सिंहासन छत्तीसी : मेडम की सियासत ढलान पर,PSO की हनक आसमान पर, तमंचे पर हो रही बैठक,मीटिंग में उतरी माननीय की लू

Arun Tiwari | Nov 01, 2026, 13:18 IST
छत्तीसगढ़ की सियासत में पीएसओ की दबंगई, पिस्तौल वाली बैठक और केक कांड चर्चा में।
रायपुर : इन दिनों छत्तीसगढ़ की सियासत का पारा गरम है। बीजेपी की प्रदेश प्रभारी स्मृति इरानी के दौरे ने पारे को और चढ़ा दिया है। प्रदेश में बीजेपी की एक बड़ी नेत्री हैं जिनके सितारे आजकर गर्दिश में चल रहे हैं लेकिन उनके पीएसओ का जलवा बरकरार है। पीएसओ की दादागिरी और तेवर मेडम की सियासत पर भारी पड़ने हैं। छत्तीसगढ़ में एक और अजब काम हो रहा है।

सरकारी अधिकारियों की मीटिंग तमंचे के डर के साये में हो रही है। इस मीटिंग में प्रायवेट आदमी भी बैठता है जो अपनी लाइसेंसी रिवाल्वर लेकर आता है। फिर क्या है जंगल में मंगल हो जाता है। हाल ही में हुई बीजेपी की बैठकों में एक माननीय की लू उतर गई।



वहीं साहब ने सड़क पर केक काटा और एफआईआर हो गई गाड़ी वाले पर। छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों की ऐसी ही अनसुनी खबरों के लिए पढ़िए द सूत्र का साप्ताहिक कॉलम सिंहासन छत्तीसी।




सुरक्षा की ड्यूटी या ठेकेदारी की हनक

सियासत में कुर्सी का मिजाज कब बदल जाए, कोई ठिकाना नहीं। कल तक जिनके इशारे पर सियासी गलियारों में हलचल मचती थी, आज उनकी राजनीतिक पारी ढलान पर बताई जा रही है। लेकिन लगता है कि मैडम के एक खासमखास की घड़ी अब भी पुराने दौर में ही अटकी हुई है।



कभी राष्ट्रीय स्तर पर डंका बजाने वाली फायर ब्रांड बीजेपी नेत्री की सियासी चमक भले कुछ फीकी पड़ी हो, लेकिन उनके PSO साहब के तेवरों की चमक बरकरार है। चर्चा तो यहां तक है कि साहब की हनक के आगे पद और प्रोटोकॉल भी कभी-कभी पानी भरते नजर आते हैं।




ताजा चर्चा एक नेता से उलझने की है। वजह भी कोई सुरक्षा व्यवस्था या वीआईपी मूवमेंट नहीं, बल्कि ठेकेदारी का मामला बताया जा रहा है। अब सुरक्षा में तैनात साहब ठेकेदारी के काम को लेकर जिला संगठन के मुखिया से ही भिड़ जाएं, तो सवाल उठना लाजिमी है।



अध्यक्ष जी ने भी गजब का संयम दिखाया। नेत्री की प्रतिष्ठा का ख्याल रखा, विवाद को सार्वजनिक तूल नहीं दिया और बात को आगे बढ़ाने के बजाय बातचीत ही बंद कर दी। ताजा मामले की परतें खुलीं तो एक पुराना किस्सा भी बाहर आ गया। पता चला कि ठेकेदारी को लेकर साहब की गर्मागर्मी का अनुभव जिला अध्यक्ष तक ही सीमित नहीं रहा।



चर्चा है कि कुछ समय पहले इसी तरह के एक मामले में कलेक्टर से भी उनकी ठन गई थी। उस वक्त चैंबर में प्रदेश से आए अधिकारी भी मौजूद थे। मामला इतना बढ़ा कि कलेक्टर को आखिरकार साहब से गेट आउट तक कहना पड़ा।राजनीति में वक्त का पहिया बड़ी तेजी से घूमता है।




आज जो सत्ता के करीब है, कल उसे भी अपनी हैसियत का हिसाब देना पड़ सकता है। ऐसे में समर्थकों और करीबियों का संयम ही नेता की प्रतिष्ठा की असली ढाल होता है। लेकिन जब अपने ही लोग जरूरत से ज्यादा तेवर दिखाने लगें, तो विरोधियों को मेहनत करने की जरूरत ही क्या रह जाती है।



जंगल में मंगल और टेबल पर पिस्तौल

सुना है कि जंगल के महकमे में इन दिनों एक नई परंपरा जन्म ले रही है। चर्चा है कि एक निजी ठेकेदार विभागीय बैठक में टेबल पर अपनी लाइसेंसी पिस्तौल रखकर अधिकारियों की बैठक लेता है। अब इसे साहस कहें, रसूख कहें या फिर जंगल में मंगल मनाने का नया तरीका।



