नक्सलियों के नाम पर 45 करोड़ का सड़क घोटाला, 24 सड़कें कागजों में, केंद्र को झूठा सबूत
छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की आड़ में अधिकारियों और ठेकेदारों ने 45 करोड़ का घोटाला किया है। बीजापुर में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत स्वीकृत 24 सड़कों का निर्माण जमीन पर नहीं हुआ, लेकिन सरकारी कागजों में काम पूरा दिखाकर भुगतान कर दिया गया। अब जब जिम्मेदार अफसरों से जवाब मांगा जा रहा है तो सफाई में नक्सलियों का नाम सामने आ रहा है। सवाल यह है कि सड़क बनी ही नहीं तो उसे नक्सलियों ने तोड़ा कैसे?
मिट्टी डाली, करोड़ों निकाल लिए
मामले में आरोप है कि सड़कों के नाम पर मौके पर सिर्फ मिट्टी का काम किया गया और निर्माण की पूरी राशि निकाल ली गई। केंद्रीय पोर्टल पर भी काम से जुड़ी प्रविष्टियां दर्ज की गईं। यदि जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सिर्फ सरकारी पैसे की गड़बड़ी नहीं, बल्कि केंद्र को भेजी गई जानकारी की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल होगा। सरकारी रिकॉर्ड में सड़क पूरी और जमीन पर सड़क गायब—यह विरोधाभास अब जांच के केंद्र में है।
अफसरों की सफाई में नक्सली एंगल
मामले में 25 इंजीनियरों और अफसरों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। तीन अधिकारियों की गवाही भी हो चुकी है। सामने आई जानकारी के मुताबिक, अधिकारियों ने दावा किया कि सड़क का निर्माण नियमों के अनुसार हुआ था, लेकिन बाद में नक्सलियों ने उसे खराब कर दिया। इस दावे की जांच जरूरी है, क्योंकि मौके पर बजरी, सीमेंट या सड़क निर्माण के दूसरे ठोस निशान नहीं मिलने का सवाल उठ रहा है। जांच में कथित तौर पर दूसरी जगह की तस्वीरें साझा किए जाने की बात भी सामने आई है।
आवापाली-कोटापाली रोड पर सवाल
जांच के दौरान आवापाली-कोटापाली मार्ग की स्थिति ने भी सवाल खड़े किए। मौके पर डामर की सड़क और लोक निर्माण विभाग का बोर्ड मिला। हालांकि, आसपास पहले सड़क बनाए जाने के प्रमाण नहीं मिले। स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, यहां पहले कच्चा रास्ता था और नक्सली गतिविधियों के कारण आवाजाही कम रहती थी। अब सवाल है कि जिस सड़क के लिए पहले भुगतान हो चुका था, उसका निर्माण आखिर कहां हुआ था?
25 अफसरों पर कार्रवाई की तैयारी
सरकार ने जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगा है। इनमें अधीक्षण अभियंता, कार्यपालन अभियंता, सहायक अभियंता और उप अभियंता स्तर के अधिकारी शामिल हैं। सूची में पांच सेवानिवृत्त अधिकारी भी बताए गए हैं। जवाब संतोषजनक नहीं मिलने पर उनकी पेंशन पर कार्रवाई की जा सकती है। संविदा पर कार्यरत उप अभियंता भी कार्रवाई के दायरे में हैं। हालांकि, अंतिम जिम्मेदारी तय होना जांच और विभागीय प्रक्रिया के बाद ही संभव होगा।
15 ठेकेदारों से होगी पूरी वसूली
कागजों में काम दिखाकर भुगतान लेने वाले 15 ठेकेदारों और फर्मों से राशि वसूलने के निर्देश दिए गए हैं। समय सीमा में पैसे वापस नहीं करने पर एफआईआर की चेतावनी दी गई है। यह कार्रवाई बताती है कि मामला केवल नोटिस तक सीमित रखने के बजाय आर्थिक वसूली तक ले जाने की तैयारी है। लेकिन असली सवाल यही है कि सरकारी खजाने से पैसा निकलने से पहले साइट की जांच किसने की और भुगतान की मंजूरी किस आधार पर दी?
नक्सल प्रभावित क्षेत्र या सिस्टम की ढाल?
नक्सल प्रभावित इलाकों में सड़क निर्माण मुश्किल जरूर है, लेकिन यही मुश्किल सरकारी रिकॉर्ड में गड़बड़ी का बहाना नहीं बन सकती। अगर सड़क बनी थी तो उसकी तस्वीरें, माप पुस्तिका, गुणवत्ता जांच और भुगतान से जुड़े दस्तावेज मौजूद होने चाहिए। अगर सड़क नक्सलियों ने तोड़ी थी तो निर्माण के सबूत और नुकसान का रिकॉर्ड कहां है? जांच को इन सवालों का जवाब तलाशना होगा।
जांच के बाद कार्रवाई कितनी दूर?
पंचायत विभाग के सचिव भीम सिंह के मुताबिक, 25 अधिकारियों को शो-कॉज नोटिस और 15 ठेकेदारों से वसूली के निर्देश दिए गए हैं। समय पर राशि नहीं लौटाने पर एफआईआर की बात कही गई है। अब देखना होगा कि जांच केवल कागजों की कार्रवाई बनकर रह जाती है या जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों से वास्तविक वसूली भी होती है। बीजापुर की 24 सड़कों का यह मामला सरकारी निगरानी और जवाबदेही की बड़ी परीक्षा है।
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