थाली पर सरकार की नजर: छत्तीसगढ़ के बच्चों में बढ़ता मोटापा बना चिंता, स्कूलों में अब लाल-पीला-हरा बोर्ड बताएगा क्या खाएं

VINAY VERMA | Oct 07, 2026, 16:40 IST
छत्तीसगढ़ में बच्चों का बढ़ता वजन चिंता का विषय
छत्तीसगढ़ में बच्चों के खान-पान को लेकर चिंता बढ़ रही है। मोटापा, जंक फूड और मीठे पेय की बढ़ती आदतों के बीच अब स्कूलों में बच्चों को खुद समझाने की तैयारी है कि उनकी थाली में क्या अच्छा है और क्या नुकसानदेह। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सरकारी, निजी और आवासीय स्कूलों में शुगर-कैलोरी बोर्ड लगाने की अनुशंसा की है।

बोर्ड पर खाने में मौजूद शक्कर, नमक, वसा और कैलोरी की जानकारी रंगों के जरिए दिखाई जाएगी।



सरकारी आंकड़ा भी चेताता है

सरकारी NFHS-5 के आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में 5 साल से कम उम्र के 4% बच्चे ओवरवेट पाए गए थे। NFHS-4 में यह आंकड़ा 2.9% था। यानी करीब पांच साल के अंतराल में यह अनुपात बढ़ा है। यह आंकड़ा स्कूल जाने वाले बच्चों के मौजूदा मोटापे का सीधा आंकड़ा नहीं है, लेकिन कम उम्र में बढ़ते वजन की समस्या की तरफ जरूर इशारा करता है। दूसरी तरफ राज्य में कुपोषण की चुनौती भी बनी हुई है। NFHS-5 में 5 साल से कम उम्र के 31.3% बच्चे अंडरवेट पाए गए।



एक तरफ कुपोषण, दूसरी तरफ मोटापा

छत्तीसगढ़ की चुनौती इसलिए और गंभीर है क्योंकि यहां बच्चों के सामने सिर्फ कम वजन की समस्या नहीं है। एक तरफ बच्चे कुपोषण से जूझ रहे हैं तो दूसरी तरफ ज्यादा कैलोरी और खराब खान-पान से वजन बढ़ने का खतरा भी दिख रहा है। ऐसे में सिर्फ पेट भरना काफी नहीं, बल्कि बच्चे की थाली में क्या जा रहा है, यह भी उतना ही जरूरी हो गया है।




रंग बताएगा खतरा

आयोग के प्रस्तावित बोर्ड में ट्रैफिक लाइट की तरह तीन रंग होंगे। लाल रंग ज्यादा शक्कर, नमक, वसा या कैलोरी वाले खाने की चेतावनी देगा। पीला रंग सीमित मात्रा में खाने का संकेत होगा। वहीं हरा रंग पौष्टिक और बेहतर विकल्प बताएगा। बच्चों को लंबी पोषण तालिका पढ़ने के बजाय रंग देखकर फैसला लेने में आसानी होगी।



जंक फूड पर भी वार

आयोग ने स्कूल परिसरों में जंक फूड की बिक्री को नियंत्रित करने की भी अनुशंसा की है। मीठे पेय, पैकेटबंद स्नैक्स और ज्यादा कैलोरी वाले खाने का चलन बच्चों में बढ़ने को लेकर चिंता जताई गई है। आयोग का मानना है कि सिर्फ जंक फूड पर रोक लगाने से समस्या खत्म नहीं होगी। बच्चों और अभिभावकों की आदत बदलना भी जरूरी है।




देसी खाना थाली में

स्कूलों और छात्रावासों में पौष्टिक भोजन के साथ स्थानीय छत्तीसगढ़ी खान-पान को बढ़ावा देने की बात कही गई है। यानी बच्चों की थाली में स्थानीय और पौष्टिक विकल्प बढ़ाने पर जोर रहेगा। आश्रम शाला, पोटा केबिन, प्रयास विद्यालय और एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय भी इस पहल के दायरे में रखने की अनुशंसा की गई है।



स्कूल बनेगा हेल्थ क्लास

आयोग ने हर स्कूल में ईट राइट क्लब और विद्यार्थियों को स्वास्थ्य दूत बनाने का सुझाव दिया है। प्रार्थना सभा में पोषणऔर सही खान-पान की जानकारी देने की बात कही गई है। पालक-शिक्षक बैठकों में भी बच्चों के भोजन पर चर्चा होगी। बेहतर पोषण के लिए काम करने वाले अभिभावकों को ‘पेरेंट्स ऑफ द मंथ’ के रूप में प्रोत्साहित करने की अनुशंसा भी है।



सिर्फ बोर्ड से नहीं बदलेगी आदत

दीवार पर बोर्ड लगाना आसान है, लेकिन असली चुनौती बच्चों की आदत बदलना है। अगर स्कूल के बाहर और आसपास वही जंक फूड आसानी से मिलता रहा तो सिर्फ लाल-पीला-हरा रंग कितना असर करेगा, यह बड़ा सवाल है। इसलिए स्कूल में बोर्ड के साथ भोजन की गुणवत्ता, जंक फूड की बिक्री और बच्चों की पोषण स्थिति पर लगातार नजर रखना भी जरूरी होगा।



चिंता का संदेश साफ

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में बच्चों के पोषण की तस्वीर एकतरफा नहीं है—कहीं कम वजन और कुपोषण की समस्या है तो दूसरी तरफ बढ़ते वजन का खतरा भी सामने है। ऐसे में आयोग की यह पहल सिर्फ बोर्ड लगाने तक सीमित रही तो असर सीमित रहेगा। जरूरत इस बात की है कि बच्चों को स्वाद नहीं, सेहत के हिसाब से खाना चुनना सिखाया जाए।



FAQ



  1. छत्तीसगढ़ में बच्चों के पोषण संबंधी आंकड़े क्या बताते हैं?
    छत्तीसगढ़ में NFHS-5 के आंकड़ों के अनुसार 5 साल से कम उम्र के 4% बच्चे ओवरवेट पाए गए हैं, जबकि 31.3% बच्चे अंडरवेट हैं। यह स्थिति कुपोषण और मोटापे दोनों की समस्याओं को दर्शाती है।
  2. सरकारी बोर्ड में खाने की जानकारी कैसे प्रस्तुत की जाएगी?
    सरकारी बोर्ड पर खाने में मौजूद शक्कर, नमक, वसा और कैलोरी की जानकारी ट्रैफिक लाइट के रंगों के माध्यम से दी जाएगी, जहां लाल रंग खतरनाक स्तर को, पीला सीमित मात्रा का संकेत और हरा पौष्टिक विकल्प को दर्शाएगा।
  3. स्कूलों में जंक फूड की बिक्री को लेकर आयोग की क्या अनुशंसा है?
    आयोग ने स्कूल परिसरों में जंक फूड की बिक्री को नियंत्रित करने की अनुशंसा की है और बच्चों तथा अभिभावकों की आदतों को बदलने पर भी जोर दिया है, क्योंकि सिर्फ बिक्री पर रोक लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा।
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