छत्तीसगढ़ में 67 लाख का फर्नीचर घोटाला, बिना सामान पहुंचाए निकाल लिए पैसे, 10 आरोपियों पर 20 हजार पन्नों का चालान
आरोप है कि कई स्कूलों में फर्नीचर पहुंचा ही नहीं और सप्लाई करने वाली फर्मों को लाखों रुपए का भुगतान कर दिया गया।
15 साल पुराने फर्नीचर घोटाले में बड़ी कार्रवाई
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में करीब 15 साल पुराने फर्नीचर खरीदी मामले की जांच अब अदालत तक पहुंच गई है। EOW और ACB ने विशेष न्यायालय, अंबिकापुर में 10 लोगों के खिलाफ चालान पेश किया है। इनमें राजीव गांधी शिक्षा मिशन के तत्कालीन जिला परियोजना समन्वयक और फर्नीचर सप्लाई करने वाली फर्मों के संचालक शामिल हैं।
जांच में सामने आया कि सरकारी स्कूलों के लिए खरीदे गए फर्नीचर की सप्लाई में गड़बड़ी हुई थी। कई फर्मों को तय रकम मिल गई थी, मगर स्कूलों तक पूरा सामान नहीं पहुंचा। कुछ मामलों में फर्नीचर पहुंचाए बिना ही भुगतान लेने का आरोप है। जांच एजेंसी ने इस पूरे मामले में 67 लाख 48 हजार 8 रुपए की आर्थिक क्षति का आकलन किया है।
स्कूलों के फर्नीचर के लिए मिले थे 2.70 करोड़
यह मामला वित्तीय वर्ष 2010-11 का है। उस समय सर्व शिक्षा अभियान के तहत सरकारी मिडिल स्कूलों में फर्नीचर उपलब्ध कराया जाना था। इसके लिए अविभाजित सरगुजा जिले को 2 करोड़ 70 लाख रुपए मिले थे। राजीव गांधी शिक्षा मिशन के जिला कार्यालय ने फर्नीचर खरीदी की प्रक्रिया शुरू की।
तत्कालीन कलेक्टर और जिला मिशन संचालक की मंजूरी के बाद 10 फर्मों को ऑर्डर दिए गए। खरीदी छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम (CSIDC) की निर्धारित दरों पर की जानी थी। फर्मों को 20 दिनों के भीतर स्कूलों में फर्नीचर पहुंचाना था। इसके लिए 28 मार्च 2011 को कुल 2 करोड़ 68 लाख 18 हजार 838 रुपए के चेक जारी किए गए।
बिना जांच किए फर्मों को बांट दिए चेक
फर्नीचर खरीदी में गड़बड़ी का सबसे बड़ा मामला भुगतान की प्रक्रिया से जुड़ा है। जांच के अनुसार, तत्कालीन कलेक्टर ने फर्नीचर का भौतिक सत्यापन कराने के निर्देश दिए थे। इसका मतलब था कि पहले स्कूलों में सामान की जांच होनी थी। इसके बाद ही संबंधित फर्मों को भुगतान किया जाना था।
आरोप है कि तत्कालीन जिला परियोजना समन्वयक सत्यप्रकाश पाण्डेय ने इन निर्देशों का पालन नहीं किया। उन्होंने लेखापाल प्रवीण सिन्हा से चेक लिए और फर्मों को बांट दिए। यह प्रक्रिया 6 से 9 अप्रैल 2011 के बीच पूरी की गई। जांच एजेंसी के मुताबिक, उस समय तक फर्नीचर की पूरी सप्लाई और उसका सत्यापन नहीं हुआ था। जांच समिति ने इस कार्रवाई को गंभीर वित्तीय अनियमितता माना।
शिकायतों के बाद खुलने लगी घोटाले की परतें
फर्नीचर खरीदी में गड़बड़ी की शिकायतें सामने आने के बाद जांच शुरू हुई थी। स्कूल शिक्षा विभाग ने 20 अप्रैल 2013 को मामले की जांच कराने के निर्देश दिए। इसके बाद सरगुजा कलेक्टर ने तीन सदस्यों की जांच समिति बनाई। समिति ने 3 जून से 12 जून 2013 तक मामले की पड़ताल की।
समिति ने 19 जुलाई 2013 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। इसमें खरीदी और भुगतान की प्रक्रिया में कई खामियां सामने आईं। जांच में पाया गया कि फर्मों ने स्कूलों में सामान पहुंचाने के जरूरी दस्तावेज जमा नहीं किए थे। कई बिलों के साथ स्कूलवार सप्लाई की जानकारी भी नहीं थी।
प्रधान पाठकों के हस्ताक्षर वाली पावती भी उपलब्ध नहीं कराई गई थी। इसके अलावा फर्नीचर की गुणवत्ता जांचने और भौतिक सत्यापन की प्रक्रिया का भी पालन नहीं हुआ। फर्मों से जरूरी अनुबंध और तीन प्रतिशत सुरक्षा निधि लेने की शर्त भी पूरी नहीं की गई।
फर्जी फर्म के नाम पर 22.91 लाख निकालने का आरोप
इस मामले में दर्शन फेब्रिकेशन नाम की फर्म से जुड़ा एक बड़ा खुलासा हुआ। जांच एजेंसी के अनुसार, 18 फरवरी 2011 को दर्शन फेब्रिकेटर, रायपुर के संचालक सुरेश कटारिया के नाम क्रय आदेश जारी हुआ था।
