अनुकंपा नियुक्ति का नया नियम, बड़े बच्चे को मिलेगा पहला हक
समझें क्या है पूरा मामला
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि कई दावेदारों में बड़े बच्चे को प्राथमिकता मिलेगी। जस्टिस संजय के. अग्रवाल ने मुंगेली डीईओ का आदेश रद कर दिया। छोटे बेटे को दी गई नियुक्ति अब वापस समीक्षा के अधीन होगी। कोर्ट ने 30 दिनों के भीतर नए सिरे से विचार करने को कहा।
अनुकंपा नियुक्ति पर हाईकोर्ट का आदेश
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने दो अलग-अलग मामलों में बड़े फैसले सुनाए हैं। पहला मामला अनुकंपा नियुक्ति में दावों के निपटारे से जुड़ा है। दूसरा मामला सरकारी पदों पर temporary प्रभार देने के अधिकारों पर है। दोनों ही फैसलों का राज्य के प्रशासनिक कामकाज पर गहरा असर पड़ेगा।
अनुकंपा नियुक्ति का मुख्य मामला
मुंगेली जिले के धरमपुरा में एक सरकारी स्कूल था। वहां ईश्वर सिंह क्षत्रिय चपरासी के पद पर कार्यरत थे। सितंबर 2016 में उनका अचानक निधन हो गया। ईश्वर सिंह की दो पत्नियां थीं। पहली पत्नी के बेटे जितेंद्र सिंह की उम्र 35 वर्ष थी। दूसरी पत्नी का बेटा राजकुमार भी नौकरी का दावेदार था।
जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) ने अगस्त 2019 में फैसला सुनाया। उन्होंने छोटे बेटे राजकुमार को अनुकंपा नौकरी के लिए चुना। इस फैसले के खिलाफ बड़े बेटे जितेंद्र ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में सीनियरिटी को मुख्य आधार बनाया गया था।
हाई कोर्ट का सख्त रुख
जस्टिस संजय के. अग्रवाल की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार के नियमों में स्पष्टता नहीं थी। दूसरी शादी से जन्मा बच्चा कानूनी वारिस जरूर होता है। लेकिन कई दावेदार होने पर किसे चुनना है, इस पर नियम मौन थे।
अदालत ने पटना और झारखंड हाई कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में जेष्ठता ही मुख्य आधार होगी। डीईओ का पुराना आदेश तुरंत प्रभाव से निरस्त कर दिया गया। अब 30 दिनों में बड़े बेटे की पात्रता जांच कर फैसला होगा।
सीनियरिटी और पद का प्रभार
एक अन्य मामले में जस्टिस विभु दत्त गुरु ने फैसला सुनाया। गरियाबंद जिले के ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर (BEO) ने याचिका लगाई थी। किशन लाल मतावले ने जूनियर को डीईओ का चार्ज देने को चुनौती दी थी। उन्होंने छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा सेवा नियम 2026 का हवाला दिया था।
सरकार ने अदालत में अपना पक्ष मजबूती से रखा। मतावले मूल रूप से प्रिंसिपल थे और केवल बीईओ का प्रभार संभाल रहे थे। कलेक्टर ने उनके खिलाफ लापरवाही की रिपोर्ट भेजी थी। इसलिए प्रशासन ने दूसरे अधिकारी को जिम्मेदारी सौंप दी थी।
प्रभार सौंपना एक अस्थायी व्यवस्था
अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रभार देना एक पूर्णतः अस्थायी व्यवस्था है। इसके लिए प्रशासनिक दक्षता और कार्य रिकॉर्ड देखना बेहद जरूरी है। केवल सीनियर होना ही किसी पद का प्रभार पाने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने बीईओ की याचिका को खारिज कर दिया।
FAQ
- अनुकंपा नियुक्ति में विवाद होने पर प्राथमिकता किसे मिलेगी?
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के अनुसार, यदि एक से अधिक योग्य दावेदार हैं तो बड़े बच्चे को प्राथमिकता दी जाएगी। - भारत में अनुकंपा नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य क्या होता है?
उत्तर: सेवाकाल के दौरान किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु होने पर उसके परिवार को तत्काल वित्तीय संकट और भुखमरी से बचाना। - दूसरी शादी से जन्मी संतान के अनुकंपा नियुक्ति में अधिकारों को लेकर अदालत का क्या रुख है?
उत्तर: कानून के तहत दूसरी शादी से जन्मी संतान भी मृत कर्मचारी की कानूनी वारिस (Legal Heir) मानी जाती है और अनुकंपा नौकरी की हकदार होती है।
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