छत्तीसगढ़ में आलू की कीमत ; 20 साल में सबसे कम दाम, पर आम आदमी की थाली अब भी महंगी
NEWS IN SHORT
- बंपर पैदावार से थोक भाव 20 साल में सबसे कम ₹7 किलो तक गिरे।
- युद्ध के कारण खाड़ी देशों में आलू जाना बंद, देश में स्टॉक बढ़ा।
- बंगाल से आलू सस्ते में आ रहा, पर ₹2.50 किराया लागत बढ़ा रहा।
- थोक में ₹7 का आलू आम जनता को ₹20 तक बेचा जा रहा।
- डिमांड कम और सप्लाई ज्यादा होने से किसानों व व्यापारियों को भारी घाटा।
NEWS IN DETAIL
छत्तीसगढ़ की मंडियों में इन दिनों आलू की कीमतों पर युद्ध का असर पड़ रहा है। जहाँ एक तरफ आलू का उत्पादन देश भर में डेढ़ गुना बढ़ गया है और थोक मंडियों में इसके दाम मिट्टी के भाव हो गए हैं, वहीं दूसरी ओर आम उपभोक्ताओं को अब भी यह दोगुनी से ज्यादा कीमत पर खरीदना पड़ रहा है। 20 सालों के रिकॉर्ड तोड़ते हुए थोक बाजार में आलू 7 रुपए किलो तक गिर गया है, लेकिन चिल्हर बाजारों की लूट पर कोई लगाम नहीं है।
20 साल का रिकॉर्ड टूटा, थोक बाजार धराशायी
भनपुरी आलू-प्याज मंडी के अध्यक्ष अजय अग्रवाल के मुताबिक, पिछले दो दशकों में आलू की इतनी कम कीमतें कभी नहीं देखी गईं। आमतौर पर अच्छी गुणवत्ता वाला आलू थोक में 10 रुपए से 12 रुपए प्रति किलो बिकता है, लेकिन इस बार यह 7 रुपए के स्तर पर आ गया है। इस गिरावट की मुख्य वजह देश भर में हुई बंपर पैदावार और वैश्विक परिस्थितियां हैं। इजरायल-हमास और ईरान युद्ध के चलते खाड़ी देशों को होने वाला निर्यात पूरी तरह ठप है। जिससे देश का स्टॉक घरेलू मंडियों में डंप हो गया है।
छत्तीसगढ़ पर दोहरी मार
छत्तीसगढ़ मुख्य रूप से पड़ोसी राज्यों पर निर्भर है। रायपुर, दुर्ग और बस्तर संभाग के लोग पश्चिम बंगाल के आलू को पसंद करते हैं, जबकि बिलासपुर और सरगुजा संभाग में उत्तर प्रदेश से आने वाले आलू की खपत अधिक है। इस बार दोनों ही राज्यों में फसल उम्मीद से कहीं ज्यादा हुई है।
व्यापारियों के लिए गणित बिगड़ गया है। बंगाल से आलू 4.00 रुपए से 4.50 रुपए में आ रहा है, लेकिन उस पर 2.50 रुपए का भारी-भरकम भाड़ा लग रहा है। ऐसे में रायपुर पहुँचते-पूँछते इसकी लागत 7 रुपए हो जाती है। व्यापारी बिना किसी मुनाफे के इसे बेच रहे हैं ताकि स्टॉक खत्म हो सके।
चिल्हर बाजार में ग्राहकों से वसूली
हैरानी की बात यह है कि थोक में दाम गिरने का फायदा आम जनता को नहीं मिल रहा है। रायपुर के शास्त्री बाजार जैसी मंडियों में आलू 15 रूपए किलो बिक रहा है। वहीं गलियों और मोहल्लों में ठेले वाले इसे 20 रुपए किलो तक बेच रहे हैं। यानी थोक और चिल्हर के बीच 150% से 200% तक का अंतर है।
किसानों और कारोबारियों की टूटी कमर
इस स्थिति ने छत्तीसगढ़ के स्थानीय छोटे उत्पादकों और बड़े थोक व्यापारियों, दोनों को संकट में डाल दिया है। स्थानीय स्तर पर सरगुजा और बस्तर में आलू उगाने वाले किसानों को लागत निकालना मुश्किल हो रहा है। जानकारों का कहना है कि जब तक निर्यात के रास्ते दोबारा नहीं खुलते या सरकार भंडारण के लिए विशेष व्यवस्था नहीं करती, तब तक बाजार में यह अनिश्चितता बनी रहेगी।
निष्कर्ष
देश भर में आलू की बंपर पैदावार और निर्यात बंद होने से थोक दाम 20 साल के निचले स्तर पर हैं। हालांकि, भारी भाड़े और बिचौलियों के कारण आम आदमी को इसका लाभ नहीं मिल रहा। थोक में 7 रुपए का आलू चिल्हर में 20 रुपए बिकना प्रशासन की अनदेखी और मुनाफाखोरी को दर्शाता है।
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