छत्तीसगढ़ में फार्मेसी की 6 हजार सीटें खाली, B.Pharma और D.Pharma में घटा छात्रों का रुझान, 30 अक्टूबर तक प्रवेश
अब छात्रों को 30 अक्टूबर तक एडमिशन लेने का मौका मिलेगा। वहीं फार्मेसी एसोसिएशन ने इस स्थिति पर चिंता जताई है।
बी.फार्मा में 2200 सीटें खाली
प्रदेश में बैचलर ऑफ फार्मेसी यानी बी.फार्मा की कुल 4 हजार सीटें हैं। इनमें से करीब 2200 सीटों पर अब तक एडमिशन नहीं हुआ है। वहीं डिप्लोमा इन फार्मेसी यानी डी.फार्मा की स्थिति भी कुछ खास अच्छी नहीं है। इस कोर्स की कुल 8 हजार सीटों में से करीब 3800 सीटें खाली हैं।
इस तरह दोनों कोर्स में कुल 6 हजार सीटें खाली हैं। इतनी बड़ी संख्या में सीटें नहीं भरने से कॉलेज प्रबंधन की चिंता बढ़ गई है।
30 अक्टूबर तक प्रवेश का मौका
खाली सीटों को भरने के लिए संस्थागत चरण की अनुमति दी गई है। इसके तहत छात्रों को 30 अक्टूबर 2026 तक प्रवेश लेने का मौका मिलेगा। कॉलेजों को उम्मीद है कि इस प्रक्रिया से कुछ सीटें भर सकेंगी। हालांकि सवाल यह भी है कि फार्मेसी जैसे महत्वपूर्ण कोर्स में छात्र दिलचस्पी क्यों नहीं दिखा रहे हैं?
नौकरी नहीं मिलने से घटा रुझान
फार्मेसी एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने इस स्थिति को गंभीर बताया है। उनके मुताबिक उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों की संख्या लगातार कम हो रही है। फार्मेसी जैसे रोजगार से जुड़े कोर्स में सीटें खाली रहना चिंता की बात है।
उन्होंने इसके पीछे रोजगार के सीमित अवसर और प्रवेश के कठिन नियमों को बड़ी वजह बताया है। उनका कहना है कि सरकार को इस मामले पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
कम वेतन भी बना बड़ी परेशानी
फार्मेसी की पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्रों के सामने रोजगार की चुनौती रहती है। सरकारी क्षेत्र में नौकरियों के अवसर सीमित हैं। ऐसे में ज्यादातर युवाओं को निजी अस्पतालों, मेडिकल स्टोर और दवा कंपनियों का सहारा लेना पड़ता है।
रिपोर्ट के मुताबिक निजी फार्मेसी स्टोर में शुरुआती वेतन अक्सर 8 हजार से 15 हजार रुपए मासिक तक रहता है। कई जगह काम के घंटे ज्यादा होते हैं। अनुभव नहीं होने पर अच्छी नौकरी मिलना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कुछ युवा दूसरे क्षेत्रों में रोजगार तलाशने लगते हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं में अहम भूमिका
फार्मेसी का क्षेत्र सिर्फ मेडिकल स्टोर चलाने तक सीमित नहीं है। दवाओं की गुणवत्ता जांचने से लेकर मरीजों को सही जानकारी देने तक फार्मासिस्ट की अहम भूमिका होती है।
अस्पतालों, दवा निर्माण कंपनियों, रिसर्च लैब और क्लिनिकल रिसर्च में भी फार्मेसी की पढ़ाई करने वालों के लिए अवसर होते हैं। इसके बावजूद छात्रों का घटता रुझान चिंता बढ़ा रहा है।
कॉलेजों पर भी पड़ सकता है असर
बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने से फार्मेसी कॉलेजों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है। इसका असर शिक्षकों और दूसरे कर्मचारियों पर भी पड़ने की आशंका है। लंबे समय तक यही स्थिति बनी रही तो संस्थानों को संचालन में मुश्किलें आ सकती हैं। वहीं भविष्य में प्रशिक्षित फार्मासिस्ट की उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है।
रोजगार के अवसर बढ़ाने की मांग
फार्मेसी क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि केवल प्रवेश की तारीख बढ़ाना काफी नहीं है। छात्रों को पढ़ाई के बाद रोजगार के बेहतर अवसर भी मिलने चाहिए।
इसके लिए सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में फार्मासिस्ट के पद बढ़ाने की जरूरत बताई जा रही है। साथ ही दवा कंपनियों में इंटर्नशिप और प्लेसमेंट की सुविधाएं मजबूत करने की मांग है।
फार्मेसी एसोसिएशन ने प्रवेश प्रक्रिया को आसान बनाने और युवाओं को स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित करने पर भी जोर दिया है।
फिलहाल कॉलेजों की नजर 30 अक्टूबर तक होने वाले प्रवेश पर है। इस दौरान कितनी सीटें भरेंगी, यह देखना होगा। हालांकि खाली सीटों ने फार्मेसी की पढ़ाई और रोजगार के अवसरों को लेकर नई बहस जरूर शुरू कर दी है।