नैनो यूरिया और नैनो डीएपी से बदल रही छत्तीसगढ़ की खेती, कम लागत में हो रही बेहतर पैदावार

The Sootr | Jun 24, 2026, 15:15 IST
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छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के उपयोग से पारंपरिक खेती आधुनिक, किफायती और पर्यावरण-अनुकूल बन रही है।

Raipur. छत्तीसगढ़ की खेती तेजी से बदल रही है। राज्य सरकार किसानों को ऐसी कृषि पद्धतियों से जोड़ रही है, जिनसे लागत घटे, उत्पादन बढ़े और जमीन की उर्वरता भी लंबे समय तक बनी रहे। इसी दिशा में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी किसानों के बीच नई उम्मीद बनकर उभरे हैं।



मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में सरकार खेती को अधिक लाभकारी, किफायती और टिकाऊ बनाने पर जोर दे रही है। सरकार का मानना है कि कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ेगा तो किसानों की आय भी बढ़ेगी और खेती का भविष्य भी सुरक्षित होगा। यही वजह है कि प्रदेशभर में किसानों को वैज्ञानिक खेती, आधुनिक उर्वरकों और नई कृषि तकनीकों के प्रति जागरूक किया जा रहा है।



प्रदेश में किसान अब नैनो उर्वरकों का प्रयोग कर रहे हैं और इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। खेती की लागत कम हो रही है, उर्वरकों की खपत घट रही है और उत्पादन पर भी अच्छा असर दिखाई दे रहा है। किसानों के बीच बढ़ती स्वीकार्यता इस बात का संकेत है कि आधुनिक कृषि नवाचारों पर उनका भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है।



मुख्यमंत्री साय का कहना है कि डबल इंजन सरकार कृषि आधुनिकीकरण को प्राथमिकता दे रही है। नैनो उर्वरक कृषि क्षेत्र में नवाचार का महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। ये पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में अधिक सुविधाजनक हैं और किसानों को कम लागत में बेहतर परिणाम देने में मदद कर रहे हैं। इनका परिवहन और भंडारण भी आसान है, जिससे किसानों को अतिरिक्त सुविधा मिलती है।



प्राकृतिक और जैविक खेती की अपील

मुख्यमंत्री साय का कहना है कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग का असर मिट्टी और मानव स्वास्थ्य दोनों पर पड़ता है। उन्होंने किसानों से प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर भी ध्यान देने की अपील की है। उनका मानना है कि पहले गोबर खाद, ढैंचा और अन्य हरी खादों के उपयोग से खेती अधिक टिकाऊ होती थी और जमीन की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती थी। आज जरूरत इस बात की है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक को साथ लेकर खेती को आगे बढ़ाया जाए।



उन्होंने कहा कि वैश्विक परिस्थितियों और उर्वरकों के आयात पर निर्भरता को देखते हुए नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसे विकल्प किसानों के लिए काफी उपयोगी हैं। इनसे लागत कम होती है और मिट्टी की गुणवत्ता पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। कृषि विभाग लगातार किसानों को प्रशिक्षण, प्रदर्शन और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध करा रहा है। विभिन्न जिलों में आयोजित कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को नैनो उर्वरकों के वैज्ञानिक उपयोग की जानकारी दी जा रही है। उन्हें बताया जा रहा है कि किस फसल में, किस समय और किस मात्रा में इनका उपयोग करना चाहिए ताकि अधिकतम लाभ मिल सके।



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जानिए क्या कहते हैं कृषि विशेषज्ञ

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि नैनो उर्वरक खेती को भविष्य के लिए तैयार करने वाली तकनीक हैं। ये फसलों को आवश्यक पोषक तत्व अधिक प्रभावी तरीके से उपलब्ध कराते हैं और पर्यावरण पर दबाव भी कम डालते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के विषय वस्तु विशेषज्ञ (मृदा विज्ञान) डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार बताते हैं कि रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया के अत्यधिक और असंतुलित उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। लंबे समय में इससे मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या भी कम हो सकती है। ऐसे में नैनो उर्वरक एक बेहतर विकल्प के रूप में सामने आए हैं।



उनके अनुसार नैनो यूरिया का उपयोग पत्तियों पर छिड़काव के माध्यम से किया जाता है। पौधे पोषक तत्वों को सीधे अवशोषित कर लेते हैं, जिससे इसकी उपयोग दक्षता पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में कहीं अधिक हो जाती है। वैज्ञानिक अनुशंसाओं के अनुसार 4 मिलीलीटर नैनो यूरिया प्रति लीटर पानी में मिलाकर उपयोग किया जाता है और 500 मिलीलीटर की एक बोतल एक एकड़ क्षेत्र के लिए पर्याप्त होती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि पहला छिड़काव फसल की 30 से 35 दिन की अवस्था में और दूसरा 55 से 60 दिन की अवस्था में किया जाना चाहिए। इससे फसल की वृद्धि और उत्पादन क्षमता में सुधार देखा गया है।



