छत्तीसगढ़ की चिट्ठी : फाइलों में विकास, मैदान में घोटाला
इस हफ्ते छत्तीसगढ़ की राजनीति और प्रशासन में सब कुछ उलट पुलट होता हुआ नजर आया है। कहीं 575 ट्रेलर गायब कोयला रिकॉर्ड का मामला एक बार फिर सामने आया, तो कहीं गलत नक्शे पर 8 हजार पेड़ काट दिए गए। शिक्षा व्यवस्था में रिजल्ट चमकाने का खेल पकड़ा गया, तो 15 साल पुराने पीएमटी पेपर लीक कांड में आरोपी अब डॉक्टर बनकर मरीजों की जान से खेल रहे हैं। ये फर्जी डॉक्टर अब तक कई लोगों को स्वर्ग का रास्ता दिखा चुके होंगे।
उधर सरकार वीआईपी कारकेड घटाने और खर्च कम करने का संदेश दे रही है, जबकि दूसरी तरफ करोड़ों के टेंडर और आबकारी भुगतान घोटाले सुर्खियों में हैं। पेट्रोल पंपों पर अफरा-तफरी मची हुई है, वहीं अफसरों के खिलाफ चार्जशीट भी आई है। इस सप्ताह छत्तीसगढ़ में हर दिन नई फाइल खुली और हर फाइल ने अपनी नई कहानी कही है।
कोल में करोड़ों का झोल
छत्तीसगढ़ में कोयला सिर्फ जमीन के नीचे नहीं, अब रिकॉर्ड से भी गायब होने लगा है। रायगढ़ के एनटीपीसी लारा में 575 ट्रेलर कोयला मिसिंग होने की खबर ने सरकार की पूरी ट्रांसपोर्ट व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया। मामला इतना बड़ा निकला कि आखिरकार सीबीआई को एंट्री करनी पड़ी। अब ट्रेलर, तौल पर्ची, डिस्पैच रजिस्टर और सप्लाई रिकॉर्ड सब खंगाला जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि इतने बड़े स्तर पर कोयला गायब होता रहा और अफसरों को भनक तक नहीं लगी। कोयले का हिसाब ऐसा गड़बड़ाया कि रिकॉर्ड में ट्रेलर दौड़ रहे थे, लेकिन जमीन पर उनका कोई पता नहीं था। अब ट्रांसपोर्टर, अफसर और सप्लाई चैन से जुड़े लोग बेचैन हैं। जिनके फोन पहले नहीं उठते थे, वे अब खुद कॉल बैक कर रहे हैं। सीबीआई की जांच ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी है। हर किसी को डर है कि कहीं अगली दस्तक उसके दरवाजे पर न हो।
छत्तीसगढ़ में कोयला घोटाला नया नहीं हैं, लेकिन इस बार मामला ट्रांसपोर्ट के जरिए कोयला गायब करने का है। यानी कोयला जलाने से पहले ही उड़ गया। अब देखने वाली बात यह है कि जांच सिर्फ कागजों तक सीमित रहती है या सचमुच कोई बड़ा चेहरा भी कानून के शिकंजे में आता है।
गलत नक्शा… कट गए 8 हजार पेड़
बस्तर में विकास का नया मॉडल सामने आया है। पहले जंगल काटो, फिर पता करो सड़क कहां बनानी थी। केशकाल बायपास परियोजना में यही हुआ। अफसरों ने गलत अलाइनमेंट पर 8 हजार से ज्यादा पेड़ कटवा दिए और बाद में पता चला कि सड़क तो 100 मीटर दूसरी तरफ बननी है। यानी सड़क अभी तक फाइलों में है, लेकिन जंगल जमीन से गायब हो चुका है। सरकारी विभागों का तालमेल ऐसा था जैसे शादी के लिए निकले बैंड वाले और बाराती अलग-अलग गांव पहुंच जाएं। कहानी ऐसी है।
वन विभाग ने पेड़ काटने की अनुमति दे दी। एनएच विभाग ने भुगतान भी कर दिया और बाद में सबको याद आया कि असली नक्शा कुछ और था। अब नई जगह सड़क बनेगी तो 6 हजार और पेड़ कटेंगे। यानी गलती एक बार हुई, नुकसान दो बार होगा। सबसे मजेदार हिस्सा यह है कि अब जांच बैठा दी गई है। छत्तीसगढ़ में जांच का मतलब अक्सर यही होता है कि फाइल मोटी हो जाएगी और मामला पतला। करोड़ों खर्च हो गए, जंगल उजड़ गया, लेकिन जिम्मेदार कौन है।
इस सवाल पर सबकी जुबान बंद है। बस्तर के जंगलों को ग्रीन गोल्ड कहा जाता है, लेकिन यहां सरकारी सिस्टम ने उन्हें ड्राफ्टिंग की गलती में बलि चढ़ा दिया। यह सिर्फ पर्यावरणीय नुकसान नहीं, सरकारी कार्यशैली का जीवंत प्रदर्शन है। यहां सड़क बनने से पहले जंगल साफ हो जाता है और जिम्मेदारी तय होने से पहले अधिकारी ट्रांसफर हो जाते हैं।
पेपर लीक का ‘काला सच’: आरोपी डॉक्टर बन गए!
