सिर्फ स्कूल रिकॉर्ड से साबित नहीं होती लड़की की उम्र, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपहरण के आरोपी को किया बरी
जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच ने इस आधार पर जांजगीर-चांपा जिले के राजेंद्र श्रीवास उर्फ मोटू को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363 और 366 के आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को भी निरस्त कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
मामला छत्तीसगढ़ के मुलमुला थाना क्षेत्र का है। 30 मई 2019 को एक लड़की अपने घर से चली गई थी। उसके बहनोई ने थाने में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने गुमशुदगी का मामला दर्ज किया।
जांच के दौरान पुलिस ने उसी दिन लड़की को जयरामनगर रेलवे स्टेशन पर राजेंद्र श्रीवास के साथ बरामद किया। मामले की सुनवाई के बाद विशेष न्यायालय ने 15 अक्टूबर 2019 को राजेंद्र को दोषी ठहराया था।
निचली अदालत ने IPC की धारा 363 के तहत चार साल और धारा 366 के तहत पांच साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ राजेंद्र ने हाई कोर्ट में अपील की।
स्कूल रिकॉर्ड से उम्र साबित करने पर उठे सवाल
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने लड़की की उम्र साबित करने के लिए मुख्य रूप से स्कूल के दाखिल-खारिज रजिस्टर पर भरोसा किया था।
हालांकि, स्कूल के प्रधानाध्यापक ने अपनी गवाही में बताया कि रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि लड़की के पिता द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर लिखी गई थी। अभियोजन की ओर से इस जन्मतिथि के समर्थन में जन्म प्रमाण पत्र या कोई अन्य सरकारी दस्तावेज पेश नहीं किया गया।
इसके अलावा, लड़की की उम्र निर्धारित करने के लिए अस्थि परीक्षण (Ossification Test) भी नहीं कराया गया था।
कोर्ट ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर लड़की के नाबालिग होने की उम्र को पुख्ता तरीके से साबित नहीं किया जा सका।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के अलमेलु बनाम राज्य और ऋषिपाल सिंह सोलंकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य जैसे मामलों का उल्लेख किया। इन फैसलों में उम्र निर्धारण के लिए पेश किए गए दस्तावेजों और उनकी प्रमाणिकता को महत्वपूर्ण माना गया है।
हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अभियोजन द्वारा पेश किया गया स्कूल रिकॉर्ड अकेले लड़की की उम्र को निर्णायक रूप से साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं था।
लड़की ने कहा- अपनी मर्जी से राजेंद्र के साथ गई थी
मामले में लड़की के बयान को भी हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण माना। लड़की ने बताया था कि राजेंद्र उसका स्कूल का दोस्त था और दोनों मोबाइल फोन पर बातचीत करते थे।
लड़की के अनुसार, 30 मई 2019 को सुबह करीब चार बजे राजेंद्र के बुलाने पर वह अपनी इच्छा से उसके साथ गई थी। वह बिना किसी शोर-शराबे या विरोध के बाइक पर बैठकर उसके साथ चली गई थी।
कोर्ट ने इस तथ्य को भी मामले में महत्वपूर्ण माना कि लड़की ने जबरन ले जाने या किसी प्रकार के दबाव की बात नहीं कही थी।
खुद साथ जाना और जबरदस्ती ले जाना अलग-अलग
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एस. वरदराजन बनाम स्टेट ऑफ मद्रास मामले का भी हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी लड़की का अपनी इच्छा से किसी व्यक्ति के साथ चले जाना और उसे जबरदस्ती या बहला-फुसलाकर ले जाना अलग-अलग परिस्थितियां हैं।
इस मामले में कोर्ट को अपहरण या बहला-फुसलाकर ले जाने का आवश्यक तत्व साबित होता नहीं मिला।
हाई कोर्ट ने आरोपी को किया बरी
मामले के सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए राजेंद्र श्रीवास उर्फ मोटू को IPC की धारा 363 और 366 के आरोपों से बरी कर दिया। साथ ही विशेष न्यायालय द्वारा दी गई सजा के आदेश को निरस्त कर दिया।