एक साल से दस्तावेज पढ़ रही CBI 1000 करोड़ के समाज कल्याण घोटाले में चार्जशीट का इंतजार, बड़े IAS नामों से सवाल
अब जांच पूरी होने की बात सामने आ रही है, लेकिन चार्जशीट अभी अदालत में नहीं पहुंची है।
कोर्ट ने कहा था- अधिकारी बड़े हैं
इस केस की सबसे अहम कड़ी 2020 का हाईकोर्ट आदेश है। अदालत ने कहा था कि मामले में जिन अधिकारियों के नाम सामने आए हैं, वे ऊंचे पदों पर रहे हैं और इसलिए स्थानीय स्तर पर जांच प्रभावित होने की आशंका है। इसी वजह से CBI जैसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने CBI को FIR दर्ज करने, मूल रिकॉर्ड जब्त करने और निष्पक्ष जांच जल्द पूरी करने को कहा था।
कौन-कौन से बड़े नाम?
मामले की याचिका में पूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांढ और सुनील कुजूर, पूर्व वरिष्ठ IAS अधिकारी आलोक शुक्ल, एमके राउत, बीएल अग्रवाल, इसके अलावा सतीश पांडे, पीपी सोती, राजेश तिवारी और अशोक तिवारी समेत कई अधिकारियों के नाम दर्ज हैं। तत्कालीन महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका सिंह का नाम भी मामले है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन नामों का कोर्ट रिकॉर्ड में होना अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करता। मामले में संबंधित अधिकारियों की भूमिका जांच का विषय है।
1000 करोड़ का आंकड़ा आया कहां से?
मामले की शुरुआत में याचिकाकर्ता ने बड़े पैमाने पर सरकारी धन की हेराफेरी के दस्तावेज अदालत के सामने रखे थे। 2020 के हाईकोर्ट आदेश में याचिका के हवाले से करीब 1000 करोड़ रुपए तक की संभावित हेराफेरी का अनुमान दर्ज है। आरोप था कि दिव्यांगों के पुनर्वास के नाम पर चलने वाले SRC और PRRC में कागजों पर कर्मचारी दिखाए गए, उनके नाम से वेतन निकाला गया और कई वित्तीय लेन-देन में गड़बड़ी हुई। अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों और राज्य के जवाब को देखते हुए मामले की स्वतंत्र जांच जरूरी मानी थी।
1000 करोड़ से 40 करोड़ पर आया आंकड़ा
यहां एक बड़ा सवाल रकम को लेकर भी है। शुरुआत में याचिका और आरोपों में घोटाले की रकम 1000 करोड़ रुपए से ज्यादा बताए जाने की बात सामने आई थी। लेकिन CBI की पड़ताल में 2004 से 2018 के बीच दोनों संस्थाओं का वास्तविक खर्च करीब 35 से 40 करोड़ रुपए पाया गया है। अब असली सवाल यह है कि अंतिम चार्जशीट में CBI कितनी रकम की वित्तीय अनियमितता और गबन साबित करती है।
कागजों पर कर्मचारी, खाते से रकम
याचिका में सबसे गंभीर आरोप यह था कि ऐसे लोगों के नाम पर भी भुगतान दिखाया गया, जो वास्तव में PRRC में काम नहीं कर रहे थे। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक कुछ सरकारी कर्मचारियों के नाम पर भी नकद भुगतान दिखाए जाने की बात सामने आई थी। राज्य की ओर से दाखिल जवाब में भी PRRC में वेतन निकासी की सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं होने और बाद में कराए गए ऑडिट में अनियमित व अवैध नकद निकासी प्रथमदृष्टया पाए जाने का उल्लेख था।
फिर CBI की रफ्तार पर सवाल क्यों?
यही इस समय सबसे बड़ा सवाल है। जिस मामले में हाईकोर्ट ने 2020 में ही जल्द और स्वतंत्र जांच का निर्देश दिया था, वह मामला सालों बाद भी अंतिम कानूनी कार्रवाई का इंतजार कर रहा है। बीच में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के कारण जांच पर रोक भी लगी थी। बाद में हाईकोर्ट के निर्देश के बाद CBI ने जांच आगे बढ़ाई। अब यदि जांच पूरी हो चुकी है तो चार्जशीट अदालत में दाखिल होने में देरी क्यों?
बड़े IAS नाम आते ही क्या बदल गई रफ्तार?
यही वह सवाल है, जिसका जवाब CBI को देना चाहिए। क्या इतने बड़े अधिकारियों के नाम सामने आने के कारण जांच का हर कदम ज्यादा धीमा हो गया? क्या दस्तावेजों की संख्या ही देरी की वजह है या फिर जांच में सामने आए तथ्यों की कानूनी जांच में समय लग रहा है? अभी ऐसा कोई सार्वजनिक प्रमाण नहीं है कि CBI किसी अधिकारी के दबाव में कार्रवाई रोक रही है। लेकिन जब अदालत खुद कह चुकी हो कि ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों के कारण जांच प्रभावित होने की आशंका है, तब जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट में देरी सवाल जरूर पैदा करती है।
व्हिसलब्लोअर को नौकरी, अलग सवाल
मामले को सामने लाने वाले कुंदन सिंह ठाकुर की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने ही आरोपों को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था। बाद में उन्हें समाज कल्याण विभाग में संविदा नियुक्ति दिए जाने को लेकर भी सवाल उठे। ऐसे में यह पूछना स्वाभाविक है कि जिस व्यक्ति की शिकायत ने पूरे मामले को राष्ट्रीय जांच एजेंसी तक पहुंचाया, उसी व्यक्ति को दोबारा उसी विभाग से जोड़ने का फैसला क्यों किया गया?
क्या जांच के साथ शिकायतकर्ता भी सिस्टम में?
यह महज संयोग है या इसके पीछे कोई प्रशासनिक रणनीति थी, इसका जवाब विभाग को देना चाहिए। क्या नौकरी देकर शिकायतकर्ता को संतुष्ट करने की कोशिश हुई? क्या इससे मामले की धार कमजोर करने का कोई प्रयास हुआ? इन सवालों के जवाब बिना दस्तावेजी प्रमाण के तय नहीं किए जा सकते, लेकिन इतने बड़े मामले में पारदर्शिता के लिए इनका जवाब जरूरी है।
अब नजर CBI की चार्जशीट पर
मामले में सबसे बड़ा खुलासा अब CBI की चार्जशीट से होगा। उसमें कौन-कौन से अधिकारी जिम्मेदार ठहराए जाते हैं, कितनी वित्तीय अनियमितता प्रमाणित होती है और किन धाराओं में कार्रवाई की जाती है—यही तय करेगा कि वर्षों से चल रही यह जांच आखिर किस मुकाम पर पहुंची। सवाल सीधा है: अगर जांच पूरी है तो चार्जशीट कब? और अगर पूरी नहीं है तो एक साल बाद भी जांच कहां अटकी है?