नीट का पेपर लीक हुआ और पूरे देश में हंगामा मच गया। ऐसे में याद आया छत्तीसगढ़ का 2011 का पीएमटी पेपर लीक कांड। इस लीकेज के लिए जिम्मेदार आरोपी को 15 साल बाद भी सजा नहीं हुई। जिन छात्रों पर पैसे देकर मेडिकल सीट खरीदने का आरोप था, उनमें से कई अब डॉक्टर बन चुके हैं। अब ये डॉक्टर बीमार को ठीक नहीं कर रहे, बल्कि नई-नई बीमारी पैदा कर रहे हैं। पुलिस ने 76 अभ्यर्थियों को पकड़ा। स्टिंग ऑपरेशन हुआ।
बड़ी-बड़ी बातें हुईं, लेकिन अभी तक किसी को सजा नहीं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 15 साल में मुख्य गवाह की गवाही तक पूरी नहीं हो सकी। बचाव पक्ष हर बार नई एप्लीकेशन लगाता रहा और सुनवाई आगे बढ़ती रही। आखिरकार आरोपी जमानत पर बाहर आए, विदेश गए और डॉक्टर बनकर लौट आए। यानी मेहनत से पढ़ने वाले छात्र को सीट नहीं मिली, लेकिन पैसे वालों ने सिस्टम को ही ऑपरेट कर लिया। ऐसा लगता है जैसे पेपर लीक कोई अपराध था ही नहीं।
काम कम, बिल ज्यादा
छत्तीसगढ़ के आबकारी विभाग में ओवरटाइम का ऐसा खेल चला कि काम से ज्यादा भुगतान दौड़ने लगा। ईओडब्ल्यू ने सीडीएल के वाइस प्रेसिडेंट उदय राव को गिरफ्तार किया तो 183 करोड़ के भुगतान घोटाले की परतें खुलने लगीं। आरोप है कि कर्मचारियों के नाम पर फर्जी बिल बनाए गए, ओवरटाइम दिखाया गया और करोड़ों रुपए अपनी जेब में डाले गए।
यह पूरा मामला सरकारी फाइलों का है। जांच में सामने आया कि रिकॉर्ड में कंपनी कोई और थी, लेकिन असली संचालन कोई और कर रहा था। यानी सरकारी ठेका भी मुखौटे पहनकर चलता रहा। सबसे दिलचस्प हिस्सा ओवरटाइम का है। जिन कर्मचारियों ने काम नहीं किया, उनके नाम पर भी करोड़ों का भुगतान हो गया।
बोनस, अतिरिक्त दिवस, सर्विस चार्ज, हर हेड में पैसा बहता रहा। आरोप यह भी है कि कमीशन की पूरी चेन ऊपर तक जाती थी। अब गिरफ्तारी के बाद कई लोग अचानक स्वास्थ्य कारणों से चुप हो गए हैं। फाइलें खंगाली जा रही हैं और हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिर शराब से ज्यादा नशा किस चीज में था ओवरटाइम में या कमीशन में।
रिजल्ट बढ़ाकर वाहवाही
बिलासपुर के स्वामी आत्मानंद स्कूलों में शिक्षा से ज्यादा गणित का कमाल दिख गया। एक स्कूल का असली रिजल्ट 54 प्रतिशत था, लेकिन प्रशासन को भेजा गया 94 प्रतिशत। यानी शिक्षा विभाग ने बोर्ड परीक्षा को शेयर मार्केट की तरह बुलिश दिखाने की कोशिश कर दी। कलेक्टर संजय अग्रवाल ने समीक्षा बैठक में जब आंकड़े मिलाए तो पूरा खेल खुल गया।
बैठक का माहौल ऐसा हो गया जैसे परीक्षा में नकल करते छात्र को अचानक पकड़ लिया गया हो। अब 34 प्राचार्यों को नोटिस जारी हुए हैं और सब जवाब लिखने में व्यस्त हैं। असल समस्या सिर्फ गलत आंकड़े नहीं, बल्कि वह मानसिकता है जिसमें सच्चाई से ज्यादा प्रेजेंटेशन को महत्व दिया जाता है। स्कूलों को लगता है कि रिजल्ट अच्छा दिखाओ, बाकी बातें बाद में देखी जाएंगी। आखिर कागज पर शिक्षा चमकती रहे तो जमीन की चिंता कौन करे?
