मौत का राज खोलने वाले संस्थान में डॉक्टर नहीं, 84 लाख के बजट पर वित्त विभाग की रोक, दो लोगों के भरोसे जांच
छत्तीसगढ़ के इकलौते मेडिको लीगल संस्थान में जरूरी विशेषज्ञ डॉक्टर ही नहीं हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि पिछले 25 साल से नियमित भर्ती नहीं हुई है। खाली पद भरने का प्रस्ताव भी सरकारी फाइलों में अटका हुआ है।
भर्ती के लिए करीब 84 लाख रुपए सालाना अतिरिक्त खर्च का प्रस्ताव भेजा गया था। लेकिन वित्त विभाग ने इस पर आपत्ति जता दी। इसके बाद भर्ती की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। अब सवाल उठ रहा है कि जब जांच करने के लिए पर्याप्त विशेषज्ञ ही नहीं होंगे, तो गंभीर मामलों में मौत की असली वजह कैसे सामने आएगी?
समझें क्या है पूरा मामला
- संस्थान में स्वीकृत पदों के मुकाबले कर्मचारियों की भारी कमी है।
- भर्ती के लिए करीब 84 लाख रुपए सालाना अतिरिक्त खर्च का प्रस्ताव था।
- वित्त विभाग की असहमति से भर्ती की राह अटकी है।
- संस्थान का सालाना बजट करीब दो करोड़ रुपए बताया जा रहा है।
- भर्ती और खर्च पर अब तक अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
मेडिको लीगल संस्थान छत्तीसगढ़ में कितने पद स्वीकृत?
राज्य गठन के बाद मध्यप्रदेश से पांच कर्मचारियों की टीम छत्तीसगढ़ आई थी। इसमें तीन मेडिकल ऑफिसर और दो लिपिक थे। समय के साथ सभी सेवानिवृत्त हो गए।
इसके बाद संस्थान के लिए 25 नए पद स्वीकृत किए गए। प्रस्तावित व्यवस्था में 15 पद सीधी भर्ती से भरे जाने थे। बाकी 10 पद पदोन्नति से भरे जाने थे। 25 साल से भर्ती नहीं हुई, यानी नियमित भर्ती आज तक नहीं हो सकी।
अब संस्थान में कितने लोग बचे?
संस्थान की हालत लगातार बिगड़ती गई। पहले तीन अधिकारी-कर्मचारी बचे थे। जूनियर फॉरेंसिक स्पेशलिस्ट जून में सेवानिवृत्त हो गए। उनकी संविदा नियुक्ति बढ़ाई गई।
प्रयोगशाला सहायक का संविदा कार्यकाल खत्म हो गया। उनका मामला लंबित है। इस तरह संस्थान बेहद सीमित मानव संसाधन से चल रहा है।
गृह विभाग भर्ती प्रस्ताव पर क्या हुआ?
गृह विभाग ने खाली पद भरने का प्रस्ताव भेजा था। जानकारी के मुताबिक 15 पदों पर सीधी भर्ती मांगी गई थी। लेकिन वित्त विभाग की आपत्ति के कारण सभी पदों पर सहमति नहीं बनी।
कुछ पदों की मंजूरी जरूर मिली है। मेडिकल ऑफिसर के एक पद पर चयन छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (पीएससी) से होना है। नॉन-मेडिकल पद, कंप्यूटर ऑपरेटर और प्यून के पदों की स्वीकृति की जानकारी भी सामने आई है।
क्या ये मंजूरियां काफी हैं?
संस्थान के प्रभारी और गृह विभाग की प्रमुख सचिव के बीच कई बार चर्चा हुई। इसके बाद प्यून के एक पद की मंजूरी मिलने की बात कही गई।
लेकिन विशेषज्ञों की जरूरत के मुकाबले ये मंजूरियां नाकाफी नजर आती हैं। विशेषज्ञ डॉक्टर, तकनीकी कर्मचारी और प्रयोगशाला स्टाफ चाहिए। सीमित पदों से कामकाज सामान्य होने की उम्मीद मुश्किल है।
84 लाख रुपए के प्रस्ताव पर आपत्ति क्यों?
भर्ती के लिए अतिरिक्त बजट की जरूरत बताई गई है। वित्त विभाग की वित्त विभाग की आपत्ति ने प्रस्ताव को रोक दिया। यहां सबसे बड़ा सवाल सिर्फ खर्च का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जिससे हत्या, संदिग्ध मौत और गंभीर मामलों में अहम मेडिकल साक्ष्य जुटाए जाते हैं।
मौत की जांच में पोस्टमार्टम और मेडिकल साक्ष्य की भूमिका अहम मानी जाती है। संस्थान में विशेषज्ञ कम हों, तो दबाव बढ़ना तय है।
क्या हर मामले की जांच रुक जाएगी?
यह कहना उपलब्ध जानकारी से साबित नहीं होता। लेकिन जांच की गति और सुविधाओं पर असर पड़ सकता है।
डायरेक्टर के लिए गाड़ी तक नहीं, क्या बोले डॉ. विकास ध्रुव?
संस्थान के प्रभारी संचालक डॉ. विकास ध्रुव का कहना है कि मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ में सेटअप की तैयारी हुई। लेकिन इसे किनारे कर दिया गया। उनके मुताबिक संस्थान लगातार उपेक्षा झेल रहा है।
अधिकारी-कर्मचारी रिटायर होते गए। लेकिन नई भर्तियां नहीं हुईं।
डॉ. ध्रुव के मुताबिक गृह विभाग की अहम शाखा होने पर भी संस्थान की अपनी बिल्डिंग नहीं है। साधन-संसाधन भी नहीं हैं। डायरेक्टर के लिए एक गाड़ी तक नहीं है। उनके मुताबिक काम केवल आश्वासन पर चल रहा है।
अब सरकार से क्या सवाल हैं?
राज्य के इकलौते मेडिको लीगल संस्थान में जरूरी पद कब भरे जाएंगे? 25 साल में भर्ती क्यों नहीं हुई? विशेषज्ञ डॉक्टरों के बिना बेहतर नतीजों की उम्मीद कैसे की जाए? बजट की आपत्ति के बीच उन मामलों का क्या होगा, जिनमें मौत का असली कारण परिवारों को न्याय दिलाने के लिए जरूरी है?
अब देखना यह है कि सरकार क्या करेगी। वह भर्ती और बजट पर फैसला लेकर संस्थान को काम करने लायक बनाएगी या मामला फाइलों में उलझा रहेगा।