 10 हजार रुपए की सहायता, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर दिए जा रहे हैं।



केस 1: जब 15 नक्सलियों ने हथियार छोड़े

मार्च 2026 में महासमुंद जिले के सीमावर्ती इलाके में सक्रिय 15 सशस्त्र माओवादियों ने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया। इनमें 9 महिलाएं और 6 पुरुष शामिल थे, जिन पर कुल 73 लाख रुपये का इनाम घोषित था। इनका आत्मसमर्पण यह दिखाता है कि अब भटके हुए युवाओं का भरोसा सरकार की नीतियों पर बढ़ रहा है।



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केस 2: स्मार्टफोन और रोजगार किट से नई शुरुआत

फरवरी 2026 में सुकमा के पुनर्वास केंद्र में 70 युवाओं को 5जी स्मार्टफोन और 31 युवाओं को मेसन (राजमिस्त्री) किट दी गई। स्मार्टफोन के जरिए ये युवा अब डिजिटल शिक्षा, ऑनलाइन प्रशिक्षण और सरकारी योजनाओं से जुड़ पा रहे हैं। वहीं मेसन किट से उन्हें रोजगार और स्वरोजगार के मौके मिल रहे हैं।



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केस 3: गोगुंडा गांव में पहली बार जली बिजली

सुकमा जिले का गोगुंडा गांव, जो पहाड़ियों के बीच 650 मीटर ऊंचाई पर बसा है, वहां आजादी के 78 साल बाद पहली बार बिजली पहुंची है। जो गांव कभी अंधेरे और डर में डूबा रहता था, वहां अब रोशनी और उम्मीद है। बच्चों की पढ़ाई शुरू हुई है और लोगों के जीवन में बदलाव दिख रहा है। इस बदलाव के पीछे सरकार और सुरक्षा बलों की संयुक्त कोशिशें हैं, जिन्होंने वहां सुरक्षा कैंप स्थापित कर हालात बदले हैं।



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केस 4: पूर्व नक्सली पहुंचे विधानसभा

हाल ही में 120 आत्मसमर्पित नक्सलियों ने विधानसभा की कार्यवाही देखी है। इनमें झीरम घाटी हमले का मास्टरमाइंड चैतू उर्फ श्याम दादा और 1 करोड़ के इनामी सतीश उर्फ रूपेश भी शामिल थे। यह बताता है कि जो लोग कभी व्यवस्था के खिलाफ थे, वे अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया को समझने और उसमें शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।



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नियद नेल्लानार योजना बनी बदलाव का आधार

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में लागू की गई नियद नेल्लानार योजना इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह बनकर सामने आई है। इस योजना में सुरक्षा और विकास को साथ लेकर काम किया जा रहा है। पहले जहां प्रशासन की पहुंच सीमित थी, अब वहां स्थायी उपस्थिति दिख रही है।



योजना की शुरुआत सुरक्षा कैंपों के आसपास 5 किलोमीटर क्षेत्र से हुई थी, जिसे बढ़ाकर 10 किलोमीटर तक किया गया है। अब 83 फॉरवर्ड कैंपों के आसपास बसे 430 से ज्यादा गांवों तक सरकारी सेवाएं पहुंच रही हैं।



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गांव-गांव तक पहुंच रही सुविधाएं

योजना के तहत स्वास्थ्य, शिक्षा, आंगनबाड़ी, राशन, आयुष्मान कार्ड, आधार, पेंशन, उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास और रोजगार योजनाएं सीधे गांवों तक पहुंचाई जा रही हैं। पहले इन सुविधाओं के लिए लोगों को कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता था।



अब मोबाइल टीम और कैंप के जरिए सेवाएं गांव के पास ही मिल रही हैं। इस अभियान का असर यह हुआ है कि 430 से ज्यादा गांवों में लोग वापस लौटने लगे हैं। जो परिवार डर के कारण गांव छोड़ चुके थे, वे अब फिर से बस रहे हैं।



इन गांवों में सड़क, बिजली और पानी की सुविधाएं तेजी से पहुंच रही हैं। स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र शुरू हो रहे हैं। कई जगह वर्षों बाद तिरंगा फहराया गया है और लोग बिना डर के मतदान कर रहे हैं।



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शिक्षा और रोजगार से मजबूत हो रहा भरोसा

बीजापुर के बकनागुलगुड़ा गांव में नया प्राथमिक स्कूल भवन बना है। पहले यहां झोपड़ी में पढ़ाई होती थी। अब बच्चों को बेहतर माहौल मिल रहा है। सुकमा में मनरेगा और मत्स्य पालन योजनाओं के जरिए आय बढ़ रही है।



150 आजीविका डबरियां बनाई गई हैं और 30 लोगों को मछली पालन का प्रशिक्षण दिया गया है। नम्बी गांव में जल जीवन मिशन के तहत 28.18 लाख रुपये की लागत से सौर ऊर्जा आधारित नलकूप लगाए गए हैं और 76 परिवारों को नल कनेक्शन मिला है।



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डिजिटल कनेक्टिविटी से जुड़ रही दुनिया

सरकार ने डिजिटल कनेक्टिविटी पर भी जोर दिया है। कुंडापल्ली और अबूझमाड़ जैसे इलाकों में पहली बार मोबाइल नेटवर्क पहुंचा है। इससे बैंकिंग, ऑनलाइन पढ़ाई, टेलीमेडिसिन और सरकारी योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंच रही है।



बस सेवा शुरू होने से आवाजाही भी आसान हुई है। यही नहीं, बस्तर अब पर्यटन के नए केंद्र के रूप में उभर रहा है। कुटुमसर गुफा, झरने, जंगल और जनजातीय संस्कृति पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। सरकार ने पर्यटन को उद्योग का दर्जा दिया है और होम स्टे मॉडल को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे स्थानीय लोगों की आय बढ़ रही है।



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बदलाव की नई पहचान

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का कहना है कि पुनर्वास नीति, सुरक्षा बलों की कार्रवाई और विकास योजनाओं के संयुक्त प्रभाव से नक्सल मुक्त बस्तर का सपना तेजी से साकार हो रहा है। आज बस्तर की पहचान बदल रही है।



डर की जगह विश्वास, अंधेरे की जगह रोशनी और हिंसा की जगह विकास ने ले ली है। यह बदलाव सिर्फ सरकारी आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव-गांव में लोगों के जीवन में दिख रहा है। आने वाले समय में यह परिवर्तन और गहरा होगा और छत्तीसगढ़ एक नए दौर की ओर बढ़ेगा।



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