नैनो डीएपी फसलों के लिए फायदेमंद

नैनो डीएपी फसलों को फास्फोरस उपलब्ध कराने का प्रभावी माध्यम है। इसका उपयोग बीजोपचार और छिड़काव दोनों तरीकों से किया जा सकता है। बीजोपचार के लिए 5 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम बीज तथा छिड़काव के लिए 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से उपयोग की सलाह दी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, नैनो उर्वरकों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पोषक तत्व सीधे पौधों तक पहुंचते हैं। इससे उर्वरकों की बर्बादी कम होती है और फसल को अधिक लाभ मिलता है। मिट्टी पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता और उसकी उत्पादक क्षमता लंबे समय तक बनी रहती है।



कृषि क्षेत्र में नैनो तकनीक का बढ़ता उपयोग किसानों के लिए नई संभावनाएं खोल रहा है। पारंपरिक खादों का बड़ा हिस्सा मिट्टी में व्यर्थ चला जाता है, जबकि नैनो उर्वरक पौधों तक पोषण सीधे पहुंचाते हैं। इससे पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता 80 प्रतिशत से अधिक हो जाती है।



यही वजह है कि छत्तीसगढ़ में अब धान, सब्जियों और अन्य फसलों की खेती करने वाले किसान तेजी से नैनो उर्वरकों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। सरकार और कृषि विभाग को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में इसका उपयोग और बढ़ेगा। इससे खेती की लागत घटेगी, उत्पादन बढ़ेगा और छत्तीसगढ़ की कृषि अधिक आधुनिक, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बन सकेगी।



केस-1: आधी हुई खाद की जरूरत, उत्पादन बरकरार

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महासमुंद जिले के ग्राम कोसरंगी के प्रगतिशील किसान भूषण साहू ने खेती में आधुनिक तकनीक अपनाकर यह साबित कर दिया है कि सही वैज्ञानिक पद्धति से कम लागत में बेहतर खेती संभव है। उन्होंने धान की खेती में पारंपरिक दानेदार उर्वरकों पर निर्भरता घटाकर नैनो डीएपी और नैनो यूरिया प्लस का उपयोग शुरू किया और इसके सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए।



भूषण बताते हैं कि खरीफ 2024 के दौरान कृषि विभाग और इफको महासमुंद के अधिकारियों ने उन्हें नैनो यूरिया के प्रदर्शन कार्यक्रम में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में उन्हें कुछ संदेह था, क्योंकि नैनो उर्वरकों का उपयोग उनके लिए नया अनुभव था। फसल बढ़ने के दौरान उन्हें लगा कि नैनो यूरिया वाले पौधे पारंपरिक खाद वाले पौधों की तुलना में थोड़े कम हरे दिखाई दे रहे हैं, लेकिन पौधे पूरी तरह स्वस्थ थे।



फसल कटाई के बाद जब उत्पादन की तुलना की गई तो परिणाम चौंकाने वाले रहे। नैनो उर्वरक से तैयार फसल का उत्पादन पारंपरिक खाद से तैयार फसल के बराबर निकला। इससे उनका विश्वास बढ़ा और उन्होंने रबी सीजन में नैनो डीएपी का भी प्रयोग किया। बीजोपचार और फसल पर छिड़काव के बाद उन्होंने दानेदार डीएपी की मात्रा लगभग 50 प्रतिशत तक कम कर दी, फिर भी उत्पादन में कोई कमी नहीं आई।



आज भूषण साहू नियमित रूप से नैनो उर्वरकों का उपयोग कर रहे हैं। उनके अनुसार इससे दानेदार खाद की खपत करीब 30 प्रतिशत तक घट गई है। उनका मानना है कि आने वाले समय में नैनो उर्वरक किसानों की लागत कम करने और खेती को अधिक लाभकारी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उनकी सफलता आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।



केस-2: सवा एकड़ खेत में किया प्रयोग, फसल की गुणवत्ता बढ़ी

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बिलासपुर जिले के ग्राम कछार के किसान तिहारू राम साहू आधुनिक खेती के ऐसे उदाहरण बनकर सामने आए हैं, जिन्होंने नई तकनीक को अपनाकर खेती की तस्वीर बदल दी। वर्षों तक पारंपरिक डीएपी उर्वरक का उपयोग करने वाले तिहारू राम ने कृषि विभाग के मार्गदर्शन में नैनो डीएपी का प्रयोग शुरू किया और इसके उत्साहजनक परिणाम प्राप्त किए।



