पिता की छोटी दुकान से लेकर CBI तक का सफर, आईपीएस रामगोपाल गर्ग की प्रेरक कहानी
कभी पिता की छोटी-सी कपड़े की दुकान, पढ़ाई के लिए लिया गया कर्ज और इंजीनियरिंग के बाद बेंगलुरु की नौकरी… और फिर उसी नौकरी को छोड़कर यूपीएससी की तैयारी। दो बार असफलता मिली, लेकिन तीसरी कोशिश में 152वीं रैंक हासिल कर आईपीएस बनने का सपना पूरा किया।
इसके बाद नक्सल प्रभावित इलाकों से लेकर सीबीआई की हाईप्रोफाइल जांच और फिर छत्तीसगढ़ पुलिस की अहम जिम्मेदारियों तक आईपीएस रामगोपाल गर्ग का करियर लगातार चुनौतीपूर्ण पोस्टिंग्स से गुजरता रहा।
सीबीआई में रहते हुए उन्होंने ही राम रहीम केस की जांच की और राम रहीम को जेल पहुंचाया। आज वे छत्तीसगढ़ कैडर के 2007 बैच के आईपीएस अधिकारी और बिलासपुर रेंज के आईजी हैं। उनकी कहानी सिर्फ एक पुलिस अधिकारी के करियर की कहानी नहीं है।
इसमें संघर्ष है, तकनीक के इस्तेमाल का प्रयोग है और मुश्किल परिस्थितियों में फैसले लेने की क्षमता भी है। राष्ट्रपति अवार्ड से सम्मानित होने जा रहे आईपीएस रामगोपाल की कहानी न केवल दिलचस्प है बल्कि युवाओं के लिए प्रेरक भी है।
भटिंडा से शुरू हुई कहानी
रामगोपाल गर्ग का परिवार आर्थिक रूप से बहुत संपन्न नहीं था। उनके पिता कपड़े की छोटी-सी दुकान चलाते थे। परिवार में दो भाई और दो बहनें थीं। दसवीं तक उन्होंने पंजाबी माध्यम के एक निजी स्कूल में पढ़ाई की।
इसके बाद 11वीं और 12वीं में उन्होंने फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स चुना। दिलचस्प बात यह है कि उनकी रुचि कॉमर्स में थी, लेकिन पिता चाहते थे कि बेटा इंजीनियर बने। पिता की इच्छा को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने गणित को अपना विषय बनाया।
पंजाब कॉमन एंट्रेंस टेस्ट में उनकी 38वीं रैंक आई और उनका दाखिला थापर इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में हुआ। यहां पढ़ाई के साथ आर्थिक संघर्ष भी था। गर्ग ने अपनी मेहनत से अच्छे अंक हासिल किए और उन्हें स्कॉलरशिप मिल गई।
इंजीनियरिंग पूरी होते-होते रामगोपाल गर्ग का कैंपस सेलेक्शन मोटोरोला में हो गया। नौकरी के लिए वे बेंगलुरु पहुंचे और करीब दो साल तक कंपनी में काम किया।
यह नौकरी उनके लिए केवल करियर की शुरुआत नहीं थी। उनके सामने कुछ सपने भी थे। कुछ समय बाद उन्होंने कॉरपोरेट नौकरी छोड़ दी और वापस भटिंडा लौटकर यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी।
तीसरी कोशिश में सफलता
यूपीएससी का सफर आसान नहीं रहा। पहले प्रयास में सफलता नहीं मिली। दूसरे प्रयास में भी मंजिल दूर रही, लेकिन रामगोपाल गर्ग ने हार नहीं मानी। तीसरे प्रयास में उन्होंने यूपीएससी परीक्षा में 152वीं रैंक हासिल की और भारतीय पुलिस सेवा के लिए चुने गए।
उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर मिला। इसके बाद उनकी पढ़ाई का सिलसिला भी जारी रहा। उन्होंने उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद से पुलिसिंग से जुड़ी मास्टर डिग्री की और पुणे यूनिवर्सिटी से साइबर लॉ में पोस्ट ग्रेजुएशन किया।
नक्सल इलाके में पहली बड़ी चुनौती
2008 में वे राजनांदगांव में प्रशिक्षु आईपीएस रहे। इसके बाद 2011 में गरियाबंद में नक्सली हमले के बाद उन्हें जिले की जिम्मेदारी दी गई। गरियाबंद उनके लिए पहला जिला था और चुनौती भी बड़ी थी।
नक्सली हमले में पुलिस जवान शहीद हुए थे और एक जवान लापता था। उस जवान की तलाश पुलिस के सामने तत्काल चुनौती थी। आखिरकार उसे सकुशल तलाश कर लिया गया। गर्ग ने गरियाबंद में करीब 23 महीने बिताए।
इस दौरान उन्होंने जिले के अंदरूनी और संवेदनशील इलाकों में छह नए थाने खुलवाने की दिशा में काम किया। पुलिस की पहुंच बढ़ाने और नक्सली गतिविधियों पर अंकुश लगाने पर उनका जोर रहा।
इसके बाद वे कोरिया में करीब छह महीने और बालोद में करीब तीन महीने एसपी रहे। फिर पुलिस मुख्यालय में एसआईबी के एसपी की जिम्मेदारी संभाली। एक वर्ष तक वे तत्कालीन राज्यपाल बलरामजी दास टंडन के परिसहाय भी रहे।
सीबीआई में सात साल और हाईप्रोफाइल जांच
2015 में रामगोपाल गर्ग केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर सीबीआई पहुंचे। एसपी के रूप में उन्होंने दिल्ली और चंडीगढ़ में काम किया। यहां उनका सामना आर्थिक अपराधों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई को सौंपे गए मामलों से हुआ।
