राष्ट्रपति के बस्तर दौरे से पहले वनोपज कर्मियों के लिए नए वादे, चुनावी तैयारी या आदिवासी इलाकों में भरोसा बढ़ाने की कोशिश?
ऐसे में सवाल उठता है कि आदिवासी बहुल बस्तर में कल्याणकारी घोषणाओं की यह टाइमिंग महज संयोग है या सरकार स्थानीय लोगों के बीच अपना भरोसा मजबूत करने की कोशिश कर रही है?
दौरे से पहले बस्तर पर फोकस
राष्ट्रपति के प्रस्तावित दौरे से पहले राज्य सरकार के कार्यक्रमों और फैसलों पर नजर है। 14 अक्टूबर को छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ की 27वीं वार्षिक साधारण सभा में समिति प्रबंधकों और फड़मुंशियों को दो-दो लाख रुपए का सामाजिक सुरक्षा कवच देने का फैसला किया गया। समिति प्रबंधकों के रिटायरमेंट पर एक लाख रुपए की सहायता का भी प्रावधान किया गया है। ये वे कर्मचारी हैं, जो जंगल से जुड़ी वनोपज की व्यवस्था में जमीनी स्तर पर काम करते हैं। अब सवाल यह है कि घोषणा के बाद उन्हें वास्तविक लाभ कब से मिलना शुरू होगा।
लंबित भुगतान अब चर्चा में
बैठक में शहीद महेंद्र कर्मा तेंदूपत्ता संग्राहक सामाजिक सुरक्षा योजना के पुराने लंबित मामलों का भुगतान चरणबद्ध तरीके से करने का निर्णय भी लिया गया। इसके तहत 69 पात्र हितग्राहियों के खातों में सीधे राशि भेजी गई। सवाल यह है कि ये मामले अब तक लंबित क्यों थे और बाकी पात्र परिवारों को भुगतान के लिए कितना इंतजार करना पड़ेगा? जब सामाजिक सुरक्षा की योजना पहले से मौजूद है, तो उसके पुराने प्रकरणों के निपटारे में देरी की वजह भी सामने आनी चाहिए।
चुनावी तैयारी का सवाल क्यों?
बस्तर में आदिवासी समाज, जंगल और वनोपज से जुड़े मुद्दे सीधे आजीविका से जुड़े हैं। ऐसे में कर्मचारियों को आर्थिक सुरक्षा, लंबित भुगतान और नए भवनों की घोषणा का राजनीतिक महत्व भी हो सकता है। आगामी चुनावों को देखते हुए इन फैसलों को सरकार की जनसंपर्क रणनीति के नजरिए से भी देखा जा सकता है। हालांकि, सिर्फ घोषणा की तारीख के आधार पर इसे चुनावी तैयारी कहना जल्दबाजी होगी। सरकार ने इन फैसलों को चुनाव से जोड़कर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है।
भवनों का वादा, अमल की परीक्षा
बैठक में बिना भवन वाली प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाने और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के वन धन विकास केंद्रों के लिए नए भवन बनाने का फैसला भी हुआ। राष्ट्रीय पर्वों के आयोजन के लिए समितियों को अलग बजट देने की बात कही गई है। लेकिन इन योजनाओं की लागत, निर्माण की समयसीमा और लाभार्थियों तक पहुंचने की तारीख स्पष्ट होना बाकी है।
घोषणाओं से आगे क्या होगा?
राष्ट्रपति का प्रस्तावित दौरा बस्तर की जनजातीय परंपराओं और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला सकता है। ऐसे समय में घोषणाएं जरूर हुई हैं, लेकिन असली कसौटी उनका जमीन पर उतरना है। क्या सामाजिक सुरक्षा की राशि समय पर मिलेगी? क्या पुराने भुगतान के सभी मामले निपटेंगे? और क्या समितियों को तय समय में भवन मिलेंगे? बस्तर के लोगों के लिए इन सवालों के जवाब किसी भी घोषणा से ज्यादा मायने रखते हैं।