छत्तीसगढ़ की करेंगुट्टा पहाड़ी बना देश का सबसे बड़ा IED डेथ ट्रैप
NEWS IN SHORT
- करेंगुट्टा पहाड़ी पर 1500 से अधिक घातक आईईडी का जाल।
- हर 30 मीटर की दूरी पर बिछी है बारूदी सुरंग।
- सरेंडर नक्सली बारसा देवा ने किया खौफनाक साजिश का खुलासा।
- सुरक्षा बल डी-माइनिंग के लिए मानसून का कर रहे इंतजार।
- 5.5 करोड़ से निर्मित सड़क बनी बस्तर की कश्मीर घाटी।
NEWS IN DETAIL
बस्तर के जंगलों में बंदूकों की गूंज भले ही पहले से मद्धम पड़ गई हो, लेकिन जमीन के नीचे दबा लाल आतंक आज भी सुरक्षाबलों और निर्दोष ग्रामीणों के लिए काल बनकर बैठा है। छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की सरहद पर स्थित करेंगुट्टा पहाड़ी, जो कभी माओवादियों का अभेद्य किला हुआ करती थी, आज बारूदी सुरंगों के एक खौफनाक जाल में तब्दील हो चुकी है। हाल ही में तेलंगाना में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली मिलिट्री दलम हेड बारसा देवा के खुलासे ने सुरक्षा एजेंसियों के होश उड़ा दिए हैं।
हर 30 मीटर पर मौत का इंतजाम
सरेंडर नक्सली देवा के मुताबिक, इस दुर्गम पहाड़ी के करीब 50 किलोमीटर के दायरे में नक्सलियों ने 1500 से ज्यादा आईईडी (Improvised Explosive Device) प्लांट किए थे। गणना के हिसाब से देखें तो औसतन हर 30 मीटर की दूरी पर एक बम बिछाया गया है। यह इलाका किसी समय नक्सलियों का वार जोन और सबसे सुरक्षित ट्रेनिंग बेस था, जहां घने जंगल और प्राकृतिक गुफाएं उन्हें सुरक्षा प्रदान करती थीं। आज यह पूरा क्षेत्र देश के सबसे बड़े आईईडी जाल के रूप में पहचाना जा रहा है।
क्या है आईईडी और क्यों है यह इतना घातक
आईईडी यानी इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस एक देसी बम है, जिसे नक्सली खाद, जिलेटिन रॉड्स और बिजली के सामान्य तारों से तैयार करते हैं। इसकी मारक क्षमता और तकनीक इसे बेहद खतरनाक बनाती है। इस पर पैर पड़ते ही जोरदार धमाका होता है।
यह पैर हटाने या तार खींचने पर सक्रिय होता है। इसे किसी भी डिब्बे, पाइप या गड्ढे में छिपाया जा सकता है, जिससे मेटल डिटेक्टरों को चकमा देना आसान हो जाता है।
ऑपरेशन डी-माइन: बारिश का इंतजार
बस्तर आईजी पी. सुंदरराज के नेतृत्व में सुरक्षा बल इस पहाड़ी को विस्फोटक मुक्त करने के मिशन में जुटे हैं। हालांकि, यह काम किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। सुरक्षा एजेंसियां अब मानसून का इंतजार कर रही हैं, क्योंकि बारिश इस अदृश्य खतरे के खिलाफ एक हथियार साबित होगी।
1. मिट्टी की नरमी: बारिश के कारण जमीन नरम हो जाती है, जिससे विस्फोटक की गंध ऊपर आती है और खोजी कुत्तों (के-9 यूनिट) के लिए उसे ढूंढना आसान हो जाता है।
2. ब्लास्ट इंटेंसिटी: नमी के कारण बारूद की तीव्रता में थोड़ी कमी आती है, जो जवानों के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है।
बस्तर की कश्मीर घाटी की ओर बढ़ते कदम
खतरे के बावजूद सरकार इस क्षेत्र को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए दृढ़ संकल्पित है। गलगम से करेंगुट्टा तक 4-5 किमी लंबी पक्की सड़क का निर्माण 5.5 करोड़ रुपए की लागत से किया जा रहा है। पहाड़ियों के बीच घुमावदार रास्तों और बेमिसाल प्राकृतिक सुंदरता के कारण अब लोग इसे बस्तर की कश्मीर घाटी कहने लगे हैं।
चुनौती बड़ी है—एक तरफ विकास की पक्की सड़क है और दूसरी तरफ जमीन के नीचे दबा 1500 बमों का जखीरा। सुरक्षाबलों का लक्ष्य अब इस सुंदर घाटी को बारूद के बोझ से मुक्त कर पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए सुरक्षित बनाना है।
FAQ
1. करेंगुट्टा पहाड़ी में कितने बम बिछाए गए हैं?
आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली के अनुसार, यहाँ लगभग 50 किमी के दायरे में 1500 से ज्यादा आईईडी लगाए गए हैं, यानी हर 30 मीटर पर एक बम।
2. सुरक्षा बल बारिश का इंतजार क्यों कर रहे हैं?
बारिश में मिट्टी नरम होने से खोजी कुत्तों को विस्फोटकों की गंध आसानी से आती है और नमी की वजह से ब्लास्ट का असर भी कम हो जाता है।
3. बस्तर की कश्मीर घाटी कहाँ बन रही है?
गलगम से करेंगुट्टा तक 5.5 करोड़ की लागत से बन रही खूबसूरत घुमावदार सड़क और प्राकृतिक दृश्यों के कारण इसे 'बस्तर की कश्मीर घाटी' कहा जा रहा है।
4. आईईडी (IED) क्या होता है?
यह एक देसी बम है जिसे नक्सली खाद और जिलेटिन से तैयार करते हैं। यह पैर पड़ते ही या तार खींचने पर सक्रिय हो जाता है, जो बेहद जानलेवा है।
निष्कर्ष
नक्सलियों का गढ़ रही करेंगुट्टा पहाड़ी अब एक अदृश्य मौत के मैदान में बदल चुकी है। हालांकि विकास की नई सड़कें और सुरक्षाबलों की सक्रियता इस क्षेत्र की तस्वीर बदल रही है, लेकिन जमीन के नीचे दबे 1500 बमों को हटाना एक बड़ी चुनौती है ताकि 'बस्तर की कश्मीर घाटी' पूरी तरह सुरक्षित हो सके।
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