छत्तीसगढ़ में 3,057 करोड़ रुपए बर्बाद.. गांवों तक नहीं पहुंच पाया नेटवर्क, भारतनेट 2.0 फेल, अब तीसरे फेज की तैयारी
यानी पुरानी गड़बड़ियों का हिसाब पूरा होने से पहले ही नया प्रोजेक्ट सामने है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव अंकित आनंद कह रहे हैं कि तीसरे फेज में सारी कमियां दूर कर लेंगे।
फेज-2 का लक्ष्य बड़ा था
भारतनेट फेज-2 में राज्य की 5,987 ग्राम पंचायतों को हाईस्पीड ब्रॉडबैंड से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था। टाटा प्रोजेक्ट्स को यह काम मिला था। कंपनी के दस्तावेज के मुताबिक परियोजना की लागत करीब ₹3,057 करोड़ थी और 32,466 किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क बिछाने की योजना थी। काम 12 महीने में पूरा होना था।
लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग रही। योजना में देरी, काम को लेकर विवाद और नेटवर्क के संचालन-रखरखाव की दिक्कतों ने पूरी व्यवस्था की रफ्तार रोक दी। बाद में ठेका विवाद अदालत तक पहुंचा। फरवरी 2026 के छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में भी भारतनेट फेज-2 के 5,987 ग्राम पंचायतों वाले प्रोजेक्ट और टाटा प्रोजेक्ट्स-CHiPS के बीच विवाद का उल्लेख है।
करोड़ों का नेटवर्क, कनेक्शन का संकट
सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब करोड़ों रुपए खर्च करके नेटवर्क खड़ा किया गया, तो ग्रामीणों को उसका लगातार फायदा क्यों नहीं मिला? फाइबर कटने, नेटवर्क बंद होने और रखरखाव की समस्या ने कागज पर तैयार नेटवर्क को जमीन पर कमजोर कर दिया। CHiPS को परियोजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी दी गई थी। पुराने प्रोजेक्ट दस्तावेजों में भी CHiPS को नोडल एजेंसी बताया गया था।
अब तार कटेगा तो नेट नहीं कटेगा
अब तीसरे चरण में सरकार पुराने मॉडल की कमियां दूर करने का दावा कर रही है। पहले के नेटवर्क को लीनियर व्यवस्था से रिंग टोपोलॉजी में बदलने की योजना है। इसका मतलब है कि किसी एक हिस्से में फाइबर कटने पर दूसरे रास्ते से नेटवर्क चालू रखा जा सकेगा। केंद्र के अगस्त 2026 के समझौते में 4,048 फेज-1 ग्राम पंचायतों को लीनियर से रिंग टोपोलॉजी में अपग्रेड करने की बात कही गई है।
तीसरे फेज में फिर बड़ा दांव
नए अमेंडेड भारतनेट कार्यक्रम के तहत राज्य की कुल 11,682 ग्राम पंचायतों को दायरे में लिया गया है। इनमें 4,048 फेज-1 पंचायतों का अपग्रेडेशन, 5,964 फेज-2 पंचायतों का कवरेज और 1,670 नई पंचायतें शामिल हैं। इसके अलावा 8,328 गांवों को मांग के आधार पर कनेक्टिविटी देने और तीन लाख से ज्यादा ग्रामीण घरों तक फाइबर पहुंचाने का लक्ष्य है। केंद्र ने इसके लिए ₹3,942 करोड़ की वित्तीय सहायता मंजूर की है।
विशेष दर्जा, ताकि फिर देरी न हो
सितंबर 2026 में भारतनेट को विशेष परियोजना का दर्जा देने के बाद राइट ऑफ वे यानी सड़क या सरकारी जमीन से फाइबर बिछाने की मंजूरी जल्दी देने की व्यवस्था पर जोर दिया गया है। यानी सरकार अब मान रही है कि पुराने मॉडल में सिर्फ फाइबर बिछाना काफी नहीं था, उसके रखरखाव और लगातार नेटवर्क चालू रखने की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
सवाल अब करोड़ों के हिसाब का है
सवाल यह है कि जब पुराने चरण में नेटवर्क को लेकर इतनी दिक्कतें रहीं तो उसकी जिम्मेदारी किसकी तय हुई? जिन जगहों पर फाइबर बिछा, वहां इंटरनेट कितने दिन चला? रखरखाव के लिए कितना पैसा खर्च हुआ? ठेकेदार और एजेंसी के बीच विवाद की वजह क्या थी? अगर दूसरे चरण की कमियां अब रिंग टोपोलॉजी से दूर करनी पड़ रही हैं तो पहले इस मॉडल को लागू क्यों नहीं किया गया? और सबसे बड़ा सवाल—पुराने खर्च का पूरा हिसाब और नतीजा सामने आए बिना तीसरे चरण पर हजारों करोड़ का नया दांव कितना पारदर्शी होगा?
सरकार बोली, इस बार कमी नहीं रहेगी
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव अंकित आनंद भी दूसरे चरण की कमियों को स्वीकार करते हुए तीसरे चरण में उन्हें दूर करने की बात कह रहे हैं। यानी सरकार के सामने चुनौती सिर्फ नया फाइबर बिछाने की नहीं है। असली परीक्षा यह है कि इस बार गांवों में नेटवर्क कनेक्ट भी हो और लगातार चलता भी रहे।
FAQ
- भारतनेट 2.0 की कमियों के कारण इंटरनेट कनेक्टिविटी में क्या दिक्कतें आईं?
भारतनेट 2.0 के तहत करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद इंटरनेट कनेक्टिविटी में दिक्कतें आईं, जिसमें फाइबर कटने, नेटवर्क बंद होने और रखरखाव की समस्याएं शामिल हैं। - तीसरे चरण के भारतनेट प्रोजेक्ट में कौन-कौन सी सुधार योजनाएं हैं?
तीसरे चरण में, सरकार पुराने नेटवर्क की कमियों को दूर करने के लिए लीनियर व्यवस्था को रिंग टोपोलॉजी में बदलने की योजना बना रही है, जिससे फाइबर कटने पर भी नेटवर्क जारी रह सकेगा। - सरकार के मुताबिक, तीसरे चरण के लिए कितना बजट मंजूर किया गया है?
तीसरे चरण के लिए केंद्र ने ₹3,942 करोड़ की वित्तीय सहायता मंजूर की है, जिसमें 11,682 ग्राम पंचायतों को कनेक्टिविटी देने का लक्ष्य है।