छत्तीसगढ़ की सरकारी लैब संभालेगी निजी कंपनी, युवाओं के रोजगार पर खतरा
समझें क्या है पूरा मामला
- HLL कंपनी से 240 करोड़ का अनुबंध
- अस्पतालों में 136 जांचें निजी हाथों में
- छत्तीसगढ़ के 6 हजार कर्मचारी प्रभावित
- मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में भी होंगे टेस्ट
- युवाओं के रोजगार और गुणवत्ता पर सवाल
जांच सेवाएं निजी संस्था को सौंपी
छत्तीसगढ़ सरकार ने सरकारी अस्पतालों की जांच सेवाएं निजी संस्था को सौंप दी हैं। स्वास्थ्य विभाग ने केरल की एचएलएल कंपनी से पांच साल का अनुबंध किया है। इसके तहत प्रदेशभर की लैब और जांच सेवाओं का संचालन कंपनी करेगी। विभाग जहां वर्तमान व्यवस्था को दुरुस्त करने का दावा कर रहा है, वहीं स्वास्थ्य विभाग के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं। कर्मचारी संगठन इसे स्वास्थ्य कर्मियों के भविष्य से खिलवाड़ बता रहे हैं।
240 करोड़ में अनुबंध
स्वास्थ्य कर्मचारियों का दावा है कि प्रदेशभर की जांच व्यवस्था चलाने के लिए सालाना करीब 50 करोड़ रुपए के रिएजेंट और केमिकल पर्याप्त हैं। इसके बावजूद विभाग ने 240 करोड़ रुपए का अनुबंध कर दिया। छत्तीसगढ़ प्रदेश स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के रेडियोग्राफर प्रकोष्ठ के प्रांतीय संयोजक संतोष देवांगन का कहना है कि यह कर्मचारियों के साथ धोखा है। सवाल है कि जब मशीनें पहले से मौजूद हैं और स्टाफ भी उपलब्ध है, तब इतनी बड़ी राशि का अनुबंध किस जरूरत के तहत किया गया। यही मुद्दा अब विवाद का केंद्र बन गया है।
सरकारी मशीनें, निजी कर्मचारी
अस्पताल सरकार के हैं। मशीनें सरकार की हैं। भवन और संसाधन भी सरकारी हैं। लेकिन मशीनों को चलाने की जिम्मेदारी निजी कंपनी के कर्मचारियों को दी जाएगी। यानी पूरी व्यवस्था सरकारी रहेगी, लेकिन संचालन निजी हाथों में होगा। कर्मचारियों का कहना है कि इससे सरकारी तंत्र की भूमिका धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। नई भर्तियां नहीं होने से लैब क्षेत्र में काम करने वाले युवाओं के लिए रोजगार का एक बड़ा अवसर समाप्त हो जाएगा।
गांव से शहर तक बदलेगी व्यवस्था
यह व्यवस्था केवल बड़े अस्पतालों तक सीमित नहीं होगी। जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी इसके दायरे में आएंगे। मलेरिया, शुगर, एचआईवी समेत 136 प्रकार की जांचें कंपनी करेगी। निजीकरण से व्यवस्था सुधारने का दावा किया जा रहा है, लेकिन सवाल यही उठ रहा है कि क्या अस्पतालों में केमिकल की उपलब्धता और खाली पदों को भरकर व्यवस्था नहीं सुधर सकती थी? क्या अधिकारियों की बड़ी फौज की जगह निजी कंपनी ही व्यवस्था सुधारने में सक्षम है?
मानव संसाधन की भारी कमी
छत्तीसगढ़ के अस्पतालों में मानव संसाधन की भारी कमी है। सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारियों की भर्ती नहीं हो रही है। स्वीकृत सेटअप के मुकाबले केवल 50 प्रतिशत कर्मचारी ही कार्यरत हैं। डॉक्टरों की भर्ती भी नहीं हो रही है। कर्मचारी संघ के संयोजक अमृत निषाद विभाग से पूछ रहे हैं कि विभाग निजी कर्मचारियों के सहारे व्यवस्था दुरुस्त करने का दावा कैसे कर सकता है, जबकि निजी कंपनी के कर्मचारियों की संख्या नियमित कर्मचारियों की तुलना में कम होती है।
मेडिकल कॉलेज भी नहीं बचे
मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में भी कंपनी की भूमिका रहेगी। पेट-सीटी, सीटी स्कैन, एमआरआई और रेडियोलॉजी जैसी उन्नत जांचें भी कंपनी के माध्यम से संचालित होंगी। डायलिसिस यूनिट और इंटीग्रेटेड कैंसर सेंटर भी अनुबंध के दायरे में शामिल किए गए हैं। इससे पूरे स्वास्थ्य नेटवर्क पर निजी कंपनी की पकड़ बढ़ जाएगी।
6 हजार कर्मचारियों के सामने संकट
इस फैसले का असर करीब 6 हजार नियमित और संविदा कर्मचारियों पर पड़ सकता है। सबसे ज्यादा चिंता संविदा कर्मचारियों को है। उन्हें डर है कि निजी कंपनी के आने के बाद उनका अनुबंध समाप्त हो सकता है। इससे हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित होने की आशंका है।
नियमित कर्मचारी भी असमंजस में
