छत्तीसगढ़ की नदियों के संरक्षण पर हाईकोर्ट सख्त, कहा- 'सिर्फ अफसरों की फौज से नहीं बचेंगी नदियां'
BILASPUR। राज्य से निकलने वाली नदियों के उद्गम स्थल आखिर क्यों सूख रहे हैं, यह जानने और इन स्थलों को तलाशने के लिए राज्य सरकार द्वारा कमेटी बनाई जाएगी। इसके साथ ही प्रदेश की 19 नदियों के संरक्षण और संर्वधन पर यह कमेटी काम करेगी। जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इसके आदेश दिए। इसके साथ ही सभी नदियों और उनके उद्गम स्थल को राजस्व रिकार्ड में दर्ज करने का भी आदेश दिया गया है।
दरअसल रिकार्ड में यह नदियां और उनके उद्गम स्थल फिलहाल नाले के रूप में दर्ज है। शासन द्वारा सोमवार को पेश जवाब में कहा गया कि 6 नदियों महानदी, हसदेव, तांदूला, पैरी, केलो, मांड के लिए कमेटी का गठन कर दिया गया है। हालांकि सरकार द्वारा बनाई गई इस कमेटी से हाईकोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ और नए सिरे से इसके गठन का निर्देश दिया है। दरअसल सरकार की कमेटी में 7 सचिव स्तर के अधिकारी और एक वाइस चांसलर है।
कोर्ट ने कमेटी में इतिहासकार, लेखक, पर्यावरणविद को भी शामिल करने कहा है। मामले की अगली सुनवाई 7 मई को होगी। अरपा नदी के साथ ही प्रदेश की अन्य नदियों के संरक्षण और संवर्धन की मांग करते हुए लगाई गई जनहित याचिका पर सोमवार को सुनवाई हुई। हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि अरपा में सालभर पानी की योजना के साथ प्रदेश की 9 प्रमुख नदियों के रिवाइवल की योजना पर काम किया जा रहा है। सरकार ने इस बात पर भी सहमति जताई कि नई कमेटी गठित कर नदियों के स्रोतों की पहचान और संरचना सुनिश्चित की जाएगी।
कमेटी में आम लोगों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं
कोर्ट में पेश जवाब में कहा गया कि राज्य की प्रमुख नदियों के पुनरुद्धार एवं पुनर्जीवित करने हेतु मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय समिति का गठन किया गया है। इसमें अध्यक्ष मुख्य सचिव, छत्तीसगढ़ शासन, सचिव, छत्तीसगढ़ शासन, वित्त विभाग सदस्य सचिव, एवं ग्रामीण विकास विभाग सदस्य सचिव, जल संसाधन विभाग सदस्य, सचिव, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, सदस्य सचिव, भौमिकी एवं खनिज साधन विभाग, सचिव, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग, एम.के. वर्मा, सेवानिवृत्त कुलपति, स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय, दुर्ग सदस्य शामिल हैं।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद इस शपथ पत्र के अनुसार बनाई गई राज्य स्तरीय समिति को संतोषजनक नहीं बताया। चीफ जस्टिस ने कहा कि इस समिति में स्थानीय आमजनों का कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं है कोई जनप्रतिनिधि भी शामिल नहीं किया गया है, इसलिए यह समिति फिर से गठित करने की जरूरत है। इसमें सिर्फ अधिकारी वर्ग ही शामिल है। याचिकाकर्ताओं ने भी समिति को अपर्याप्त बताया।
इतिहासकार, लेखक, पर्यावरणविद रहेंगे कमेटी में
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य से निकलने वाली नदियों के उद्गम स्थल आखिर क्यों सूख रहे हैं, यह जानने और इन स्थलों को तलाशने के लिए राज्य सरकार द्वारा जो कमेटी बनाई गई है उसमें सभी सरकारी अधिकारी हैं, इसलिए इसे पूरा नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि कमेटी में जानकार, तकनीकी अधिकारी अफसर, इतिहासकार, लेखक और पर्यावरणविद भी शामिल किए जाने चाहिए। यह कमेटी उद्गम स्थलों को पुनर्जीवित करने और इनसे पानी का बहाव बनाए रखने की दिशा में काम करेगी।
कमेटी का सबसे पहला काम होगा नदियों के उद्गमों की तलाश करना। शासन ने कहा कि जिन जिलों से नदियों का उद्गम है वहां के कलेक्टर इसके अध्यक्ष रहेंगे। इसके साथ ही खनिज, वन और जिला पंचायत के अधिकारी कमेटी के सदस्य होंगे।
प्राकृतिक प्रवाह पर भी ध्यान देने की जरूरत
याचिकाकर्ता अरविंद शुक्ला ने बताया कि सरकार नदियों के उदगम स्थल के संरक्षण की बात तो कर रही है लेकिन इसके बाद आगे 2 किलोमीटर क्षेत्र तक के प्राकृतिक प्रवाह पर ध्यान नहीं है। इन क्षेत्रों में कब्जा करते हुए खेती हो रही है। इसे भी संरक्षित करना होगा। कहीं कोई निजी जमीन है तो उसका अधिग्रहण सरकार को करना होगा, कब्जे हटाने होंगे। इसके बाद ही नदियों का प्रवाह बेहतर हो सकेगा। हाईकोर्ट ने इस पर सहमति जताते हुए सरकार को इस तरफ ध्यान देने कहा है। ध्यान रहे कि छत्तीसगढ़ में 19 छोटी-बड़ी नदियों का उद्गम है जिन पर कब्जा हो चुका है।
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