शादी के वीडियो और कॉल रिकॉर्डिंग पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, जानिए क्यों नहीं मिली अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने की अनुमति
कोर्ट ने साफ किया कि मजिस्ट्रेट का आदेश इस मामले में अंतरिम प्रकृति का है। इसलिए उसके खिलाफ पुनरीक्षण याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू की एकलपीठ ने 27 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया।
समझें क्या है पूरा मामला
- मामला दुर्ग की डॉ. नीलम गायकवाड़ की आपराधिक शिकायत से जुड़ा है।
- उन्होंने पेन ड्राइव और फोरेंसिक रिपोर्ट को अतिरिक्त साक्ष्य बनाने की अनुमति मांगी थी।
- मजिस्ट्रेट ने 30 जून 2026 को आवेदन खारिज किया।
- सत्र न्यायालय ने 18 सितंबर 2026 को पुनरीक्षण याचिका खारिज की।
- हाई कोर्ट ने भी याचिका खारिज की, पर कानूनी रास्ता खुला रखा।
दुर्ग की आपराधिक शिकायत में क्या आरोप थे?
डॉ. नीलम गायकवाड़ ने 2 जुलाई 2025 को शिकायत दर्ज कराई थी। यह शिकायत उदय सिंह जोशी, फमेंद्र सिंह जोशी और चंपी देवी के खिलाफ थी। इसमें भारतीय न्याय संहिता की अलग-अलग धाराएं लगाई गई थीं।
शिकायत में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, धमकी और कूटरचना जैसे आरोप लगाए गए थे। ये केवल शिकायत के आरोप हैं। कोर्ट ने इन आरोपों पर कोई फैसला नहीं दिया है।
प्रारंभिक बयान कब दर्ज हुए?
मजिस्ट्रेट के सामने 25 अगस्त 2025 को शिकायतकर्ता के बयान दर्ज हुए। उन्होंने आरोपों के समर्थन में कुछ दस्तावेज भी पेश किए।
पेन ड्राइव और फोरेंसिक रिपोर्ट में क्या था?
बाद में शिकायतकर्ता ने पेन ड्राइव और फोरेंसिक सलाहकार की रिपोर्ट को अतिरिक्त साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने की अनुमति मांगी। पेन ड्राइव में शादी का वीडियो था। साथ ही आरोपित लोगों से मोबाइल फोन पर हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग होने की बात कही गई।
याचिकाकर्ता के मुताबिक फोरेंसिक रिपोर्ट उन्हें 24 अप्रैल 2026 को मिली। यह शिकायत और प्रारंभिक बयान के काफी बाद की बात है। इसी आधार पर उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन दिया।
मजिस्ट्रेट ने आवेदन क्यों खारिज किया?
मजिस्ट्रेट ने 30 जून 2026 को आवेदन खारिज किया। उन्होंने पाया कि मूल शिकायत और प्रारंभिक बयान में वीडियो या रिकॉर्डिंग को फोरेंसिक जांच के लिए भेजे जाने का जिक्र नहीं था। मजिस्ट्रेट ने यह भी माना कि शिकायत की शुरुआती अवस्था में अतिरिक्त सामग्री लेने से कार्यवाही अनावश्यक रूप से लंबी हो सकती है।
सत्र न्यायालय और हाई कोर्ट में क्या हुआ?
डॉ. गायकवाड़ ने दुर्ग के आठवें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत में पुनरीक्षण याचिका दी। 18 सितंबर 2026 को यह खारिज हो गई। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट का आदेश अंतरिम है, इसलिए पुनरीक्षण स्वीकार नहीं हो सकता। इसके बाद उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत हाई कोर्ट का रुख किया।
याचिकाकर्ता की दलील क्या थी?
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कहा कि फोरेंसिक रिपोर्ट शिकायत के बाद मिली। इसलिए शिकायत या प्रारंभिक बयान में उसका जिक्र संभव नहीं था। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य आरोपों के समर्थन में अहम हो सकते हैं। यह भी दलील दी गई कि जिस आदेश से अहम अधिकार प्रभावित हों, उसे सिर्फ अंतरिम मानकर समीक्षा से बाहर नहीं करना चाहिए।
अंतरिम आदेश का कानूनी आधार क्या है?
