दंतेवाड़ा माइनिंग विवाद ; ग्रामीणों ने सरकारी लीज नकारी, कहा- कंपनी अब सीधे ग्रामसभा से करे सौदा

Aishwarya Dwivedi | Apr 26, 2026, 08:57 IST
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दंतेवाड़ा के तरल पहाड़ पर खनन को लेकर ग्रामीणों ने सरकार की लीज खारिज कर दी है। फर्जी ग्रामसभा का आरोप लगाते हुए ग्रामीणों ने शर्त रखी है कि कंपनी अब सीधे ग्रामसभा से सौदा करे।

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित तालनार और गुमियापाल क्षेत्र के तरल पहाड़ पर खनन को लेकर जारी गतिरोध ने एक नया और दिलचस्प मोड़ ले लिया है। पिछले 10 वर्षों से 'आरती स्पंज कंपनी' को दी गई खनन लीज का विरोध कर रहे ग्रामीणों ने अब सरकार और प्रशासन के सामने दो-टूक शर्तें रख दी हैं। अलनार गांव में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि उन्हें सरकार द्वारा आवंटित पट्टा मंजूर नहीं है। यदि कंपनी को खनन करना है, तो उसे सरकार के बजाय सीधे ग्राम सभा के साथ समझौता करना होगा।



फर्जी ग्राम सभा का आरोप और 10 साल का संघर्ष

विवाद की जड़ें साल 2014 में हुई एक कथित ग्राम सभा से जुड़ी हैं। ग्रामीणों का गंभीर आरोप है कि तरल पहाड़ की लीज जिस ग्राम सभा के आधार पर दी गई, उसमें केवल 10 लोगों के हस्ताक्षर थे। ग्रामीणों का तर्क है कि मुट्ठी भर लोगों की सहमति के आधार पर पूरे इलाके की प्राकृतिक संपदा और ग्रामीणों का भविष्य निजी कंपनी को नहीं सौंपा जा सकता।



गौरतलब है कि इससे पहले 'देव माइनिंग कंपनी' ने भी यहां काम शुरू करने की कोशिश की थी, लेकिन ग्रामीणों के कड़े विरोध के कारण उसे कदम पीछे खींचने पड़े। इसी साल जनवरी में जब आरती स्पंज कंपनी के कर्मचारी सर्वे के लिए पहुंचे, तो ग्रामीणों ने उन्हें सीमा पर ही रोक दिया था। हाल ही में पेटी ठेकेदारों को भी गांव में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई।



ग्रामीणों की तीन मुख्य शर्तें

बैठक में ग्रामीणों के एक गुट ने 'शर्तों के साथ खनन' का विकल्प पेश किया है। उन्होंने साफ़ किया कि यदि कंपनी काम करना चाहती है, तो उसे निम्नलिखित मांगों को मानना होगा:



1.हिस्सेदारी और रोजगार: खनन प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की कितनी भागीदारी होगी और उन्हें रोजगार कैसे मिलेगा, इसका अंतिम फैसला ग्राम सभा करेगी।



2.परिवहन पर एकाधिकार: खदान से निकलने वाले खनिजों के परिवहन (ट्रांसपोर्टेशन) का पूरा काम स्थानीय लोगों और उनकी समितियों के पास रहेगा।



3.नीतिगत फैसलों में अधिकार: खनन से जुड़े किसी भी बड़े नीतिगत निर्णय को लेने से पहले ग्राम सभा की लिखित मंजूरी अनिवार्य होगी।



विचारधाराओं में टकराव

एक ओर जहां स्थानीय प्रतिनिधि मंगल कुंजाम और सोमरू के नेतृत्व में ग्रामीणों का एक गुट शर्तों के साथ बातचीत की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता मनीष कुंजाम और सोनी सोरी ने किसी भी प्रकार के खनन का पूर्ण विरोध किया है। उनका कहना है कि पहाड़ और जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए आंदोलन को और अधिक उग्र किया जाएगा। ग्रामीणों ने नंदराज पहाड़ की लीज में भी 160 फर्जी हस्ताक्षरों का मुद्दा उठाते हुए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं।



प्रशासन का रुख

इस पूरे मामले पर दंतेवाड़ा कलेक्टर देवेश ध्रुव का कहना है कि 2014 की ग्राम सभा के फर्जी होने के आरोपों की जांच कराई जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पहाड़ की लीज को लेकर अनुबंध ग्राम सभा और निजी कंपनी के बीच का विषय है। कलेक्टर के अनुसार, दोनों पक्ष आपसी सहमति से रास्ता निकाल सकते हैं।



निष्कर्ष

तरल पहाड़ का यह विवाद अब केवल पर्यावरण बनाम विकास का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह ग्राम सभा की संवैधानिक शक्तियों और जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय समुदाय के हक की लड़ाई बन चुका है। अब देखना यह होगा कि कंपनी ग्रामीणों की शर्तों को मानकर सीधे समझौते की राह चुनती है या गतिरोध यूं ही बरकरार रहता है।



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