पहली बार हाईकोर्ट ने वापस लिया अपना ही आदेश, महिला अधिकारी के केस में बड़ा ट्विस्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसे न्यायिक इतिहास में बेहद असामान्य माना जा रहा है। पहली बार ऐसा हुआ, जब हाई कोर्ट को अपना ही फैसला वापस लेना पड़ा। वजह बनी एक फर्जी सरकारी सर्कुलर, जिसके आधार पर एक महिला चिकित्सक ने नियमितीकरण का केस जीत लिया था। हालांकि बाद में जब चिकित्सक को सच्चाई का पता चला तो उन्होंने खुद हाई कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर कर अपनी गलती स्वीकार की और अदालत से आदेश वापस लेने की गुहार लगाई।
हाई कोर्ट ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए अपना पुराना आदेश निरस्त कर दिया है और मूल याचिका को दोबारा सुनवाई के लिए बहाल कर दिया है।
क्या है पूरा मामला?
बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के मोपका प्राथमिक स्वास्थ्य आयुष केंद्र में संविदा पर कार्यरत आयुर्वेदिक चिकित्सा अधिकारी डॉ. ममता मिश्रा ने नियमितीकरण की मांग को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
याचिका में उन्होंने दावा किया था कि वे करीब 18 वर्षों से संविदा सेवा दे रही हैं और नियमितीकरण की पात्र हैं। इसके समर्थन में उन्होंने 28 मई 2010 का एक सरकारी सर्कुलर अदालत में पेश किया। इस सर्कुलर में कथित तौर पर संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण पर विचार करने का निर्देश दिया गया था।
मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने 5 जनवरी 2026 को आदेश जारी करते हुए याचिकाकर्ता को नया अभ्यावेदन प्रस्तुत करने और संबंधित अधिकारियों को 2010 के सर्कुलर को ध्यान में रखते हुए चार महीने के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए थे।
बाद में पता चला- सर्कुलर ही फर्जी था
हाई कोर्ट से आदेश मिलने के कुछ समय बाद डॉ. ममता मिश्रा को जानकारी मिली कि जिस सर्कुलर के आधार पर उन्होंने अदालत में मामला जीता, उसे राज्य सरकार पहले ही फर्जी घोषित कर चुकी है।
दरअसल राज्य सरकार ने 2 जून 2010 को स्पष्टीकरण जारी कर स्पष्ट किया था कि 28 मई 2010 का कथित सर्कुलर पूरी तरह मनगढ़ंत और फर्जी है।
यह जानकारी सामने आने के बाद चिकित्सक ने अदालत से कोई लाभ लेने या विभाग में आदेश के आधार पर कोई दावा प्रस्तुत नहीं किया।
डॉक्टर ने खुद मानी गलती
मामले का खुलासा होने के बाद डॉ. ममता मिश्रा ने हाई कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर की। इसमें उन्होंने कहा कि उन्हें सर्कुलर के फर्जी होने की जानकारी नहीं थी और अनजाने में यह गलती हुई।
उन्होंने अदालत को बताया कि उनकी मंशा कभी भी गलत या दुर्भावनापूर्ण नहीं थी। इसी वजह से उन्होंने हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद विभाग के सामने किसी प्रकार का लाभ या नियमितीकरण का दावा पेश नहीं किया।
डॉक्टर ने अदालत से अनुरोध किया कि पुराने आदेश को निरस्त कर मूल याचिका को दोबारा बहाल किया जाए ताकि सही तथ्यों के आधार पर केस की सुनवाई हो सके।
हाईकोर्ट ने वापस लिया फैसला
हाईकोर्ट ने रिव्यू पिटीशन पर सुनवाई करते हुए अपना पूर्व आदेश वापस ले लिया और मूल याचिका को पुनः सुनवाई के लिए बहाल कर दिया।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि याचिकाकर्ता ने अदालत के आदेश के आधार पर विभाग में कोई जॉइनिंग, लाभ या प्रशासनिक दावा पेश नहीं किया है।
फर्जी सर्कुलर बनाने वालों पर होगी कार्रवाई
राज्य सरकार ने अदालत को यह भी जानकारी दी कि फर्जी सर्कुलर तैयार करने और प्रसारित करने के पीछे जो लोग जिम्मेदार हैं, उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
यह मामला अब सिर्फ नियमितीकरण विवाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी दस्तावेजों की विश्वसनीयता और न्यायिक प्रक्रिया में प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच को लेकर भी बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
क्यों खास है यह मामला?
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक यह मामला इसलिए बेहद खास माना जा रहा है क्योंकि आमतौर पर अदालत के आदेश के बाद पक्षकार लाभ लेने की कोशिश करते हैं, लेकिन यहां याचिकाकर्ता ने खुद अदालत के सामने गलती स्वीकार करते हुए आदेश वापस लेने की मांग की।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के इतिहास में यह संभवतः पहला मामला है, जब किसी पक्षकार की स्वीकारोक्ति के बाद अदालत को अपना फैसला वापस लेना पड़ा।
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