छत्तीसगढ़ के 26 साल : हमारी बोली बची, लेकिन क्या अगली पीढ़ी उसे बोलती है, नई पीढ़ी से दूर हो रही हैं छत्तीसगढ़ की बोलियां
समझें क्या है पूरा मामला
- घरों में बातचीत के दौरान हिंदी और अंग्रेजी के शब्द बढ़ रहे हैं।
- यह बदलाव हर परिवार में एक जैसा नहीं है।
- कुछ जगह छत्तीसगढ़ी का इस्तेमाल कम हुआ है, तो कहीं इसका चलन बढ़ा है।
- छत्तीसगढ़ी भाषा खत्म नहीं हो रही, बल्कि समय के साथ बदल रही है।
घर के आंगन में क्या दिखता है?
दादी पोते को छत्तीसगढ़ी में कहानी सुनाना चाहती हैं। बच्चा बात समझ लेता है, पर जवाब हिंदी में देता है। कुछ देर बाद बातचीत में अंग्रेजी के शब्द भी आ जाते हैं।इस खबर के मुताबिक यह दृश्य हर परिवार का प्रतिनिधित्व नहीं करता। पर भाषा के बदलते इस्तेमाल को समझने का यह एक शुरुआती बिंदु है।
छत्तीसगढ़ में कौन-कौन सी बोलियां हैं?
छत्तीसगढ़ भाषाई और सांस्कृतिक विविधता वाला राज्य है। खबर के मुताबिक छत्तीसगढ़ी के अलावा अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में सरगुजिहा, हल्बी, गोंडी, कुड़ुख और अन्य भाषाएं और बोलियां चलती हैं। इनके बोलने वालों का अनुभव और भाषा से जुड़ाव अलग-अलग हो सकता है।
भाषा सिर्फ बातचीत का साधन क्यों नहीं?
भाषा में स्थानीय इतिहास, लोकस्मृतियां, कहावतें, रिश्तों की अभिव्यक्ति और खेती-किसानी का अनुभव भी होता है। लोकगीतों में ऋतु, खेती, प्रेम और सामुदायिक जीवन की कहानियां मिलती हैं। कई पारंपरिक शब्दों का अर्थ दूसरी भाषा में समझाने के लिए ज्यादा शब्द लगते हैं।
क्या स्कूल और शहर बदल रहे हैं बच्चों की भाषा?
कई माता-पिता चाहते हैं कि बच्चे हिंदी और अंग्रेजी में मजबूत हों, ताकि आगे पढ़ाई और रोजगार में मौके मिलें। यह चाह स्वाभाविक बताई गई है। हिंदी और अंग्रेजी सीखना स्थानीय भाषा से दूरी बनाना नहीं होना चाहिए।
चुनौती कब पैदा होती है?
चुनौती तब आती है, जब स्थानीय भाषा को पिछड़ेपन से जोड़ा जाने लगे। अगर बच्चे को लगे कि घर की बोली बोलना शर्म की बात है, तो वह धीरे-धीरे उसे कम बोलने लगता है। उल्टे परिवार और स्कूल बच्चों की भाषाई पृष्ठभूमि को सम्मान दें, तो बहुभाषिकता ताकत बन सकती है।
मोबाइल ने बोली को चुनौती दी या नया मंच?
पहले स्थानीय भाषा के गीत, नाचा और लोककथाएं मेलों, आयोजनों, कैसेट, रेडियो और स्थानीय मंचों से पहुंचती थीं। अब इंटरनेट और स्मार्टफोन से सामग्री बनाना और बांटना आसान हुआ है। छत्तीसगढ़ी गीत, फिल्में और हास्य वीडियो ज्यादा दर्शकों तक पहुंचे हैं। राज्य के बाहर रहने वाले लोग भी जड़ों से जुड़े रह सकते हैं।
डिजिटल लोकप्रियता से भाषा बच जाती है?
डिजिटल लोकप्रियता और रोजमर्रा के इस्तेमाल को एक नहीं मानना चाहिए। कोई छत्तीसगढ़ी गीत सुन सकता है, फिर भी घर या दफ्तर में दूसरी भाषा बोल सकता है। ऑनलाइन लोकप्रियता से यह साबित नहीं होता कि सभी स्थानीय भाषाओं को बराबर मौके मिल रहे हैं। कम बोलने वालों वाली और कम डिजिटल सामग्री वाली भाषाओं के सामने अलग चुनौतियां हो सकती हैं।
भाषा बचाने का क्या मतलब?
भाषाएं समय के साथ बदलती हैं। नए शब्द जुड़ते हैं और भाषाओं का मेल होता है। इसलिए भाषा बचाने का मतलब बदलाव रोकना नहीं है। जरूरत है कि भाषा जीवित रूप में इस्तेमाल हो।
घरों में बच्चों से स्थानीय भाषा में बात हो
लोककथाओं और गीतों का दस्तावेजीकरण हो
स्थानीय भाषाओं में पढ़ने की सामग्री मिले
डिजिटल माध्यमों पर रचनात्मक सामग्री बने
स्कूलों में बच्चों की मातृभाषा और भाषाई पृष्ठभूमि समझी जाए
स्थानीय कलाकारों, लेखकों और सामग्री निर्माताओं की भूमिका का भी जिक्र है। वे भाषा को नई पीढ़ी के लिए रोचक बना सकते हैं।
स्थापना दिवस पर भाषा का सवाल क्यों?
छत्तीसगढ़ का निर्माण सिर्फ प्रशासनिक सीमाओं का पुनर्गठन नहीं था। क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक विशिष्टता भी उसका हिस्सा रही है। भाषा की असली स्थिति घरों, स्कूलों, बाजारों और रोज की बातचीत में दिखेगी। सिर्फ लोकमहोत्सवों या सोशल मीडिया पर गीतों की गिनती से नहीं।
अब आगे क्या?
मूल सवाल यह है कि नई पीढ़ी बोली को सिर्फ सुनती और समझती है या सहजता से इस्तेमाल भी करती है।
यह खबर क्यों जरूरी है
भाषा हमारी पहचान होती है। स्थापना दिवस पर इस बारे में बात करना भी जरूरी है। किसी भी भाषा का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसे घर, स्कूल और रोज की बातचीत में कितना इस्तेमाल करते हैं। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे हिंदी और अंग्रेजी सीखें और आगे बढ़ें, लेकिन अपनी छत्तीसगढ़ी बोली भी न भूलें। असली सवाल यही है कि दोनों के बीच तालमेल कैसे बने।