छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला, शिक्षकों को नहीं मिलेगी दो अग्रिम वेतनवृद्धि
समझें क्या है पूरा मामला
- 16 जून 1993 के बाद नियुक्त शिक्षकों को झटका।
- बिलासपुर हाईकोर्ट ने 75 प्रधान पाठकों की याचिका खारिज की।
- खुद के खर्च पर बीएड करने पर नहीं मिलेगा इंक्रीमेंट।
- सुप्रीम कोर्ट तक मुहर, अब शिक्षकों को बड़ा झटका।
- 1993 के बाद बीएड-डीएड को बनाया गया अनिवार्य योग्यता।
शिक्षकों से जुड़े मामले में हाईकोर्ट का फैसला
बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य के शिक्षकों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि 16 जून 1993 के बाद नियुक्त हुए शिक्षकों को खुद के खर्च पर बीएड (B.Ed – Bachelor of Education), डीएड (D.Ed – Diploma in Education) या बीटीआई (BTI – Basic Training Institute) करने पर दो अग्रिम वेतनवृद्धि का लाभ नहीं मिलेगा।
न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकल पीठ ने 75 प्रधान पाठकों द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे खारिज कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि इस विषय पर पूर्व में भी न्यायिक निर्णय आ चुके हैं। इसलिए उसी विषय पर दोबारा हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी औचित्य नहीं बनता है।
नीलम दुबे मामले की नजीर
शिक्षा विभाग की ओर से पैरवी करते हुए कोर्ट को बताया गया कि इसी तरह के एक अन्य मामले में नीलम दुबे ने याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 25 अप्रैल 2024 को उनकी याचिका को खारिज कर दिया था।
इसके बाद डिवीजन बेंच ने भी 9 अगस्त 2024 को अपील खारिज की। मामला यहीं नहीं रुका। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी (SLP – Special Leave Petition) दायर की गई।
सुप्रीम कोर्ट ने 2 जुलाई 2025 को याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने की कोई वजह नहीं है।
1993 में बदले भर्ती नियम
अदालत ने पुराने फैसलों का संदर्भ देते हुए कहा कि 16 जून 1993 से पहले सहायक शिक्षक या शिक्षक पद पर नियुक्ति के लिए बीएड या डीएड अनिवार्य नहीं था। लेकिन 16 जून 1993 को भर्ती नियमों में संशोधन कर इन शैक्षणिक योग्यताओं को न्यूनतम अर्हता बना दिया गया।
राज्य सरकार ने 6 फरवरी 2007 को एक परिपत्र जारी किया था। इसके तहत सेवा में रहते हुए स्व-खर्च पर प्रशिक्षण लेने वाले पुराने शिक्षकों को दो अग्रिम वेतनवृद्धि देने का प्रावधान था। हालांकि, 16 जून 1993 के बाद नियुक्त हुए कर्मचारियों को इस लाभ की परिधि से बाहर रखा गया था।
समानता के अधिकार का तर्क खारिज
याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया था कि कुछ अन्य कर्मचारियों को पूर्व में यह लाभ प्रदान किया गया है। इसलिए उन्हें भी समानता के आधार पर यह लाभ मिलना चाहिए। कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता का अधिकार एक सकारात्मक अवधारणा है।
किसी अन्य व्यक्ति को यदि गलत तरीके से कोई लाभ मिला है, तो उसे आधार बनाकर समान लाभ का दावा नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने 75 प्रधान पाठकों की याचिका को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि सभी पक्षकार अपना-अपना कानूनी खर्च स्वयं वहन करेंगे।
FAQ
- हाईकोर्ट ने शिक्षकों की अग्रिम वेतनवृद्धि याचिका क्यों खारिज की?
उत्तर: कोर्ट ने माना कि 16 जून 1993 के बाद बीएड और डीएड शिक्षक पद की न्यूनतम अनिवार्य योग्यता बन चुकी थी। इसलिए इसे अतिरिक्त अर्हता मानकर इंक्रीमेंट नहीं दिया जा सकता। - किन शिक्षकों को 2 अग्रिम वेतनवृद्धि का लाभ मिलता था?
उत्तर: 16 जून 1993 से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों को, जिन्होंने अपने खर्च पर बीएड या डीएड की डिग्री हासिल की थी, उन्हें यह लाभ दिया जाता था।
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