सीबीआई में उनके करियर का सबसे चर्चित अध्याय डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम से जुड़े मामले की जांच रहा। मामले में जांच के दौरान जुटाए गए सबूतों और तैयार की गई चार्जशीट ने आगे की न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने राम रहीम को दोषी करार दिया।
सीबीआई में करीब सात साल की प्रतिनियुक्ति के बाद वे वापस छत्तीसगढ़ लौटे। इसके बाद उन्हें अंबिकापुर रेंज का आईजी बनाया गया।
साइबर अपराध और टेक्नोलॉजी
अंबिकापुर में उन्होंने अपराध नियंत्रण के साथ साइबर अपराध के खिलाफ जागरूकता पर भी जोर दिया। साइबर अपराधों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए साइबर प्रहरी अभियान चलाया।
इसके बाद वे रायगढ़ उप-रेंज के डीआईजी बने। यहां कानून व्यवस्था के साथ वीवीआईपी सुरक्षा भी बड़ी जिम्मेदारी रही। प्रधानमंत्री के दो दौरे इसी दौरान हुए। रायगढ़ में एक्सिस बैंक में करीब 2.40 करोड़ रुपए की डकैती ने पुलिस के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी।
पुलिस ने बलरामपुर पुलिस के सहयोग से आरोपियों को गिरफ्तार किया और लूटी गई रकम की बरामदगी की। इस केस में पुलिस ने एक अलग तकनीक का इस्तेमाल किया। आरोपियों की चाल-ढाल को घटना के सीसीटीवी फुटेज से मिलाने के लिए गेट पैटर्न तकनीक का इस्तेमाल किया गया।
आरोपियों को घटनास्थल पर ले जाकर घटना का री-एनैक्टमेंट कराया गया और उनकी चाल को रिकॉर्ड किया गया। बाद में फुटेज और रिकॉर्डिंग की वैज्ञानिक जांच कराई गई, ताकि आरोपियों के खिलाफ सबूतों को और मजबूत किया जा सके।
दुर्ग में नई तकनीक पर जोर
रायगढ़ के बाद वे कुछ समय राजनांदगांव के डीआईजी रहे। इस दौरान नए जिलों के पुलिस सेटअप और वीआईपी कार्यक्रमों की सुरक्षा जैसी जिम्मेदारियां संभालीं। इसके बाद चुनाव आयोग ने उन्हें दुर्ग जिले का एसएसपी बनाकर भेजा।
दुर्ग छत्तीसगढ़ का बेहद संवेदनशील और वीआईपी जिला माना जाता है। यहां विधानसभा चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक कानून-व्यवस्था और राजनीतिक कार्यक्रमों की सुरक्षा बड़ी चुनौती होती है।
एसएसपी रहते हुए अपराध नियंत्रण और तकनीक के इस्तेमाल पर विशेष जोर दिया गया। 13 चोरी के मामलों का खुलासा कर करीब 60 लाख रुपए के चोरी के जेवर बरामद किए गए।
नशे के खिलाफ अभियान में करीब डेढ़ करोड़ रुपए कीमत की नशीली गोलियां बरामद की गईं। इन गोलियों के स्रोत तक पहुंचने के लिए राजस्थान की फैक्ट्री तक पुलिस टीम भेजी गई और वहां करीब 25 दिन तक ऑपरेशन चलाया गया।
16 हजार कैमरों को एक प्लेटफॉर्म से जोड़ने का प्रयोग
रामगोपाल गर्ग की कार्यशैली में तकनीक का इस्तेमाल एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। दुर्ग में उनके कार्यकाल के दौरान त्रिनेत्र एप की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य पुलिस को शहर और प्रमुख इलाकों में लगे सीसीटीवी कैमरों की लोकेशन एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराना था।
करीब 16 हजार कैमरों को लोकेशन के साथ जोड़ने की व्यवस्था का मकसद यह था कि किसी घटना के बाद पुलिस को आसपास कैमरे तलाशने में घंटों न लगें। एप के जरिए पुलिस यह पता लगा सके कि घटनास्थल या अपराधी के संभावित रूट पर कौन-कौन से कैमरे मौजूद हैं।
मार्च 2024 में इसे पूरे प्रदेश में लागू करने के निर्देश दिए गए। साइबर फ्रॉड के मामलों में भी उन्होंने तकनीकी कंपनियों के साथ सख्ती से काम करने की कोशिश की।
संदिग्ध और फ्रॉड में इस्तेमाल होने वाले नंबरों को लेकर गूगल को नोटिस भेजे गए और संदिग्ध नंबरों पर कार्रवाई की मांग की गई। इसके बाद नंबरों की पहचान और वेरिफिकेशन से जुड़े सिस्टम में बदलाव की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
संघर्ष से सिस्टम सुधार तक
रामगोपाल गर्ग की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि इसकी शुरुआत भटिंडा की एक साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से होती है। पिता की छोटी दुकान, पढ़ाई के लिए कर्ज, इंजीनियरिंग, मोटोरोला की नौकरी और फिर यूपीएससी की तैयारी।
दो बार असफल होने के बाद तीसरे प्रयास में आईपीएस बनना उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि थी, लेकिन उसके बाद का करियर भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं रहा।
यही वजह है कि रामगोपाल गर्ग की पहचान केवल एक आईपीएस अधिकारी के तौर पर नहीं, बल्कि पुलिसिंग में तकनीक और आधुनिक जांच पद्धतियों के इस्तेमाल पर जोर देने वाले अधिकारी के रूप में भी बनी है।
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