हिंदी मीडियम से आईआईटी, फिर आईएएस... जानिए कुणाल दुदावत की कहानी
राजस्थान के सवाई माधोपुर का एक लड़का, जिसने प्राथमिक शिक्षा हिंदी माध्यम से हासिल की, बाद में देश के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान में जगह बनाई। इसके बाद कनाडा की कंपनी में नौकरी की, फ्लिपकार्ट में सॉफ्टवेयर डेवलपर बने और फिर करोड़ों रुपए के करियर को छोड़कर सिविल सेवा की तैयारी में जुट गए। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने भारतीय वन सेवा की परीक्षा पास की, फिर भारतीय पुलिस सेवा के लिए चुने गए और आखिरकार तीसरे प्रयास में भारतीय प्रशासनिक सेवा तक पहुंच गए। यह कहानी छत्तीसगढ़ कैडर के वर्ष 2017 बैच के आईएएस अधिकारी कुणाल दुदावत की है, जो इस समय अपनी प्रशासनिक शैली और जमीनी कामकाज के कारण चर्चा में हैं।
हिंदी माध्यम से पढ़ाई
कुणाल दुदावत का जन्म 1992 में राजस्थान के सवाई माधोपुर में हुआ था। उनके पिता सरकारी अस्पताल में चिकित्सक थे। परिवार में अधिकांश लोग चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े हुए थे, लेकिन कुणाल ने अपने लिए एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने पहली से दसवीं कक्षा तक हिंदी माध्यम में पढ़ाई की। इसके बाद ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा के लिए अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में दाखिला लिया। यह बदलाव आसान नहीं था। भाषा बदलने के साथ-साथ पढ़ाई का तरीका भी बदल गया था। भौतिकी, रसायन विज्ञान और गणित जैसे विषयों में खुद को साबित करने के लिए उन्हें पहले से कहीं अधिक मेहनत करनी पड़ी। कड़ी मेहनत का परिणाम यह हुआ कि उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की प्रवेश परीक्षा पास कर ली और मुंबई स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में कंप्यूटर विज्ञान शाखा में प्रवेश हासिल किया।
20 साल की उम्र में इंजीनियर
कुणाल दुदावत की शैक्षणिक यात्रा सामान्य विद्यार्थियों से थोड़ी अलग रही। महज 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर ली और कॉरपोरेट क्षेत्र में कदम रख दिया। इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद कुणाल दुदावत ने एक कनाडाई कंपनी में काम करना शुरू किया। वहां पांच महीने तक नौकरी करने के बाद वह भारत लौट आए और फ्लिपकार्ट में सॉफ्टवेयर डेवलपर के रूप में काम करने लगे। उस समय उनका करियर पूरी तरह सुरक्षित माना जा रहा था। अच्छी नौकरी, शानदार वेतन और उज्ज्वल भविष्य उनके सामने था, लेकिन उनके मन में कुछ और ही चल रहा था। उन्होंने नौकरी छोड़ने का फैसला किया और दिल्ली पहुंच गए। वहां अपने कुछ साथियों के साथ एक फ्लैट में रहकर उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी।
पहला प्रयास असफल, लेकिन हौसला नहीं टूटा
वर्ष 2014 में उन्होंने अपना पहला प्रयास किया। उस समय उनके पास तैयारी के लिए केवल पांच या छह महीने ही थे। परिणाम उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। दूसरे प्रयास में उनका चयन भारतीय पुलिस सेवा के लिए हो गया। इससे पहले वह भारतीय वन सेवा के लिए भी चुने जा चुके थे। उन्हें एजीएमयूटी कैडर मिला और उन्होंने प्रशिक्षण शुरू कर दिया। इसी दौरान उन्होंने एक बार फिर परीक्षा दी और तीसरे प्रयास में भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित हो गए। उन्हें 669वीं रैंक मिली और छत्तीसगढ़ कैडर आवंटित किया गया।
बिलासपुर से शुरू हुआ प्रशासनिक सफर
कुणाल दुदावत ने 11 दिसंबर 2017 को अपनी सेवा शुरू की। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें बिलासपुर जिले में सहायक कलेक्टर की जिम्मेदारी मिली। इसके बाद वह कोटा और फिर महासमुंद जिले के सरायपाली में अनुविभागीय अधिकारी के पद पर रहे। यहीं से उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था की बारीकियों को करीब से समझना शुरू किया। इसके बाद उन्हें कोरिया जिले में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी की जिम्मेदारी सौंपी गई। यहां उन्होंने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण पहल कीं। झुमका बांध को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने और सोनहत क्षेत्र के सौंदर्यीकरण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन प्रयासों ने स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और विकास के नए अवसर पैदा किए।
बिलासपुर की तस्वीर बदलने की कोशिश
कोरिया के बाद उन्हें बिलासपुर नगर निगम का आयुक्त और स्मार्ट सिटी परियोजना का प्रबंध निदेशक बनाया गया। इस दौरान उन्होंने कई विकास कार्यों को आगे बढ़ाया। अरपा नदी के तट के विकास की योजना उनके कार्यकाल की सबसे चर्चित परियोजनाओं में शामिल रही। इसके अलावा शहरी बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए भी कई कदम उठाए गए।
बस्तर से कोरबा तक की जिम्मेदारी
नगर निगम में काम करने के बाद उन्हें पहली बार जिले की कमान सौंपी गई और वह कोंडागांव के कलेक्टर बनाए गए। इसके बाद उन्होंने दंतेवाड़ा जैसे संवेदनशील जिले में अपनी सेवाएं दीं और अब वह कोरबा जिले के कलेक्टर के रूप में कार्य कर रहे हैं। कुणाल दुदावत की कहानी यह बताती है कि सफलता केवल अंग्रेजी माध्यम, बड़े शहरों या महंगे संसाधनों पर निर्भर नहीं करती। हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने वाला एक छात्र भी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान तक पहुंच सकता है, अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में काम कर सकता है और फिर देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा में अपनी जगह बना सकता है। शायद यही वजह है कि उनकी कहानी आज हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है।
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