50 करोड़ के चरण पादुका टेंडर पर हाईकोर्ट की रोक, वन विभाग पर सवाल
RAIPUR : छत्तीसगढ़ में तेंदूपत्ता संग्राहकों के लिए प्रस्तावित करीब 50 करोड़ रुपये के चरण पादुका (जू ते-चप्पल) खरीद टेंडर पर बिलासपुर हाईकोर्ट की रोक के बाद वन विभाग और छत्तीसगढ़ राज्य लघु वन उपज सहकारी संघ की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है।
अदालत द्वारा विवादित निविदा प्रक्रिया निरस्त किए जाने के बाद पूरे मामले को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। जानकारी के अनुसार प्रदेश के लगभग 13 लाख तेंदूपत्ता संग्राहकों को चरण पादुका वितरित करने के लिए बड़े पैमाने पर खरीद प्रक्रिया शुरू की गई थी।
इसके लिए जारी टेंडर को चुनौती मिलने के बाद हाईकोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया। अदालत के इस फैसले के बाद संबंधित विभाग में हलचल मच गई है और पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं।
वन विभाग की प्रक्रिया पर सवाल :
सूत्रों के मुताबिक, इस खरीद प्रक्रिया में विभागीय नियमों और संस्थागत प्रक्रियाओं का समुचित पालन नहीं किया गया। बताया जा रहा है कि हाल ही में राज्य लघु वन उपज सहकारी संघ में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और संचालक मंडल का गठन किया गया था।
सामान्यतः इतनी बड़ी वित्तीय खरीद से पहले प्रस्ताव संचालक मंडल के समक्ष रखा जाना चाहिए था, ताकि उस पर चर्चा और अनुमोदन हो सके। हालांकि आरोप है कि इस मामले में न तो बोर्ड की औपचारिक स्वीकृति ली गई और न ही खरीद प्रक्रिया पर विस्तृत विचार-विमर्श कराया गया।
टेंडर प्रक्रिया में नियमों को ठेंगा :
विभागीय स्तर पर इस तरह सीधे निविदा जारी किए जाने को लेकर कई तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। जानकारों का मानना है कि यदि प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुरूप अपनाई जाती, तो विवाद की स्थिति से बचा जा सकता था। अब अदालत के हस्तक्षेप के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या इतनी बड़ी खरीद में सभी प्रशासनिक औपचारिकताओं का पालन किया गया था या नहीं।
मामले ने राजनीतिक महत्व भी इसलिए हासिल कर लिया है क्योंकि यह योजना सीधे तेंदूपत्ता संग्राहकों से जुड़ी है, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासी समुदाय की है। ऐसे में विपक्ष और विभिन्न सामाजिक संगठनों की नजर भी इस पूरे घटनाक्रम पर बनी हुई है। वन विभाग की भूमिका और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
सीएम ने जताई नाराज़गी :
रिपोर्टों के अनुसार इस पूरे प्रकरण की जानकारी सामने आने के बाद सरकार के शीर्ष स्तर पर भी इसे गंभीरता से लिया गया है। मुख्यमंत्री ने मामले पर नाराजगी जताई है और संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस पूरे प्रकरण की विभागीय समीक्षा हो सकती है और यदि किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई भी संभव है।
क्या है योजना :
तेंदूपत्ता संग्राहकों के लिए चरण पादुका वितरण योजना का उद्देश्य वन क्षेत्रों में कार्य करने वाले श्रमिकों को राहत और सुरक्षा उपलब्ध कराना है। ऐसे में योजना के क्रियान्वयन में किसी भी प्रकार की प्रशासनिक लापरवाही या प्रक्रिया संबंधी त्रुटि सीधे हितग्राहियों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकार नई निविदा प्रक्रिया किस तरह अपनाती है और विवादित टेंडर को लेकर आगे क्या कार्रवाई होती है।
FAQ
- चरण पादुका योजना का उद्देश्य क्या है?
उत्तर: जंगलों के भीतर कटीले रास्तों और पथरीली जमीनों पर तेंदूपत्ता इकट्ठा करने वाले श्रमिकों को सुरक्षा देना इस योजना का मुख्य उद्देश्य है। उन्हें मुफ्त में जूते-चप्पल (चरण पादुका) दिए जाते हैं ताकि काम के दौरान उनके पैर सुरक्षित रहें। - तेंदूपत्ता संग्राहक कौन होते हैं और उनके लिए यह योजना क्यों जरूरी है?
उ. तेंदूपत्ता संग्राहक वे वनवासी और आदिवासी श्रमिक हैं जो जंगल में जाकर बीड़ी बनाने के लिए उपयोग होने वाले तेंदू के पत्ते इकट्ठा करते हैं। वन क्षेत्रों में काँटे और पथरीले रास्तों पर काम करते हुए चोट से बचाने के लिए उन्हें चप्पल-जूते देना इस योजना का मकसद है।
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