वैसे, जंगल के मामले में एक पुरानी कहावत बड़ी मौजूं है जंगल में मोर नाचा, किसने देखा! लेकिन यहां तो कहानी कुछ उलटी ही सुनाई दे रही है। चर्चा है कि मोर नाच भी रहा है, पंख भी फैला रहा है और जंगल के रखवालों के सामने ही अपनी कला का प्रदर्शन भी कर रहा है।



विभागीय गलियारों में चर्चा है कि ठेकेदारों की एक बैठक बुलाई गई। बैठक में विभाग के बड़े अधिकारी की भूमिका भी बताई जा रही है, लेकिन असली चर्चा उस निजी प्रतिनिधि की है, जिसे ठेकेदारों के बीच भेजे जाने की बात कही गई।




सूत्र कहते हैं कि इस प्रतिनिधि को ठेकेदारों के बीच कामकाज से जुड़ी व्यवस्था तय करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। कौन ठेकेदार काम करेगा, किसे कितना काम मिलेगा और लेनदेन का गणित क्या होगा।



अब यह तो तभी मुमकिन है जब किसी बड़े का हाथ तमंचे वाले भाईसाब के सिर पर हो। तो जाहिर सी बात है साहब के इशारे पर ही यह सब काम हो रहा है,इतना तो समझा ही जा सकता है।



हर पोस्ट में मैडम को टैग करना पड़ा भारी

छत्तीसगढ़ में एक विधायक जी ऐसे भी हैं, जिनकी राजनीतिक सक्रियता का पैमाना विधानसभा में उठाए गए सवालों या जनता के बीच किए गए कामों से कम और फेसबुक पर पोस्ट की गई तस्वीरों, टैगिंग और लाइक्स से ज्यादा मापा जाता है।



विधायक जी जनप्रतिनिधि कम और फेसबुकिया ज्यादा हैं। सोशल मीडिया पर चमकने की खुजली ऐसी कि कई बार खुजली मिटाने के चक्कर में अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा कर देते हैं। छत्तीसगढ़ आईं मेडम के पहले दौरे पर बैठकों का दौर चल रहा था।



नेताओं के परिचय का सिलसिला शुरू हुआ। सब अपनी-अपनी राजनीतिक पहचान और जिम्मेदारियां बता रहे थे। जब फेसबुकिया विधायक जी की बारी आई, तो उन्होंने अपना परिचय देने के साथ एक खास बात और जोड़ दी। बताया कि वे देश में अपने समाज के इकलौते विधायक हैं।



अब विधायक जी को लगा होगा कि इस अतिरिक्त जानकारी से उनका राजनीतिक कद कुछ और ऊंचा हो जाएगा। लेकिन मैडम का नजरिया कुछ अलग निकला। बताते हैं कि यह सुनते ही उनका पारा चढ़ गया।



उन्होंने तपाक से कह दिया कि परिचय विधायक के तौर पर मांगा गया है, समाज के प्रतिनिधि के तौर पर नहीं!लेकिन असली क्लास तो इसके बाद लगी। चर्चा है कि मैडम ने विधायक जी की फेसबुक सक्रियता का हिसाब भी उसी बैठक में मांग लिया।



सवाल कुछ इस अंदाज में था कि हर पोस्ट में उन्हें टैग करने की जरूरत आखिर क्या है। साथ ही हिदायत भी दे दी कि अब यह सब बंद करें और चुपचाप बैठें। अब बेचारे विधायक जी को कौन समझाए कि राजनीति में पहचान बनाने और हर पोस्ट में बड़े नेताओं को टैग करके पहचान चमकाने में फर्क होता है।



केक कांड में साहब बचे,गाड़ी मालिक नपे

सड़क पर केक काटने और आतिशबाजी करने का शौक अब नायब तहसीलदार को भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। अभनपुर में पदस्थ साहब के इस कारनामे की चर्चा पहले ही हो चुकी है, लेकिन अब मामला राज्यपाल के दरबार तक पहुंच गया है। शिकायतकर्ता ने ईमेल से ज्ञापन भेजकर साहब के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और विभागीय कार्रवाई की मांग कर दी है।



इस पूरे किस्से में सबसे दिलचस्प सवाल यही है कि सड़क पर केक काटने वाले साहब पर कार्रवाई क्यों नहीं। अगर सड़क पर केक काटने के मामले में कार मालिक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा सकती है, तो केक काटने वाले व्यक्ति को किस आधार पर राहत मिल रही है।



क्या कार का मालिक होना ही सबसे बड़ा गुनाह है और केक काटने वाले का सरकारी पद उसे विशेष छूट दिला देता है। केक कार ने तो नहीं काटा था! आतिशबाजी भी गाड़ी ने अपने आप नहीं की होगी।



फिर कार्रवाई का पूरा हिसाब-किताब सिर्फ वाहन मालिक के नाम क्यों लिखा जा रहा है। जबकि केके काटते साहब वीडियो में साफ नजर आ रहे हैं। तो फिर यह दोहरा कानून क्यों। साहब को किस आधार पर छूट दी गई।

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