स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल की बात नहीं मान रहे अधिकारी? अटैचमेंट समाप्त करने विधानसभा में की थी घोषणा, अंतिम चेतावनी भी बेअसर
उल्टा, नई जगहों पर मनचाहे लोगों को थोक में अटैच करने के आदेश जारी होते रहे। अब मामला फिर गरमाया तो स्वास्थ्य विभाग ने जिम्मेदार अधिकारियों को पत्र थमाकर अटैचमेंट की वजह पूछी है। साथ ही तीन दिन के भीतर अटैचमेंट खत्म कर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है। यानी मंत्री की घोषणा के बाद भी विभाग में अटैचमेंट का खेल बदस्तूर जारी है।
आदेश कागजों में दौड़ता रहा
फरवरी में विधानसभा का सत्र चल रहा था। 16 फरवरी को स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल सवालों के जवाब दे रहे थे। इसी दौरान विधायकों ने अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के नदारद रहने का मुद्दा उठाया। आरोप था कि प्रदेशभर में डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी मनचाही जगह पर अटैचमेंट कराकर बैठे हैं। इसका सीधा असर ग्रामीण इलाकों की स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है।
मार्च में आदेश, फिर भी अमल नहीं
विधानसभा में घोषणा के बाद संचालनालय स्वास्थ्य सेवाओं ने 12 मार्च को पत्र जारी किया। इसमें स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकारियों-कर्मचारियों के मूल पदस्थापना स्थल से दूसरी जगह किए गए अटैचमेंट को 3 दिन के भीतर खत्म करने के निर्देश दिए गए थे। साथ ही सभी संबंधित अधिकारियों से इसका प्रमाण पत्र भी मांगा गया था। लेकिन विभागीय अफसरों पर मंत्री की घोषणा का कोई असर नहीं हुआ। आदेश कागजों में दौड़ता रहा।
6 महीने बाद फिर वही फरमान
संचालनालय स्वास्थ्य सेवाओं ने 22 सितंबर को सभी संभागीय संयुक्त संचालकों, CMHO और सिविल सर्जनों को फिर पत्र भेजा है। इसमें साफ लिखा है कि पहले निर्देश के बावजूद आज तक जरूरी जानकारी और प्रमाण पत्र संचालनालय को नहीं मिले हैं। यानी जिन अधिकारियों को मार्च में तीन दिन का समय मिला था, वे 6 महीने बाद भी यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि अटैचमेंट खत्म हुए या नहीं।
अब सवाल यह है कि जब मंत्री विधानसभा में घोषणा कर चुके थे, संचालनालय लिखित आदेश जारी कर चुका था और पालन की समय-सीमा भी तय थी, तो फिर 6 महीने तक कार्रवाई किसने रोकी?
पुराने खत्म नहीं, नए अटैचमेंट जारी
सबसे बड़ा सवाल सिर्फ पुराने अटैचमेंट खत्म नहीं होने का नहीं है। विभाग के भीतर यह भी आरोप और सवाल उठते रहे हैं कि पुराने अटैचमेंट खत्म करने के बजाय अलग-अलग जगहों पर नए अटैचमेंट के आदेश जारी होते रहे। यानी एक तरफ मंत्री सदन में व्यवस्था सुधारने की बात कर रहे थे, दूसरी तरफ विभागीय स्तर पर उसी व्यवस्था को जारी रखने की शिकायतें सामने आती रहीं। ससे मंत्री की घोषणा और विभागीय अमल के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।
घोषणा पर भारी पड़ रहे अधिकारी
स्वास्थ्य विभाग का यह मामला सिर्फ कर्मचारियों के अटैचमेंट का नहीं है। दूरस्थ इलाकों में डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी नहीं मिलेंगे तो सीधे असर मरीजों पर पड़ेगा। मंत्री खुद विधानसभा में इस बात को स्वीकार कर चुके हैं। फिर भी मार्च के आदेश से सितंबर के रिमाइंडर तक कहानी वहीं खड़ी है। 6 महीने में अटैचमेंट खत्म नहीं हुए, प्रमाण पत्र नहीं आए।
ऐसे में स्वास्थ्य मंत्री की विधानसभा घोषणा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अगर मंत्री का आदेश भी विभागीय अफसर नहीं मानेंगे, तो फिर सरकार की घोषणा का मतलब क्या रह जाता है? या ये लेटर भी महज 6 महीने बाद की खाना पूर्ति है?