पेट्रोल पंपों पर पुलिस पहरा
छत्तीसगढ़ में पेट्रोल पंप इन दिनों मिनी बॉर्डर पोस्ट बन गए हैं। लंबी कतारें, बहस और धक्का-मुक्की हर जगह देखने को मिल रही है। हालत यह है कि पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा। पेट्रोल-डीजल महंगा होने की खबर फैली तो लोगों ने ऐसे टैंक फुल करवाए जैसे कल से तेल इतिहास बनने वाला हो। रायपुर से लेकर बिलासपुर तक हालात ऐसे रहे कि कई पंपों पर नो पेट्रोल”बोर्ड लग गए।
कुछ जगहों पर लोगों ने स्टॉक खत्म होने से पहले टैंक फुल करने की ऐसी होड़ लगाई कि कर्मचारियों को पुलिस बुलानी पड़ गई। इस बीच ब्लैक मार्केटिंग के आरोप भी वायरल हो गए। सोशल मीडिया पर वीडियो घूमने लगे कि कई जगहों पर ज्यादा पैसे लेकर तेल बेचा जा रहा है। यानी संकट आते ही कुछ लोग मुनाफा के मूल सिद्धांत पर काम करने लगते हैं। पुलिस अब पेट्रोल पंपों पर पोस्टर चिपका रही है, हेल्पलाइन नंबर दे रही है और लोगों से संयम रखने की अपील कर रही है।
कार्रवाई भारी पड़ गई
बलरामपुर के चर्चित रामनरेश हत्याकांड में पूर्व एसडीएम करुण डहरिया के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने के बाद प्रशासनिक गलियारों में हलचल है। आरोप है कि ट्रक जब्ती की कार्रवाई अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर की गई और वही हिंसक टकराव की वजह बनी। सरकारी कार्रवाई कई बार फिल्मों जैसी होती है। पहले दबिश, फिर हड़कंप और बाद में सवाल कि प्लान था क्या? यहां भी आरोप है कि बिना पर्याप्त समन्वय के कार्रवाई की गई।
बगैर किसी वाद-विवाद के एक व्यक्ति को जान से मार दिया गया। पुलिस ने डिजिटल साक्ष्य, मोबाइल लोकेशन और वीडियो फुटेज का हवाला देकर चार्जशीट पेश की है। अब मामला कोर्ट में है, लेकिन इस घटना ने प्रशासनिक ताकत और जवाबदेही दोनों पर बहस छेड़ दी है। छत्तीसगढ़ में खनिज और परिवहन से जुड़े मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई अक्सर तनाव पैदा करती रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार जांच की आंच सीधे अफसर तक पहुंच गई।
सरकारी खर्च पर ब्रेक
छत्तीसगढ़ सरकार ने खर्च कम करने के लिए ऐसा अभियान शुरू किया है कि अब सरकारी दफ्तरों में एसी भी शायद अनुमति लेकर चले। विदेश यात्राओं पर रोक, कारकेड कम, वाहन पूलिंग, ऑनलाइन मीटिंग और बिजली बचत। सरकार ने अफसरशाही की आरामदायक दिनचर्या पर सीधा वार कर दिया है। अब महीने में सिर्फ एक फिजिकल मीटिंग होगी। बाकी सब ऑनलाइन। यानी जो अधिकारी पहले मीटिंग के नाम पर जिले-जिले घूमते थे, अब उन्हें कैमरे के सामने बैठना पड़ेगा।
सरकारी गाड़ियों में पूलिंग भी लागू होगी। एक ही जगह जाने वाले अफसर अब अलग-अलग गाड़ियों में नहीं निकल पाएंगे। सबसे दिलचस्प आदेश कार्यालयों में एसी और कंप्यूटर बंद करने वाला है। वर्षों से सरकारी दफ्तरों में बिजली ऐसे जलती रही जैसे बिल किसी और ग्रह से भरना हो। अब विभाग प्रमुखों को खुद निगरानी करनी होगी। सरकार इसे वित्तीय अनुशासन बता रही है, लेकिन विपक्ष इसे आर्थिक दबाव का संकेत मान रहा है। अब देखना यह है कि यह मितव्ययिता कितने दिन टिकती है और कब फिर पुराने दिन लौट आते हैं।
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