नियमित कर्मचारियों की स्थिति भी स्पष्ट नहीं है। उन्हें अब तक नहीं बताया गया है कि उनकी जिम्मेदारियां क्या होंगी। विभाग का कहना है कि उन्हें फूड एंड ड्रग विभाग में अटैच किया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि लैब टेक्नीशियन खाद्य सामग्री और दवाओं की जांच संबंधी कार्यों के विशेषज्ञ नहीं होते। इसके लिए तीन से चार साल का अलग प्रशिक्षण और पढ़ाई होती है। कर्मचारियों का दावा है कि उन्हें बिना काम के वेतन दिए जाने जैसी चर्चाएं भी चल रही हैं। हालांकि, इस पर कोई स्पष्ट आदेश नहीं आया है।
पंजीयन नियम पर भी विवाद
आरोप है कि निजी कंपनी अपने स्तर पर कर्मचारियों की भर्ती करेगी। इसके लिए राज्य की संबंधित काउंसिल में पंजीयन की अनिवार्यता भी समाप्त कर दी गई है। यदि ऐसा है तो गुणवत्ता और जवाबदेही पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोग इसे गंभीर विषय मान रहे हैं।
मेडिकल शिक्षा पर पड़ सकता है असर
मेडिकल कॉलेजों के पैथोलॉजी लैब में भी चिंता बढ़ गई है। जूनियर डॉक्टरों का कहना है कि जांच प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी कम हो जाएगी। यदि प्रैक्टिकल एक्सपोजर घटा तो विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैयारी प्रभावित हो सकती है। इसका असर भविष्य की चिकित्सा शिक्षा पर भी दिखाई दे सकता है।
स्वास्थ्य विभाग का तर्कस्वास्थ्य संचालक संजीव झा बस इतना कह पा रहे हैं कि जांच के लिए नई कंपनी से अनुबंध हुआ है इससे मरीजों को लाभ मिलेगा, कंपनी नई मशीने ला रही, जो ज्यादा सटीक रिपोर्ट देंगी,
निजीकरण की ओर बढ़ता कदम?
कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि विभाग का काम व्यवस्था बनाना है। लंबे समय से रिएजेंट की कमी और मानव संसाधन की कमी से अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र जूझ रहे हैं। मरीजों की जांच नहीं हो पा रही थी। इन कमियों को दूर करने की जरूरत थी, न कि पूरी व्यवस्था निजी कंपनी के हाथों सौंपने की। उनका कहना है कि यह केवल आउटसोर्सिंग नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है।
निष्कर्ष
240 करोड़ रुपए के इस अनुबंध ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जब अस्पताल, मशीनें और कर्मचारी पहले से मौजूद हैं, तब निजी कंपनी को इतनी बड़ी जिम्मेदारी क्यों सौंपी गई? इसका जवाब स्वास्थ्य विभाग को देना होगा। क्योंकि यह मामला सिर्फ जांच सेवाओं का नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के भविष्य का भी है।
FAQ
- छत्तीसगढ़ सरकार ने सरकारी लैब के संचालन के लिए किस कंपनी से समझौता किया है?
उत्तर: छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग ने केरल की प्रसिद्ध सरकारी/निजी क्षेत्र की एचएलएल (HLL) कंपनी के साथ एक समझौता किया है। इस अनुबंध के तहत अब प्रदेशभर के जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और मेडिकल कॉलेजों की प्रयोगशालाओं (Labs) व जांच सेवाओं के प्रबंधन और संचालन की पूरी जिम्मेदारी इसी कंपनी की होगी। - स्वास्थ्य अनुबंध कितने रुपये और कितने वर्षों के लिए किया गया है?
उत्तर: यह पूरा अनुबंध 5 वर्षों की अवधि के लिए कुल ₹240 करोड़ में किया गया है। स्वास्थ्य विभाग जहाँ इसे वर्तमान लचर व्यवस्था को सुधारने वाला कदम बता रहा है, वहीं स्वास्थ्य कर्मचारी संघ का आरोप है कि प्रदेशभर की जांच व्यवस्था को सरकारी स्तर पर सुचारू रूप से चलाने के लिए सालाना सिर्फ ₹50 करोड़ के केमिकल और रिएजेंट ही काफी थे, ऐसे में ₹240 करोड़ का भारी-भरकम बजट देना वित्तीय बर्बादी है। - लैब टेक्नीशियनों के समायोजन (Adjustment) और काउंसिल पंजीयन को लेकर क्या नया विवाद खड़ा हुआ है?
उत्तर: विवाद यह है कि निजी कंपनी अपने स्तर पर नए कर्मचारियों की भर्ती करेगी, जिसके लिए राज्य की संबंधित काउंसिल में पंजीयन (Registration) की अनिवार्यता को समाप्त किए जाने का आरोप है, जिससे जांच की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं। वहीं, वर्तमान सरकारी लैब टेक्नीशियनों को बिना स्पष्ट आदेश के फूड एंड ड्रग विभाग में अटैच करने की चर्चा है, जबकि वे खाद्य और दवाओं की जांच के विशेषज्ञ नहीं हैं।
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