हाई कोर्ट के आदेश की 9 महीने तक अनदेखी: आबकारी विभाग के दो बड़े अधिकारियों को अवमानना नोटिस जारी
90 दिन में फैसला करने का था आदेश
पूरा मामला जांजगीर-चांपा में पदस्थ प्रधान आरक्षक मुकेश कुमार शर्मा से जुड़ा है। मुकेश ने आबकारी उपनिरीक्षकपद के लिए विभागीय पदोन्नति परीक्षा दी थी। चयन प्रक्रिया के दौरान उनके सेवा रिकॉर्ड की कुछ प्रविष्टियों को आधार बनाया गया। वर्ष 2017 से 2019 तक की प्रतिकूल प्रविष्टियों के कारण उनके 15 अंक कम कर दिए गए। इसका सीधा असर उनकी पदोन्नति पर पड़ा और वे चयन प्रक्रिया से बाहर हो गए।
कर्मचारी ने हाई कोर्ट में दी थी चुनौती
मुकेश कुमार शर्मा ने विभाग के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी ओर से अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय ने याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि जिन प्रतिकूल प्रविष्टियों के आधार पर अंक काटे गए थे उनकी जानकारी कर्मचारी को पहले नहीं दी गई। उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं मिला।
मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने 16 दिसंबर 2025 को महत्वपूर्ण आदेश दिया था। जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने विवादित प्रतिकूल प्रविष्टियों को हटाकर मामले पर नए सिरे से विचार करने के निर्देश दिए थे।
कोर्ट ने विभाग से कहा था कि बाकी उपलब्ध सेवा रिकॉर्ड के आधार पर कर्मचारी की पदोन्नति पर दोबारा फैसला लिया जाए। इसके लिए 90 दिन की समय सीमा तय की गई थी।
नौ महीने बीते फिर भी नहीं हुआ फैसला
हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी विभाग की ओर से तय समय में कोई फैसला नहीं लिया गया। 90 दिन की समय सीमा निकलने के बाद भी मामला लंबित रहा। करीब नौ महीने गुजरने के बाद मुकेश शर्मा ने दोबारा हाई कोर्ट का रुख किया। इस बार उन्होंने न्यायालय के आदेश की अवहेलना का आरोप लगाते हुए अवमानना याचिका लगाई।
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि आदेश के पालन में देरी से कर्मचारी को समय पर राहत नहीं मिल पाई। ऐसे मामलों के कारण अदालतों में अवमानना से जुड़े प्रकरण भी बढ़ते हैं।
कोर्ट ने दोनों अफसरों से मांगा जवाब
मामले की सुनवाई जस्टिस पीपी साहू की सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने आबकारी कमिश्नर पीएस एल्मा और अपर आबकारी आयुक्त पीएल साहू को नोटिस जारी किया। हाई कोर्ट ने दोनों अधिकारियों से पूछा है
कि आदेश का पालन नहीं करने पर उनके खिलाफ न्यायालय अवमानना अधिनियम के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। दोनों अधिकारियों को तीन सप्ताह में जवाब पेश करना होगा। उनके जवाब के बाद कोर्ट तय करेगा कि मामले में आगे अवमानना की कार्रवाई शुरू की जाए या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हुआ था जिक्र
पहली याचिका पर फैसला देते समय हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रुखसाना शाहीन खान मामले में तय सिद्धांतों का भी उल्लेख किया था। अदालत का मानना था कि कर्मचारी के खिलाफ इस्तेमाल होने वाली प्रतिकूल प्रविष्टियों की जानकारी उसे दी जानी चाहिए। इसके बाद उसे अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर भी मिलना चाहिए।
अब मामला इस बात पर टिक गया है कि विभाग ने हाई कोर्ट के निर्देश का समय पर पालन क्यों नहीं किया। अधिकारियों के जवाब के बाद आगे की कार्रवाई की तस्वीर साफ होगी।
FAQ
- मुख्य आरक्षक मुकेश कुमार शर्मा का मामला क्या है?
मुख्य आरक्षक मुकेश कुमार शर्मा ने आबकारी उपनिरीक्षक पद के लिए विभागीय पदोन्नति परीक्षा दी थी, जिसमें उनके सेवा रिकॉर्ड के आधार पर प्रतिकूल प्रविष्टियों के कारण अंक काटे गए, जिससे वे चयन प्रक्रिया से बाहर हो गए। - हाईकोर्ट ने मुकेश शर्मा के मामले में क्या आदेश दिया था?
हाई कोर्ट ने 16 दिसंबर 2025 को आदेश दिया था कि विवादित प्रतिकूल प्रविष्टियों को हटाया जाए और मामले पर नए सिरे से विचार किया जाए, इसके लिए विभाग को 90 दिन की समय सीमा तय की गई थी। - अगर विभाग हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं करता है तो क्या होगा?
अगर विभाग आदेश का पालन नहीं करता है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ न्यायालय अवमानना अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा सकती है, जैसा कि वर्तमान मामले में हो रहा है।