आईपीएस जितेंद्र यादव ; गांव की मिट्टी से निकलकर नक्सल मोर्चे तक का सफर
छत्तीसगढ़ कैडर के 2018 बैच के आईपीएस जितेंद्र यादव उन चुनिंदा अफसरों में हैं, जिन्होंने सिर्फ एक बार नहीं, बल्कि बार-बार खुद को साबित किया। तीन बार यूपीएससी निकालना। सीजीपीएससी में चयन। आईआरएस की नौकरी और फिर आईपीएस बनने तक का सफर। ये कहानी सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि लगातार संघर्ष और धैर्य की मिसाल है।
छोटे गांव से बड़े सपने
25 जनवरी 1989 को जशपुर जिले के पत्थलगांव ब्लॉक के पाकर गांव में जन्मे जितेंद्र यादव का जीवन साधारण परिवार से शुरू हुआ। पिता स्वर्गीय घनश्याम यादव सिंचाई विभाग में संविदा सुपरवाइजर थे, जिनकी आय सीमित थी, लेकिन सपनों की कोई सीमा नहीं थी। घर में आर्थिक तंगी थी, ऊपर से पिता की गंभीर बीमारी। ऐसे हालात में जहां कई सपने दम तोड़ देते हैं, वहीं जितेंद्र के परिवार ने उन्हें टूटने नहीं दिया।
भाइयों ने आगे बढ़ाया
जितेंद्र यादव की सफलता के पीछे उनके दो बड़े भाइयों का त्याग सबसे बड़ी ताकत बना। एक भाई शिक्षक और दूसरे सब-इंस्पेक्टर बने। दोनों ने अपनी पढ़ाई रोक दी ताकि छोटे भाई का भविष्य बन सके। उन्होंने अपनी सैलरी का बड़ा हिस्सा पिता के इलाज और जितेंद्र की पढ़ाई में लगाया। यहां तक कि यूपीएससी प्रीलिम्स के समय उन्होंने पिता के आईसीयू में भर्ती होने की खबर तक नहीं दी, ताकि जितेंद्र का ध्यान न भटके। गांव के सरस्वती शिशु मंदिर से पढ़ाई शुरू हुई और फिर नवोदय विद्यालय भूपदेवपुर तक पहुंची। 10वीं में 85% और 12वीं में 90.6% अंक लाकर उन्होंने अपनी प्रतिभा साबित कर दी। इसके बाद चेन्नई के मद्रास वेटरनरी कॉलेज से बैचलर ऑफ वेटरनरी साइंस की पढ़ाई की और 88.94% अंकों के साथ यूनिवर्सिटी गोल्ड मेडलिस्ट बने। यह उपलब्धि सिर्फ अकादमिक नहीं, बल्कि संघर्ष के बीच हासिल की गई जीत थी।
बिना कोचिंग, कई बार सफलता
दिल्ली आकर जितेंद्र यादव ने नौकरी के साथ यूपीएससी की तैयारी शुरू की। परिवार पर बोझ न पड़े, इसलिए उन्होंने पशु चिकित्सा विभाग में नौकरी भी की। पहले ही प्रयास (2014) में 349वीं रैंक के साथ यूपीएससी क्रैक कर आईआरएस बने। 2015 और 2016 में असफलता भी मिली, लेकिन 2017 में 170वीं रैंक लाकर आईपीएस के लिए चयनित हुए। 2019 में भी 370वीं रैंक से यूपीएससी फिर निकाला। यह सफर बताता है कि असफलता अंत नहीं, बल्कि तैयारी का हिस्सा होती है।
मैदान में दमदार प्रदर्शन
27 अगस्त 2018 को आईपीएस ज्वाइन करने के बाद हैदराबाद की सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी से प्रशिक्षण पूरा किया। बलौदा बाजार-भाटापारा में प्रशिक्षु आईपीएस के रूप में भाटा पारा थाना प्रभारी रहे। उसके बाद सीएसपी दुर्ग रहते हुए लॉ एंड ऑर्डर को मजबूत किया।कांकेर में एडिशनल एसपी (नक्सल ऑपरेशन) रहते हुए नक्सल ऑपरेशन को लीड किया। नए पुलिस कैंप स्थापित कराए। इतना ही नहीं बस्तर फाइटर्स भर्ती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एसपी के रूप में सबसे पहले बालोद जिले की कमान मिली। वहां पाटेश्वर धाम विवाद को शांतिपूर्वक सुलझाया। 1 करोड़ की चोरी का खुलासा किया।
बीजापुर में एसपी के रूप में
जितेंद्र यादव पिछले दो साल से बीजापुर एसपी की कमान संभाले हुए हैं। नक्सल कोर एरिया में 36 नए कैंप स्थापित किए हैं। इस दौरान उनकी टीम ने 234 नक्सली मारे और 1200 से ज्यादा गिरफ्तार किए हैं और इस दौरान 1000 से ज़्यादा नक्सलियों ने सरेंडर भी किया। यह आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं, बल्कि जमीन पर किए गए काम की गवाही हैं।
संघर्ष से मिला मुकाम
आईपीएस जितेंद्र यादव की कहानी हमें सिखाती है कि संसाधनों की कमी कभी भी सफलता की राह नहीं रोक सकती। अगर परिवार का साथ, खुद पर भरोसा और लगातार मेहनत हो।गांव के एक साधारण छात्र से लेकर नक्सल प्रभावित जिले के एसपी बनने तक का सफर यह साबित करता है कि असली ताकत हालात में नहीं, बल्कि इंसान के इरादों में होती है।
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