उपभोक्ता फोरम की साख पर सवाल ; सालों चली कानूनी लड़ाई, जीत के बाद भी खाली हाथ खड़े हैं पीड़ित
NEWS IN SHORT
- आदेश के बाद भी उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिल पा रही
- हजारों मामलों में भुगतान लंबित, लोग दोबारा फोरम पहुंच रहे
- नियम 90 दिन, लेकिन केस 10 साल तक लंबित रहते
- दुर्ग, रायपुर, बिलासपुर में सबसे ज्यादा निष्पादन मामले लंबित
- कानून में सजा प्रावधान, फिर भी आदेश पालन में ढिलाई
NEWS IN DETAIL
उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए 'जागो ग्राहक जागो' का नारा बुलंद करने वाले सिस्टम की जमीनी हकीकत छत्तीसगढ़ में काफी निराशाजनक नजर आ रही है। जिला और राज्य उपभोक्ता फोरम में सालों की कानूनी लड़ाई जीतने के बाद भी उपभोक्ताओं के हाथ खाली हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि फोरम का आदेश आने के बाद भी कंपनियां, बिल्डर और बीमा एजेंसियां इसे गंभीरता से नहीं ले रही हैं, जिसके कारण प्रदेश में हजारों उपभोक्ता अपनी ही जीती हुई राशि पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
फैसला तो हुआ, पर भुगतान नहीं
आमतौर पर किसी भी उपभोक्ता मामले का निपटारा 90 दिनों के भीतर हो जाना चाहिए, लेकिन छत्तीसगढ़ में स्थिति इसके उलट है। यहाँ मामले 8 से 10 साल तक खिंच रहे हैं। संघर्ष की पराकाष्ठा तब होती है जब लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद फैसला उपभोक्ता के पक्ष में आता है, लेकिन विपक्षी पार्टी (कंपनी या बिल्डर) उसे मुआवजा देने से इनकार कर देती है।
आंकड़ों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में लगभग 2,235 मामले ऐसे लंबित हैं, जिनमें कोर्ट ने फैसला सुना दिया है, लेकिन अब तक उन आदेशों का पालन नहीं हुआ है। उपभोक्ता अब 'निष्पादन आवेदन' (Execution Application) लगाकर कोर्ट से गुहार लगा रहे हैं कि उन्हें उनका हक दिलाया जाए।
दुर्ग और रायपुर में सबसे बुरा हाल
उपभोक्ता फोरम के आदेशों की अनदेखी के मामले में प्रदेश के बड़े जिले सबसे आगे हैं। आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो:
दुर्ग: यहाँ सबसे ज्यादा 1106 मामले ऐसे हैं जिनमें आदेश के बाद भी राहत नहीं मिली।
रायपुर: राजधानी होने के बावजूद यहाँ 331 मामले निष्पादन की बाट जोह रहे हैं।
बिलासपुर: न्यायधानी में भी 206 उपभोक्ताओं को आदेश के बाद भी भटकना पड़ रहा है।
इसके अलावा राजनांदगांव, रायगढ़, कोरिया और कोरबा जैसे जिलों में भी सैकड़ों मामले फाइलों में दबे पड़े हैं।
बीमा और बिल्डर दे रहे सबसे ज्यादा दर्द
रायपुर के एक बुजुर्ग की कहानी इस सिस्टम की विफलता का प्रमाण है। 5 साल तक कार बीमा क्लेम की लड़ाई लड़ने और 2 लाख रुपए का आदेश पक्ष में आने के बाद भी वे 8 महीने से राशि का इंतजार कर रहे हैं।
वहीं, तेलीबांधा के एक पीड़ित ने 2014 में फ्लैट बुक किया था। 11 साल बीत जाने के बाद सितंबर 2025 में फोरम ने बिल्डर को 12% ब्याज के साथ रकम लौटाने का आदेश दिया, लेकिन आज भी उपभोक्ता के हाथ में एक रुपया नहीं आया है।
कानून में सख्ती, पर अमल में ढिलाई
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि कोई पक्ष आदेश का पालन नहीं करता है, तो उसके खिलाफ जमानती और गैर-जमानती वारंट जारी किए जा सकते हैं। आदेश की अवहेलना करने पर तीन साल तक की कैद और भारी जुर्माने का भी नियम है। इसके बावजूद, फोरम स्तर पर केवल 'तारीख पर तारीख' मिलने से विपक्षी पार्टियों के हौसले बुलंद हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मानना है कि जब तक फोरम अपने अधिकारों का प्रयोग कर दोषियों को जेल भेजने या उनकी संपत्ति कुर्क करने जैसे कड़े कदम नहीं उठाएगा, तब तक उपभोक्ताओं को वास्तविक न्याय मिलना नामुमकिन है। फिलहाल, छत्तीसगढ़ के हजारों उपभोक्ता कागजी जीत हाथ में लिए सिस्टम की चौखट पर न्याय की आस लगाए बैठे हैं।
निष्कर्ष
उपभोक्ता फोरम से फैसला मिलने के बाद भी राहत न मिलना न्याय प्रणाली की गंभीर खामी को उजागर करता है। आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए सख्त कार्रवाई और त्वरित निष्पादन जरूरी है, ताकि उपभोक्ताओं को वास्तविक न्याय समय पर मिल सके और उनका विश्वास बना रहे।
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