छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट: अब वास्तविक आय के आधार पर मिलेगा पीड़ित परिवार को मुआवजा
NEWS IN SHORT
- मुआवजे की गणना अब कर्मचारी के वास्तविक वेतन पर आधारित होगी।
- बीमा कंपनी की अधिकतम वेतन सीमा वाली दलील कोर्ट ने खारिज की।
- दुर्घटना की तारीख से 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना अनिवार्य है।
- हाईकोर्ट ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम को सामाजिक कल्याण कानून माना।
- श्रम न्यायालय द्वारा निर्धारित 9,880 रुपये की आय को उचित बताया।
NEWS IN DEATIL
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में श्रमिक मुआवजे से जुड़े एक मामले में ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी दुर्घटना में मृत कर्मचारी के परिजनों को मिलने वाला मुआवजा उसकी वास्तविक आय (Actual Salary) के आधार पर तय किया जाना चाहिए, न कि केवल सरकार द्वारा निर्धारित किसी न्यूनतम सीमा पर।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला 15 दिसंबर 2017 का है, जब जगदलपुर में एक सड़क हादसे के दौरान ट्रक चालक सत्येंद्र सिंह की दुखद मृत्यु हो गई थी। मृतक की पत्नी, बच्चों और वृद्ध मां ने आर्थिक संबल के लिए श्रम न्यायालय में मुआवजे का दावा किया था। श्रम न्यायालय ने तत्कालीन 'कलेक्टर दर' के आधार पर चालक की मासिक आय 9,880 रुपए मानी और परिजनों को लगभग 9 लाख 49 हजार रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया।
बीमा कंपनी की दलील और कोर्ट की टिप्पणी
बीमा कंपनी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि केंद्र सरकार की अधिसूचना के अनुसार, मुआवजा गणना के लिए अधिकतम वेतन सीमा 8 हजार रुपए ही मानी जानी चाहिए।
हालांकि, जस्टिस बिभू दत्ता गुरु की सिंगल बेंच ने बीमा कंपनी की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा: "कर्मचारी मुआवजा अधिनियम एक सामाजिक कल्याणकारी कानून है। इसका मुख्य उद्देश्य पीड़ित परिवार को उचित राहत पहुंचाना है। अतः मुआवजा तय करते समय उस समय के प्रचलित वास्तविक वेतन और जमीनी परिस्थितियों को ध्यान में रखना अनिवार्य है।"
ब्याज दर और भुगतान की शर्तों में संशोधन
हाईकोर्ट ने न केवल मुआवजे की राशि को बरकरार रखा, बल्कि ब्याज भुगतान के नियमों में भी सुधार किया। श्रम न्यायालय ने पहले ब्याज को कुछ शर्तों के साथ लागू करने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने इसे संशोधित करते हुए आदेश दिया कि मुआवजे की पूरी राशि पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देय होगा। यह ब्याज दुर्घटना की तारीख (15 दिसंबर 2017) से लेकर वास्तविक भुगतान होने तक की अवधि के लिए मिलेगा। कोर्ट ने बीमा कंपनी के उस तर्क को भी नकार दिया जिसमें ब्याज 45 दिनों के बाद से देने की बात कही गई थी।
निष्कर्ष
हाईकोर्ट के इस फैसले से प्रदेश के लाखों श्रमिकों को राहत मिलेगी। यह निर्णय सुनिश्चित करता है कि बीमा कंपनियाँ तकनीकी बारीकियों या पुरानी अधिसूचनाओं का हवाला देकर पीड़ित परिवारों के हक को कम नहीं कर सकतीं। कोर्ट ने पीड़ित परिवार की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उन्हें पूर्ण न्याय प्रदान किया है।
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