सौम्या-आरती के कारण अटका अधिकारियों का प्रमोशन, IAS के 27 पद खाली
Raipur। छत्तीसगढ़ में IAS बनने की कतार में खड़े राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों के सामने पुराना पेच खड़ा है। मामला दो निलंबित अधिकारियों की फाइलों से जुड़ा है। वरिष्ठता सूची में ऊपर होने के कारण सौम्या चौरसिया और आरती वासनिक की फाइलें IAS अवार्ड की प्रक्रिया से बाहर नहीं होतीं। जांच और निलंबन के कारण इन पर फैसला नहीं होता, लेकिन इनकी वजह से खाली पदों और वरिष्ठता की पूरी प्रक्रिया प्रभावित होने का सवाल जरूर उठ रहा है।
नियम ऐसा, असर सब पर
राज्य सेवा से IAS में जाने के लिए वरिष्ठता और पात्रता के आधार पर चयन की प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में अगर कोई अधिकारी निलंबित है या उसके खिलाफ विभागीय जांच चल रही है तो उसकी फाइल को सीलबंद लिफाफे में रखा जा सकता है। यानी कमेटी के सामने अधिकारी की स्थिति दर्ज रहती है, लेकिन उसके प्रमोशन पर फैसला नहीं किया जाता।
यहीं से सवाल उठता है कि किसी एक अधिकारी के खिलाफ चल रही जांच का असर बाकी अफसरों की प्रमोशन प्रक्रिया पर कितने समय तक रहना चाहिए?
दो फाइलें, दो पेंच
सौम्या चौरसिया 2008 बैच की राज्य प्रशासनिक सेवा अधिकारी हैं। दिसंबर 2022 में ईडी की कार्रवाई के बाद उन्हें निलंबित किया गया था। उन पर कोयला परिवहन से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जांच और मुकदमे की कार्रवाई हुई है। सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें सशर्त जमानत मिली थी, जबकि निलंबन जारी रहने की बात रिपोर्टों में सामने आई थी।
आरती वासनिक भी 2008 बैच की अधिकारी हैं। उपलब्ध वरिष्ठता सूची की रिपोर्ट के मुताबिक उनका नाम सौम्या चौरसिया के बाद है और वे 26 नवंबर 2025 से निलंबित बताई गई हैं।
हर DPC में वही कहानी
वरिष्ठता में ऊपर होने के कारण इन अधिकारियों की स्थिति को नजरअंदाज करके आगे बढ़ना आसान नहीं है। नतीजा यह कि DPC यानी प्रमोशन कमेटी की प्रक्रिया में इनकी फाइलें भी सामने आती हैं। जांच पूरी नहीं होने की स्थिति में सीलबंद लिफाफे का नियम लागू होता है और बाकी प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
यही व्यवस्था अब सवालों के घेरे में है। सवाल यह नहीं कि जांच चल रही है तो नियम क्यों लागू हुआ। सवाल यह है कि जांच अगर सालों तक चलती रहे तो उसका असर दूसरे पात्र अधिकारियों के करियर पर कितने समय तक पड़ेगा?
नियम का मकसद भी समझिए
सीलबंद लिफाफे की व्यवस्था का मकसद भी है। अगर किसी अधिकारी को प्रमोशन से रोकने के लिए शिकायतों का सिलसिला शुरू हो जाए तो प्रमोशन व्यवस्था ही विवादों में फंस सकती है। फर्जी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के आधार पर अधिकारियों को सालों तक प्रमोशन से रोकना भी ठीक नहीं होगा।
लेकिन दूसरा सवाल इससे भी बड़ा है। अगर जांच लंबी खिंचती है और अधिकारी की फाइल हर बार सीलबंद ही रहती है तो क्या बाकी अधिकारियों के लिए कोई समयसीमा या अलग रास्ता होना चाहिए?
पांच पद, चर्चा में तीन नाम
इस साल राज्य प्रशासनिक सेवा से IAS अवार्ड के (आईएएस प्रमोशन) लिए पांच पद खाली थे। प्रमोशन के लिए डीपीसी हुई जिसमें पहला नाम सौम्या चौरसिया और आरती वासनिक का था। अन्य तीन फाइल 2013 बैच के अधिकारी अभिषेक अग्रवाल, सचिन भूतड़ा और राजीव पांडे की थी। लेकिन निलंबन के कारण हर बार की तरह सौम्या चौरसिया और आरती वासनिक की फाइल पर चर्चा भी नहीं हुई। ऐसे में दो पद खाली रह गए।
155 IAS वाला हिसाब भी उलझा
राज्य में IAS कैडर की स्वीकृत संख्या और वास्तविक पदस्थापना को लेकर भी अलग-अलग आंकड़े सामने आते रहे हैं। केंद्र के ताजा कैडर स्ट्रेंथ दस्तावेज में छत्तीसगढ़ के लिए कुल अधिकृत IAS कैडर स्ट्रेंथ 202 दिखाई गई है।
राज्य सेवा के सैकड़ों अधिकारी वरिष्ठता और पात्रता के आधार पर IAS बनने की कतार में हैं। ऐसे में सवाल सीधा है: जांच वाले अफसर की फाइल नियम के मुताबिक सीलबंद रहे, लेकिन बाकी अफसरों की राह कब तक बंद रहेगी?
अब नियम पर बहस जरूरी
कानून और नियम का पालन होना चाहिए, लेकिन व्यवस्था की समीक्षा भी होती रहनी चाहिए। अगर किसी जांच का कोई तय अंत नहीं है और हर साल वही फाइल DPC में जाकर सीलबंद हो रही है, तो इससे प्रमोशन व्यवस्था में अनिश्चितता पैदा होती है।
छत्तीसगढ़ में इस बार पांच पदों की प्रक्रिया के बीच यही सबसे बड़ा सवाल है। क्या मौजूदा नियम सिर्फ विवादित अधिकारियों की स्थिति सुरक्षित रख रहा है, या बाकी अधिकारियों के प्रमोशन का इंतजार भी अनिश्चित कर रहा है?
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