आरोप है कि सत्यप्रकाश पाण्डेय ने यह आदेश संबंधित संचालक को देने के बजाय आकृति प्रिंटिंग प्रेस के संचालक संजय पटेल को दे दिया। इसके बाद संजय पटेल ने कथित तौर पर दर्शन फेब्रिकेशन के नाम से बैंक खाता खुलवाया। यह खाता ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स की अंबिकापुर शाखा में खोला गया था।
28 मार्च 2011 को इस खाते में 22 लाख 91 हजार 909 रुपए का चेक जमा हुआ। बाद में खाते से रकम निकाल ली गई। जांच एजेंसी का दावा है कि संबंधित फर्म ने किसी भी स्कूल में फर्नीचर की सप्लाई नहीं की थी।
7 लाख रुपए कमीशन देने की बात भी आई सामने
जांच के दौरान संजय पटेल के कथित बयान में कमीशन देने की बात भी सामने आई। एजेंसी के मुताबिक, संजय पटेल ने पूछताछ में बताया कि उसने सत्यप्रकाश पाण्डेय को 7 लाख रुपए कमीशन के तौर पर दिए थे।
आरोप है कि बाकी रकम से फर्नीचर की सप्लाई करने के लिए कहा गया था। हालांकि, जांच में संबंधित फर्म की ओर से स्कूलों में कोई फर्नीचर पहुंचाए जाने की पुष्टि नहीं हुई। जांच एजेंसी ने इसे सरकारी राशि के कथित दुरुपयोग से जुड़ा अहम मामला माना है।
दूसरी फर्म को भी मिले 11.44 लाख रुपए
फर्नीचर सप्लाई में गड़बड़ी का एक और मामला महारानी स्टील एंड अप्लायंस से जुड़ा है। इस फर्म के संचालक प्रेमचंद जैन को 28 मार्च 2011 को 11 लाख 44 हजार 349 रुपए का भुगतान किया गया था।
जांच के मुताबिक, भुगतान मिलने के बावजूद फर्म ने किसी स्कूल में फर्नीचर नहीं पहुंचाया। प्रेमचंद जैन की 7 अगस्त 2025 को मृत्यु हो चुकी है। वहीं, बाकी आठ फर्मों के मामले में भी तय मात्रा से कम फर्नीचर सप्लाई करने की बात सामने आई है।
सरकारी खजाने को कैसे लगा 67.48 लाख का चूना?
EOW और ACB ने फर्मों को किए गए भुगतान और वास्तविक सप्लाई की जांच की। इसके आधार पर सरकारी राशि के कथित गबन का आकलन किया गया।
जांच एजेंसी ने आर्थिक नुकसान का यह विवरण दिया है।
| नुकसान का विवरण | राशि |
|---|---|
| सप्लाई नहीं किए गए फर्नीचर की कीमत | 56,84,848 रुपए |
| वैट की राशि | 9,47,938 रुपए |
| निरीक्षण शुल्क | 1,15,222.28 रुपए |
| कुल आर्थिक क्षति | 67,48,008.28 रुपए |
एजेंसी के अनुसार, फर्नीचर की अधूरी सप्लाई और भुगतान में गड़बड़ी के कारण सरकारी खजाने को यह नुकसान हुआ।
इन 10 आरोपियों के खिलाफ पेश हुआ चालान
EOW और ACB ने तत्कालीन जिला परियोजना समन्वयक समेत 10 लोगों को आरोपी बनाया है।
- सत्यप्रकाश पाण्डेय – तत्कालीन जिला परियोजना समन्वयक, राजीव गांधी शिक्षा मिशन
- संजय पटेल – दर्शन फेब्रिकेशन
- अजय कुमार अग्रवाल – अंबिका अलमीरा एंड स्टील फेब्रिकेटर्स
- ममता अग्रवाल – सेलेनो स्टील
- बिधी सिंह कटलारिया – महामाया फेब्रिकेटर्स
- राजकुमार बंसल – सूर्या स्टील एंड वुडन इंडस्ट्रीज
- संदीप तिवारी – श्री साई इंडस्ट्रीज
- हितेश कुमार अग्रवाल – श्याम मेटल प्रोडक्ट्स
- रितेश कुमार अग्रवाल – श्री श्याम इंडस्ट्रीज
- संजीव गुप्ता – पंकज फर्नीचर मार्ट
जांच एजेंसी का आरोप है कि तत्कालीन अधिकारी और संबंधित फर्म संचालकों ने मिलकर नियमों की अनदेखी की। इसके चलते सरकारी राशि का कथित गबन हुआ।
नोटिस के बाद भी नहीं पहुंचे, फिर हुई गिरफ्तारी
जांच एजेंसी ने सत्यप्रकाश पाण्डेय और संजय पटेल को पूछताछ के लिए कई बार नोटिस जारी किए थे। EOW/ACB के मुताबिक, दोनों अपना बयान दर्ज कराने के लिए जांच एजेंसी के सामने उपस्थित नहीं हुए।
इसके बाद 19 अगस्त 2026 को दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी की जानकारी उनके परिजनों को भी दी गई। दोनों को अंबिकापुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। अदालत ने उन्हें 24 अगस्त 2026 तक न्यायिक रिमांड पर भेजा था।
अब अदालत में होगी आरोपों की सुनवाई
EOW और ACB ने इस मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(डी) और 13(2) के साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी, 409 और 420 के तहत चालान पेश किया है।
करीब 20 हजार पन्नों के इस चालान में जांच से जुड़े दस्तावेज और आरोपों का विवरण शामिल किया गया है।अब विशेष न्यायालय में मामले की आगे सुनवाई होगी। अदालत सबूतों और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर फैसला करेगी।