तीन बार हार, चौथी बार जीत... आईएएस अविनाश मिश्रा की प्रेरक कहानी
यह कहानी सिर्फ एक आईएएस अधिकारी की नहीं है, बल्कि उस जज़्बे की है, जिसने लगातार तीन असफलताओं के बाद भी हार मानने से इनकार कर दिया। ओडिशा के एक छोटे से गांव से निकलकर आईआईटी खड़गपुर तक पहुंचने और फिर चौथे प्रयास में यूपीएससी की परीक्षा पास कर देश के सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक पद तक पहुंचने वाले अविनाश मिश्रा की यात्रा किसी फ़िल्मी पटकथा से कम नहीं है। अगर किसी छात्र से पूछा जाए कि देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक यूपीएससी को पास करने का सबसे बड़ा मंत्र क्या है, तो शायद उसका जवाब होगा....मेहनत, लेकिन आईएएस अविनाश मिश्रा की कहानी बताती है कि सिर्फ मेहनत ही नहीं, बल्कि धैर्य, आत्मविश्वास और बार-बार गिरकर उठने की क्षमता भी उतनी ही ज़रूरी है। ओडिशा के बरगढ़ जिले के छोटे से गांव झुनगापाली से निकलकर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बाद धमतरी के प्रशासनिक तंत्र की कमान संभालने तक का उनका सफर बेहद दिलचस्प रहा है।
सरकारी स्कूल से शुरू हुई कहानी
1992 को जन्मे अविनाश मिश्रा का बचपन एक साधारण परिवार में बीता। उनके माता-पिता शिक्षक थे। घर में शिक्षा का माहौल था, लेकिन संसाधन सीमित थे। अविनाश ने जिस स्कूल में पढ़ाई की, वहां उनकी मां भी शिक्षिका थीं। गांव के उसी सरकारी स्कूल से उन्होंने प्राथमिक शिक्षा से लेकर दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी की। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि ओड़िया माध्यम में पढ़ने वाला यह छात्र एक दिन देश की सबसे कठिन परीक्षा में सफलता हासिल करेगा। उनकी शुरुआती शिक्षा ने उन्हें एक अहम बात सिखाई-मजबूत नींव ही ऊंची इमारत की पहचान होती है।
आईआईटी खड़गपुर तक का सफर
दसवीं कक्षा पास करने के बाद अविनाश ने विज्ञान और गणित को अपने भविष्य का आधार बनाया। इसके बाद उन्होंने संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) की तैयारी शुरू कर दी। साल 2010 में उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में से एक आईआईटी खड़गपुर में दाखिला मिल गया। वहां उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। साल 2014 में इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद उनके सामने दो रास्ते थे। पहला रास्ता आरामदायक नौकरी का था और दूसरा रास्ता संघर्ष से भरे सिविल सेवा के सफर का। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।
लगातार तीन बार मिली नाकामी
दिल्ली पहुंचकर अविनाश मिश्रा ने यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी। यह सफर आसान नहीं था। आर्थिक चुनौतियां थीं, मानसिक दबाव था और सफलता की कोई गारंटी भी नहीं थी। पहले प्रयास में वे असफल रहे। दूसरे प्रयास में भी सफलता हाथ नहीं लगी। तीसरे प्रयास में भी किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया।लगातार तीन बार मिली असफलता के बावजूद वे हार मानने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने अपनी रणनीति बदली, गलतियों का विश्लेषण किया और फिर से पूरी ताकत के साथ तैयारी में जुट गए।
चौथे प्रयास में बदल गई किस्मत
चौथे प्रयास में अविनाश मिश्रा ने वह कर दिखाया, जिसका सपना लाखों युवा देखते हैं। उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 65 हासिल की और भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चुने गए। यह सिर्फ एक परीक्षा में सफलता नहीं थी, बल्कि यह उन तमाम संघर्षों पर जीत थी, जिनसे गुजरते हुए उन्होंने यह मुकाम हासिल किया था। यूपीएससी की तैयारी के दौरान अविनाश मिश्रा ने केवल अपनी सफलता के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर संडे क्लासेस नाम का एक सामाजिक अभियान भी शुरू किया। इस पहल का उद्देश्य उन बच्चों तक शिक्षा पहुंचाना था, जिन्हें बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं नहीं मिल पाती थीं। यही सोच बाद में उनके प्रशासनिक कामकाज में भी दिखाई दी।
छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक जिम्मेदारियां
आईएएस बनने के बाद अविनाश मिश्रा को छत्तीसगढ़ कैडर मिला। उनकी पहली महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दंतेवाड़ा में एसडीएम के रूप में रही। नक्सल प्रभावित इलाके में काम करना किसी भी युवा अधिकारी के लिए आसान नहीं होता, लेकिन उन्होंने चुनौती को अवसर में बदल दिया। इसके बाद उन्हें रायपुर जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) की जिम्मेदारी सौंपी गई। यहां उन्होंने ग्रामीण विकास से जुड़े कई कार्यक्रमों की निगरानी की। उनके कामकाज को देखते हुए सरकार ने उन्हें रायपुर नगर निगम के आयुक्त और रायपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड के प्रबंध संचालक के रूप में नियुक्त किया। शहर के विकास से जुड़े कई बड़े फैसलों और योजनाओं की जिम्मेदारी उन्होंने बखूबी निभाई। अब वे धमतरी जिले के कलेक्टर के रूप में जिले की व्यवस्था देख रहे हैं।
क्यों अलग है यह कहानी
अविनाश मिश्रा की कहानी इसलिए खास है, क्योंकि यह बताती है कि सफलता किसी बड़े शहर, महंगे स्कूल या अंग्रेजी माध्यम की मोहताज नहीं होती। ओड़िया माध्यम से पढ़ाई करने वाला एक छात्र आईआईटी पहुंचता है, तीन बार असफल होता है, लेकिन हार नहीं मानता और आखिरकार आईएएस बनकर लाखों युवाओं के लिए मिसाल बन जाता है। शायद यही वजह है कि आज उनकी कहानी सिर्फ एक अफसर की जीवनी नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और सपनों को साकार करने की प्रेरणादायक कहानी बन चुकी है।
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