भाटिया वाइन्स का जहर ; काली हुई शिवनाथ नदी, लाखों मछलियां मरीं

Aishwarya Dwivedi | May 02, 2026, 09:35 IST
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बिलासपुर की भाटिया वाइन्स डिस्टलरी बिना ट्रीटमेंट जहरीला पानी शिवनाथ नदी में बहा रही है। इससे लाखों मछलियां मर गई हैं और 15 गांवों के लोग गंभीर बीमारियों व दुर्गंध से जूझ रहे हैं।

NEWS IN SHORT

  • बिना ट्रीटमेंट जहरीला पानी सीधे शिवनाथ नदी में बहाया गया।
  • प्रदूषण के कारण लाखों मछलियों और जलीय जीवों की मौत।
  • आसपास के 15 गांवों में सांस और चर्म रोग फैला।
  • प्रतिष्ठित भाटिया वाइन्स द्वारा जीरो लिक्विड डिस्चार्ज नियमों का उल्लंघन।
  • राजस्व के लालच में पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की भारी अनदेखी।

NEWS IN DETAIL

एक तरफ सरकार शराब की रिकॉर्ड बिक्री और बढ़ते राजस्व के आंकड़ों पर पीठ थपथपा रही है, वहीं दूसरी ओर बिलासपुर से महज 27 किमी दूर मोहभट्टा-धूमा क्षेत्र में विकास की एक भयावह तस्वीर सामने आई है। यहाँ स्थित भाटिया वाइन्स डिस्टलरी से निकलने वाले जहरीले अपशिष्ट ने न केवल शिवनाथ नदी के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है, बल्कि 15 गांवों के हजारों लोगों का जीना दूभर कर दिया है।



नीली शिवनाथ हुई काली, लाखों मछलियों की मौत

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार फैक्ट्री से निकलने वाले स्पेंट वाश (अम्लीय पानी) को बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे नदी-नालों में बहाया जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि कभी निर्मल रहने वाली शिवनाथ नदी अब पूरी तरह काली पड़ चुकी है।



विषाक्त पानी के कारण नदी में पलने वाले लाखों जीव-जंतु और मछलियाँ दम तोड़ रही हैं। आलम यह है कि किनारे पर मरी हुई मछलियों का अंबार लगा है, जिससे उठने वाली दुर्गंध ने आसपास के वातावरण को और अधिक प्रदूषित कर दिया है।



70 करोड़ बचाने के लिए प्रकृति से खिलवाड़

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार,1 लीटर शराब बनाने की प्रक्रिया में लगभग 15 लीटर गंदा पानी निकलता है। आबकारी नीति के तहत जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) और ट्रीटमेंट प्लांट अनिवार्य है। एक प्रभावी ट्रीटमेंट प्लांट (ZLD, ETP, STP) लगाने में लगभग 70 करोड़ रुपए का निवेश होता है, और इसके संचालन में भारी बिजली और मेंटेनेंस खर्च आता है। इसी खर्च को बचाने के लिए डिस्टलरी प्रबंधन रात के अंधेरे में हफ्ते में दो-तीन दिन जहरीला पानी खुले में छोड़ देता है।



15 गांवों में 'सांसों का संकट' और सामाजिक बहिष्कार

फैक्ट्री के आसपास के गांव जैसे मोहभट्टा, धूमा, खजरी, सारगांव और मदकू के लोग दोहरी मार झेल रहे हैं। ग्रामीणों को सांस की बीमारियाँ और त्वचा रोग (खुजली) हो रहे हैं। कई ग्रामीण इसी फैक्ट्री में रोजगार के कारण चुप्पी साधे हुए हैं। आरोप है कि काम करने वालों को चुप रखने के लिए प्रतिदिन शराब भी दी जाती है। दुर्गंध और बीमारी के डर से अब बाहरी लोग इन गांवों में वैवाहिक संबंध बनाने से भी कतराने लगे हैं।



हाईकोर्ट की कार्रवाई भी बेअसर

गौरतलब है कि एक साल पहले हाईकोर्ट ने नियमों के उल्लंघन पर इस फैक्ट्री को बंद करने का आदेश दिया था। कुछ समय तक सुधार दिखा, लेकिन अब फिर से वही स्थिति बन गई है। हैरानी की बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण मंडल और स्थानीय प्रशासन की नाक के नीचे नदी का पानी काला हो रहा है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल आश्वासन मिल रहे हैं।



"डिस्टलरी में पानी ट्रीटमेंट का स्पष्ट नियम है। अगर कोई अपशिष्ट बाहर फेंक रहा है, तो जांच कर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।" — राजु अगासीमनी, छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल



निष्कर्ष

क्या राजस्व की प्राप्ति जनहानि और प्राकृतिक विनाश की कीमत पर होनी चाहिए? यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो शिवनाथ नदी केवल एक 'गंदा नाला' बनकर रह जाएगी और भाटिया वाइन्स के आसपास के गांव रहने लायक नहीं बचेंगे।



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