छत्तीसगढ़ के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में इलाज और पढ़ाई दोनों वेंटिलेटर पर
समझें क्या है पूरा मामला
रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की कमी लगातार बढ़ती जा रही है। पिछले छह वर्षों में 550 से अधिक डॉक्टरों ने नौकरी छोड़ दी है। इनमें नियमित और संविदा दोनों श्रेणी के चिकित्सक शामिल हैं। इस स्थिति से मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं दोनों पर दबाव बढ़ गया है।
डॉक्टरों के इस्तीफे का सीधा असर एमबीबीएस छात्रों की पढ़ाई, क्लीनिकल ट्रेनिंग और अस्पताल सेवाओं पर पड़ रहा है। कई कॉलेजों में विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी से विभागों का संचालन प्रभावित हो रहा है।
नौकरी छोड़ने के प्रमुख कारण
डॉक्टरों के नौकरी छोड़ने के पीछे कई प्रशासनिक और संरचनात्मक कारण सामने आए हैं। सबसे प्रमुख कारणों में कम वेतन, समय पर प्रमोशन नहीं मिलना और ट्रांसफर को लेकर अनिश्चितता शामिल है।
कई डॉक्टरों का कहना है कि उन्हें पदोन्नति की प्रक्रिया में लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। वहीं ट्रांसफर नीति को लेकर स्थिरता नहीं होने से भी असंतोष बढ़ता है। इसके अलावा निजी और अन्य राज्यों में बेहतर अवसर भी एक कारण बन रहे हैं।
स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों के अनुसार, लगातार अस्थिर सेवा वातावरण से सरकारी मेडिकल कॉलेजों में स्थायी फैकल्टी बनाए रखना चुनौती बन गया है।
सीटें बढ़ीं, लेकिन फैकल्टी नहीं
राज्य के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस सीटों की संख्या पिछले वर्षों में लगातार बढ़ाई गई है। लेकिन इसके अनुपात में फैकल्टी स्ट्रक्चर में सुधार नहीं हुआ है। उदाहरण के तौर पर, 2019 में रायपुर मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस सीटें 180 की गईं और 2023 में यह बढ़कर 230 हो गईं। हालांकि वर्तमान फैकल्टी सेटअप अब भी लगभग 150 सीटों के हिसाब से ही स्वीकृत है।
इस असंतुलन के कारण कॉलेज प्रशासन पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है। प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर की संख्या जरूरत के अनुसार नहीं बढ़ाई जा सकी है।
कई पद खाली, व्यवस्था पर दबाव
सरकारी मेडिकल कॉलेजों में स्वीकृत पदों के मुकाबले बड़ी संख्या में पद खाली हैं। प्रोफेसर के 241 पदों में 117 पद रिक्त हैं। एसोसिएट प्रोफेसर के 399 पदों में 196 पद खाली हैं। असिस्टेंट प्रोफेसर के 644 पदों में 332 पदों पर नियुक्ति नहीं हुई है। वहीं सीनियर रेजिडेंट के 518 पदों में 375 पद खाली हैं।
इन रिक्तियों के कारण न केवल पढ़ाई प्रभावित हो रही है बल्कि अस्पतालों में मरीजों के इलाज की व्यवस्था पर भी असर पड़ रहा है। कई विभागों में एक ही फैकल्टी पर अतिरिक्त जिम्मेदारी आ रही है।
भर्ती और प्रशासनिक चुनौतियां
राज्य में हाल ही में छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (PSC) के माध्यम से भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई है। 125 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया था, जिनमें से लगभग 60 डॉक्टरों का चयन हुआ है। लेकिन चयनित डॉक्टरों को अभी तक पोस्टिंग आदेश नहीं मिले हैं।
इसके अलावा 2022 के बाद भर्ती प्रक्रिया में गति आई है, लेकिन जमीनी स्तर पर नियुक्तियों में देरी बनी हुई है। इससे नए डॉक्टरों की उपलब्धता प्रभावित हो रही है।
प्रोमोशन और ट्रांसफर से जुड़ी स्थिति
प्रदेश के 10 मेडिकल कॉलेजों में हाल ही में एसोसिएट प्रोफेसरों को प्रोफेसर पद पर पदोन्नत किया गया था। इसके कुछ ही समय बाद रायपुर मेडिकल कॉलेज से 18 डॉक्टरों का ट्रांसफर कर दिया गया।