तिहारू राम करीब सवा एकड़ भूमि में सब्जियों और अन्य फसलों की खेती करते हैं। उनका कहना है कि पहले उर्वरकों पर होने वाला खर्च खेती की लागत बढ़ा देता था। हर सीजन में बड़ी मात्रा में खाद खरीदनी पड़ती थी, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता था। इसी दौरान कृषि विभाग ने उन्हें नैनो डीएपी के उपयोग और इसके लाभों की जानकारी दी।



उन्होंने अपनी फसल में नैनो डीएपी का उपयोग किया। कुछ ही समय बाद उन्हें फसल में सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगे। पौधों की वृद्धि बेहतर हुई, फसल का विकास संतुलित रहा और खेत पहले की तुलना में अधिक स्वस्थ नजर आने लगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार दर्ज किया गया।



तिहारू राम का कहना है कि नैनो डीएपी ने खेती को अधिक आसान और किफायती बना दिया है। कम मात्रा में उपयोग होने के बावजूद इसका प्रभाव बेहतर रहा। इससे उर्वरक पर होने वाला खर्च कम हुआ और खेती की लाभप्रदता बढ़ी।



केस-3: मिट्टी की सेहत बचाने के लिए अपनाई नई तकनीक

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सरगुजा जिले के अंबिकापुर विकासखंड के ग्राम मेंड्राखुर्द के किसान नैहर साय आधुनिक और टिकाऊ खेती के समर्थक हैं। धान और सब्जी उत्पादन से जुड़े नैहर साय का मानना है कि खेती का भविष्य वैज्ञानिक सोच और संतुलित उर्वरक प्रबंधन में छिपा है। यही वजह है कि उन्होंने नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसे उन्नत उर्वरकों को अपनाया और अन्य किसानों को भी इसके लिए प्रेरित कर रहे हैं।



नैहर साय बताते हैं कि लंबे समय तक पारंपरिक दानेदार उर्वरकों का अधिक उपयोग करने से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। खेती केवल एक या दो सीजन की बात नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी भूमि को उपजाऊ बनाए रखना जरूरी है। इसी सोच के साथ उन्होंने नैनो उर्वरकों का उपयोग शुरू किया।



उनके अनुसार नैनो यूरिया और नैनो डीएपी पौधों तक पोषक तत्वों को अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचाते हैं। चूंकि इनका उपयोग पत्तियों पर छिड़काव के माध्यम से किया जाता है, इसलिए पौधे पोषक तत्वों को सीधे अवशोषित कर लेते हैं। इससे उर्वरकों की बर्बादी कम होती है और फसल को समय पर पर्याप्त पोषण मिल जाता है। नैहर साय का कहना है कि नैनो उर्वरकों का एक बड़ा फायदा यह भी है कि इनका परिवहन और भंडारण बेहद आसान है। कम मात्रा में अधिक प्रभाव मिलने से किसानों की लागत कम होती है और खेती का काम सुविधाजनक बनता है।



केस-4: 500 एमएल की बोतल ने आसान बनाई खेती

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कबीरधाम जिले के ग्राम उसलापुर के किसान दशरथ वर्मा उन किसानों में शामिल हैं, जिन्होंने खेती में आधुनिक बदलाव को खुले मन से स्वीकार किया और उसका लाभ भी उठाया है। करीब 4.50 एकड़ भूमि पर धान और गन्ने की खेती करने वाले दशरथ वर्मा ने नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का उपयोग शुरू कर खेती की लागत और मेहनत दोनों में कमी लाई है।



दशरथ बताते हैं कि पहले खेती के लिए बड़ी मात्रा में दानेदार उर्वरक खरीदना पड़ता था। 50 किलो की भारी बोरियों को दुकान से घर और फिर खेत तक पहुंचाना काफी मुश्किल होता था। इसके लिए अतिरिक्त श्रम और समय दोनों लगते थे। भंडारण की समस्या अलग थी।



कुछ समय पहले उन्होंने नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के बारे में जानकारी प्राप्त की और इसका उपयोग शुरू किया। उन्होंने पाया कि जहां पहले भारी बोरियां ढोनी पड़ती थीं, वहीं अब 500 मिलीलीटर की एक छोटी बोतल को स्प्रेयर की मदद से खेत में उपयोग किया जा सकता है। इससे काम आसान हो गया और समय की भी बचत होने लगी।



दशरथ वर्मा के अनुसार नैनो उर्वरकों का असर उनकी फसलों में स्पष्ट दिखाई दिया है। पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रभावी तरीके से मिले और फसल की गुणवत्ता में सुधार देखने को मिला है। साथ ही उर्वरक की बर्बादी कम हुई और लागत भी घटी है।


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