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी आदेश को अंतरिम मानने के लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं कि वह मुकदमे के किस चरण में आया। यह भी देखना होगा कि उससे पक्षकारों के अधिकारों पर क्या असर पड़ता है और क्या मूल कार्यवाही अंतिम रूप से निपटती है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अमरनाथ, मधु लिमये और सेथुरामन सहित अन्य फैसलों के सिद्धांतों का जिक्र किया। इस मामले में मजिस्ट्रेट ने केवल कुछ अतिरिक्त सामग्री लेने से इनकार किया था। इससे न तो शिकायत खत्म हुई और न ही अधिकारों का अंतिम निर्धारण हुआ। इसलिए कोर्ट ने आदेश को अंतरिम माना।
हाई कोर्ट ने क्या राहत दी?
हाई कोर्ट को निचली अदालतों के आदेशों में दखल का आधार नहीं मिला। इसलिए याचिका खारिज की गई। लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि डॉ. गायकवाड़ मजिस्ट्रेट के 30 जून 2026 के आदेश को कानून में उपलब्ध उचित प्रक्रिया से दोबारा चुनौती दे सकती हैं।
क्या वीडियो और ऑडियो अब साक्ष्य नहीं माने जाएंगे?
नहीं। इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि शादी के वीडियो या रिकॉर्डिंग कभी साक्ष्य नहीं बन सकते। हाई कोर्ट ने मुख्य रूप से इस पर बात की कि अतिरिक्त साक्ष्य की अनुमति के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका चल सकती है या नहीं।
कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की सत्यता या अंतिम स्वीकार्यता पर फैसला नहीं दिया। साक्ष्य को रिकॉर्ड पर लेने से इनकार करना और उसे पूरी तरह अमान्य घोषित करना, दोनों अलग बातें हैं।
अब आगे क्या?
अब याचिकाकर्ता कानूनी प्रक्रिया से मजिस्ट्रेट के आदेश को दोबारा चुनौती दे सकती हैं। उन्होंने ऐसा करने का फैसला किया या नहीं, यह बात अभी सामने नहीं आई हैं
यह खबर क्यों जरूरी है
यह फैसला आम लोगों को एक कानूनी बारीकी समझाता है। साक्ष्य लेने से इनकार हर बार अंतिम फैसला नहीं होता। ऐसे आदेश को चुनौती देने का रास्ता भी हर बार पुनरीक्षण नहीं होता। याचिकाकर्ता को दोबारा चुनौती देने की छूट मिली है। लेकिन कोर्ट ने साक्ष्य की सच्चाई पर कुछ नहीं कहा। इसलिए इस फैसले को वीडियो-ऑडियो मान्य नहीं की तरह पढ़ना गलत होगा। कई लोग अदालती कार्यवाही में रिकॉर्डिंग और डिजिटल सामग्री लगाते हैं। उनके लिए प्रक्रिया की यह समझ अहम है। आरोपों की जांच अलग प्रक्रिया है। आरोप अभी केवल शिकायत में हैं।
FAQ
सवाल: हाई कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
जवाब: हाई कोर्ट ने अतिरिक्त साक्ष्य की अनुमति न मिलने के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने मजिस्ट्रेट का आदेश अंतरिम माना। इसलिए पुनरीक्षण याचिका सुनवाई योग्य नहीं थी।
सवाल: क्या अब शादी के वीडियो या कॉल रिकॉर्डिंग साक्ष्य नहीं माने जाएंगे?
जवाब: ऐसा नहीं है। कोर्ट ने इन साक्ष्यों की सत्यता या अंतिम स्वीकार्यता पर फैसला नहीं दिया। फैसला प्रक्रिया से जुड़ा है।
सवाल: क्या याचिकाकर्ता के पास आगे कोई रास्ता है?
जवाब: हां। हाई कोर्ट ने उन्हें मजिस्ट्रेट के 30 जून 2026 के आदेश को कानून के तहत उचित प्रक्रिया से दोबारा चुनौती देने की छूट दी है।