संघ में सेवा का महत्व, राजनीति में पद की अपेक्षा न रखें, RSS प्रमुख मोहन भागवत की नसीहत

Arun Tiwari | Oct 23, 2026, 16:03 IST
छत्तीसगढ़ में मोहन भागवत बोले, सेवा से बनाएं पहचान
रायपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने स्वयंसेवकों को संगठन के मूल उद्देश्यों, सेवा भावना और राजनीतिक अपेक्षाओं को लेकर स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि संघ से जुड़ने का अर्थ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में राजनीतिक अवसर या चुनाव में टिकट मिलने की अपेक्षा रखना नहीं है।

स्वयंसेवकों की पहचान उनके कार्य, सेवा, व्यवहार और कर्तव्यनिष्ठा से बननी चाहिए। समाज में अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए व्यक्ति को अपने आचरण से उदाहरण पेश करना होगा।



दो दिवसीय प्रवास पर बिलासपुर पहुंचे डॉ. भागवत ने सरस्वती शिशु मंदिर परिसर में आयोजित कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने संघ के शताब्दी वर्ष में किए गए कार्यों, संगठन के विस्तार और स्वयंसेवकों की भूमिका पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया। उनके संदेश का मुख्य जोर इस बात पर रहा कि संघ का स्वयंसेवक होना केवल संगठनात्मक गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के बीच विश्वसनीयता और आत्मीयता स्थापित करना भी उसकी जिम्मेदारी है।



राजनीतिक पद नहीं, सेवा से बनाएं पहचान

डॉ. भागवत ने स्वयंसेवकों को समझाया कि संघ की प्रतिष्ठा उसके कार्यकर्ताओं के आचरण और सेवा भावना से बनती है। इसलिए स्वयंसेवकों को समाज में अपनी पहचान किसी राजनीतिक पद या चुनावी लाभ के आधार पर बनाने के बजाय अपने कार्यों के दम पर स्थापित करनी चाहिए।



उन्होंने कहा कि स्वयंसेवकों का दायित्व केवल संगठन से जुड़े रहना नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच विश्वास और आत्मीयता का वातावरण तैयार करना भी है। व्यक्ति का व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि लोग उसके कार्यों से प्रभावित होकर स्वयं उससे जुड़ने के लिए प्रेरित हों।



उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि स्वयंसेवकों को समाज से जुड़ने का सरल लेकिन प्रभावी तरीका अपनाना चाहिए। किसी अपरिचित व्यक्ति को मित्र बनाना, उसके सुख-दुख में सहभागी होना और सामाजिक गतिविधियों में सहयोग देना संगठन के विस्तार का महत्वपूर्ण माध्यम है।



भाजपा और संघ के कार्यक्षेत्र अलग-अलग

भाजपा और संघ के संबंधों पर चर्चा करते हुए डॉ. भागवत ने दोनों के कार्यक्षेत्रों में अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि भाजपा एक राजनीतिक पार्टी है और वह अपने राजनीतिक उद्देश्यों के अनुसार काम करती है। दूसरी ओर, संघ का उद्देश्य समाज में संगठन, संस्कार और सेवा की भावना विकसित करना है।



उन्होंने कहा कि संघ से जुड़े अनेक लोग भाजपा में सक्रिय हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि संघ से जुड़ने का उद्देश्य राजनीतिक अवसर प्राप्त करना हो। स्वयंसेवक की वास्तविक पहचान उसके व्यवहार, समाज के प्रति समर्पण और कर्तव्य के प्रति निष्ठा से होती है।



डॉ. भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि समाज में स्वयंसेवक की पहचान उसके काम से बननी चाहिए। यदि स्वयंसेवक अपने आचरण में सेवा, अनुशासन और समर्पण को अपनाते हैं, तो इससे संघ की छवि भी मजबूत होती है। राजनीतिक लाभ की अपेक्षा से संगठन से जुड़ना उसके मूल उद्देश्यों के अनुरूप नहीं है।



समाज में विश्वास और आत्मीयता स्थापित करना जरूरी

सरसंघचालक ने स्वयंसेवकों को समाज के बीच सक्रिय रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि संगठन की मजबूती केवल संख्या बढ़ाने से नहीं आती, बल्कि लोगों के बीच विश्वास और आत्मीयता स्थापित करने से आती है।



उनके मुताबिक, स्वयंसेवकों को समाज के विभिन्न वर्गों के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखना चाहिए। सामाजिक समस्याओं को समझना, जरूरतमंदों की सहायता करना और लोगों के साथ व्यक्तिगत संबंध विकसित करना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।



उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को स्वयंसेवक के रूप में जोड़ने की प्रक्रिया केवल संगठन का विस्तार नहीं है। इससे समाज में आपसी संपर्क, सहयोग और संगठन के प्रति स्वीकार्यता भी बढ़ती है। स्वयंसेवक अपने व्यवहार के जरिए लोगों को प्रेरित करें, ताकि संघ के प्रति विश्वास स्वाभाविक रूप से विकसित हो सके।



छत्तीसगढ़ में RSS की शाखाओं के विस्तार पर चर्चा

बैठक में छत्तीसगढ़ में संघ के संगठनात्मक विस्तार पर भी चर्चा हुई। डॉ. भागवत ने बताया कि प्रदेश में पहले लगभग 3,800 शाखाएं थीं, जबकि अब करीब 2,400 अतिरिक्त स्थानों पर शाखाएं जुड़ी हैं। उन्होंने अधिक से अधिक स्थानों तक शाखाओं की स्थापना को संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया।



संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान चल रही गतिविधियों की समीक्षा भी की गई। इसमें सामाजिक दायित्वों, राष्ट्र निर्माण और स्वयंसेवकों की भूमिका पर चर्चा हुई।



संगठन विस्तार के साथ सामाजिक दायित्व पर जोर

डॉ. भागवत का संदेश ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब संघ अपने शताब्दी वर्ष के दौरान संगठनात्मक गतिविधियों और सामाजिक संपर्क को व्यापक बनाने पर जोर दे रहा है। उनके संबोधन में स्वयंसेवकों के लिए स्पष्ट दिशा दिखाई दी कि संगठन का विस्तार केवल शाखाओं और सदस्यों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।



स्वयंसेवकों को समाज के बीच अपनी विश्वसनीयता मजबूत करनी होगी। इसके लिए सेवा, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और व्यवहार में आदर्श प्रस्तुत करना आवश्यक है। राजनीतिक पद या चुनावी टिकट की अपेक्षा के बजाय समाज के प्रति समर्पण को प्राथमिकता देने का संदेश संघ की कार्यशैली और स्वयंसेवकों की जिम्मेदारियों को रेखांकित करता है।



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