इसके अलावा करीब 80 असिस्टेंट प्रोफेसर अभी प्रोबेशन पीरियड में हैं और कई कॉलेजों में प्रभारी व्यवस्था के तहत संचालन हो रहा है। चार मेडिकल कॉलेज फिलहाल प्रभारी डीन के भरोसे चल रहे हैं। इस तरह की प्रशासनिक अस्थिरता भी डॉक्टरों में असंतोष का कारण बन रही है।
नए मेडिकल कॉलेजों की चुनौती
राज्य में इस वर्ष छह नए मेडिकल कॉलेज शुरू करने की योजना है। लेकिन इनमें भी नियमित डीन और पर्याप्त फैकल्टी की नियुक्ति एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। विभागीय स्तर पर भर्ती प्रक्रिया जारी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक स्थायी संरचना मजबूत नहीं होगी, तब तक नए कॉलेजों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
पड़ोसी राज्यों से तुलना
डॉक्टरों के अनुसार, पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में स्वशासी समिति के माध्यम से भर्ती और प्रबंधन व्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक लचीली है। वहां समय पर प्रमोशन और वेतन वृद्धि जैसी सुविधाएं मिलती हैं। इसके कारण कुछ डॉक्टर मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह भी छत्तीसगढ़ से हो रहे पलायन का एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है।
विभाग का पक्ष
चिकित्सा शिक्षा विभाग का कहना है कि फैकल्टी की कमी को दूर करने के लिए लगातार भर्ती प्रक्रिया चल रही है। विभाग के अनुसार, नए मेडिकल कॉलेजों के लिए भी आवश्यक पदों की स्वीकृति और नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। विभागीय अधिकारियों का यह भी कहना है कि कई डॉक्टरों को अन्य बेहतर अवसर मिलने पर वे नौकरी छोड़ रहे हैं, जिससे अस्थायी रूप से यह स्थिति बनी है।
IMP FACTS
पिछले 6 वर्षों में छत्तीसगढ़ के सरकारी मेडिकल कॉलेजों से 550 से ज्यादा डॉक्टर नौकरी छोड़ चुके हैं।
छोड़ने वालों में नियमित और संविदा दोनों प्रकार के डॉक्टर शामिल हैं।
प्रमुख कारण: कम वेतन, प्रमोशन में देरी और ट्रांसफर की अनिश्चितता।
राज्य में एमबीबीएस सीटें बढ़ी हैं, लेकिन फैकल्टी सेटअप उसी अनुपात में नहीं बढ़ा।
प्रोफेसर के 241 पदों में 117 खाली हैं।
एसोसिएट प्रोफेसर के 399 में 196 पद रिक्त हैं।
असिस्टेंट प्रोफेसर के 644 में 332 पद खाली हैं।
सीनियर रेजिडेंट के 518 में 375 पद खाली हैं।
कई मेडिकल कॉलेज प्रभारी डीन के भरोसे चल रहे हैं।
हालिया भर्ती में 125 पदों के लिए विज्ञापन, करीब 60 चयनित हुए।
चयनित डॉक्टरों को अभी तक पोस्टिंग आदेश नहीं मिले हैं।
नए मेडिकल कॉलेजों की योजना है, लेकिन फैकल्टी की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ के मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों का बढ़ता इस्तीफा एक संरचनात्मक समस्या की ओर संकेत करता है। सीटों के विस्तार के साथ यदि फैकल्टी और सेवा शर्तों में सुधार नहीं किया गया, तो मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और स्वास्थ्य सेवाओं पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।
FAQ
- छत्तीसगढ़ के मेडिकल कॉलेजों से डॉक्टर क्यों नौकरी छोड़ रहे हैं?
डॉक्टर कम वेतन, समय पर प्रमोशन न मिलने और ट्रांसफर की अनिश्चित नीति के कारण नौकरी छोड़ रहे हैं। - कितने डॉक्टर पिछले 6 साल में नौकरी छोड़ चुके हैं?
पिछले छह वर्षों में 550 से अधिक डॉक्टर सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सेवा छोड़ चुके हैं। - क्या इससे मेडिकल शिक्षा और मरीजों पर असर पड़ रहा है?
हां, फैकल्टी की कमी से एमबीबीएस छात्रों की पढ़ाई और अस्पतालों में इलाज दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
यह खबरें भी पढ़े...
5 मेडिकल कॉलेज रिजेक्ट, 250 एमबीबीएस सीटें गईं...जिम्मेदार कौन?
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अच्छी आय वाली पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता
छत्तीसगढ़ में बनेंगे तीन नए सरकारी मेडिकल कॉलेज, 1077 करोड़ रूपए की मंजूरी