सरस्वती साइकिल योजना : 66 करोड़ की साइकिलों पर नेताओं का ग्रहण...
समझें क्या है पूरा मामला
- 66 करोड़ की साइकिलें समय पर नहीं बंटी
- नेताओं के इंतजार में साइकिलें खराब
- बारिश में साइकिलों पर जंग लगी
- मंत्री ने वितरण व्यवस्था बदलने की बात कही
- कंपनियां अब छत्तीसगढ़ में करेंगी असेंबलिंग
Saraswati Cycle Scheme :छत्तीसगढ़ में छात्राओं को स्कूल पहुंचाने के लिए शुरू की गई सरस्वती साइकिल योजना अब सरकारी लापरवाही की तस्वीर दिखा रही है। करीब 66 करोड़ रुपए की योजना में खरीदी गई साइकिलें जरूरतमंद छात्राओं तक समय पर पहुंचने के बजाय कई जगह गोदामों और खुले में पड़ी खराब हो रही हैं। बारिश, कीचड़ और नमी के बीच खड़ी साइकिलों के हैंडल, चेन, रिम और दूसरे लोहे के हिस्सों में जंग लग रही है। स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने भी माना है कि नेताओं के हाथों साइकिल बांटने के चलन को खत्म किया जाएगा। उनका कहना है कि जो जनप्रतिनिधि आसानी से उपलब्ध हों, उन्हें ही कार्यक्रम में बुलाया जाएगा। मकसद यही है कि छात्राओं को समय पर साइकिल मिले और लंबे समय तक खड़ी रहने से वे कबाड़ न बनें।
छात्राओं से पहले नेताओं की बारी
योजना का मकसद साफ है—कक्षा 9वीं की पात्र छात्राओं को मुफ्त साइकिल देकर स्कूल तक आने-जाने में मदद करना। लेकिन वितरण की व्यवस्था में एक अलग ही तस्वीर सामने आती रही है। कई बार साइकिलें तैयार होने के बाद भी उनका वितरण राजनीतिक कार्यक्रम और नेताओं की मौजूदगी के इंतजार में अटक जाता है। यानी जिस साइकिल से छात्रा को स्कूल पहुंचना था, वह पहले मंच और फोटो सेशन का इंतजार करती रही।
क्रेडिट के चक्कर में बढ़ता इंतजार
साइकिल छात्राओं के हाथ में पहुंचने से पहले नेता के हाथों से गुजरती है। कार्यक्रम में जनप्रतिनिधि साइकिल सौंपते हैं, फोटो खिंचती है और योजना का क्रेडिट लिया जाता है। समस्या तब बढ़ती है जब स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जनप्रतिनिधि या नेता कार्यक्रम के लिए समय नहीं निकाल पाते। साइकिलें वहीं पड़ी रहती हैं और मौसम अपना काम करता रहता है।
कंपनी को भी छत्तीसगढ़ आना होगा
अब साइकिल खरीद की व्यवस्था में भी बदलाव की बात कही गई है। कंपनियों से ऐसी शर्त पर साइकिल लेने की तैयारी है कि वे छत्तीसगढ़ में आकर साइकिल असेंबल करें। इससे सप्लाई और गुणवत्ता पर नजर रखने की बात कही जा रही है। लेकिन असली सवाल पुरानी साइकिलों का है, जो समय पर छात्राओं तक नहीं पहुंच सकीं।
खुले में सड़ती सरकारी संपत्ति
कई जगह साइकिलों को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त जगह तक नहीं है। कुछ साइकिलें खुले में पड़ी हैं तो कुछ के ऊपर दूसरा सामान रख दिया गया है। बारिश के बीच बिना शेड या तिरपाल के रखी साइकिलों में जंग लगना स्वाभाविक है। विभाग का तर्क है कि कुछ साइकिलें पिछले सत्र की हैं और उनमें खराबी थी। अब खराब साइकिलों की मरम्मत कराकर छात्राओं को देने की बात कही जा रही है।
जांच हर बार, सुधार कब?
साइकिलों के कबाड़ में बदलने का मामला नया नहीं है। हर बार मामला सामने आने के बाद जांच के निर्देश दिए जाते हैं, लेकिन तस्वीर बहुत नहीं बदलती। इस बार भी जांच की बात कही गई है। सवाल यह है कि जांच के बाद जिम्मेदारी किसकी तय होगी? अगर खरीद के बाद साइकिलें समय पर बांटी ही नहीं जानी थीं तो करोड़ों रुपए की खरीद का फायदा क्या हुआ?
योजना का मकसद कहीं पीछे छूटा
सरस्वती साइकिल योजना का लक्ष्य अनुसूचित जाति, जनजाति और बीपीएल परिवारों की कक्षा 9वीं की छात्राओं को स्कूल आने-जाने की सुविधा देना है। मुफ्त साइकिल से बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने की योजना है। लेकिन जब साइकिल छात्रा तक पहुंचने से पहले ही जंग खाने लगे तो सवाल सिर्फ सामान के खराब होने का नहीं, पूरी व्यवस्था की प्राथमिकता का है।
66 करोड़ का हिसाब कौन देगा?
सरकार की मंशा छात्राओं को सुविधा देने की है, लेकिन व्यवस्था में नेताओं के कार्यक्रम, स्टोरेज की कमी और वितरण में देरी जैसी वजहें जुड़ जाएं तो सरकारी पैसा फंस जाता है। अब मंत्री ने व्यवस्था बदलने की बात कही है। जरूरत इस बात की है कि पुरानी साइकिलों की स्थिति, खराब हुई संख्या, जिम्मेदार अधिकारियों और हुए नुकसान का साफ हिसाब भी सामने आए। वरना हर साल नई साइकिल खरीदने और पुरानी को कबाड़ बनने देने का सिलसिला चलता रहेगा।
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