मध्यप्रदेश की जमीन का केस छत्तीसगढ़ में क्यों चलेगा? हाई कोर्ट ने CPC धारा 17 के तहत दिया फैसला

Umeshwari Baghel | Oct 01, 2026, 16:33 IST
दो राज्यों में फैली संपत्ति का विवाद अब एक ही कोर्ट में
मध्यप्रदेश के शहडोल जिले की जमीन से जुड़े विवाद में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि अगर एक ही विवाद से जुड़ी जमीन अलग-अलग राज्यों या अदालतों की सीमा में आती है तो मुकदमा उस अदालत में भी चल सकता है जहां संबंधित संपत्तियों में से कोई एक स्थित हो।

इस आधार पर हाई कोर्ट ने जनकपुर की सिविल अदालत के आदेश को सही माना है। साथ ही शहडोलनिवासी बृजेंद्रनाथ कुशवाहा समेत छह लोगों की याचिका खारिज कर दी गई।मामला मध्यप्रदेश के शहडोल जिले के दरैन गांव की जमीन से जुड़ा है। इसी विवाद में छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के घटई और खरिका टोला गांवों की जमीन भी शामिल है। विवाद में जमीन पर अधिकार तय करने के साथ बंटवारे की मांग की गई है। साथ ही जमीन को लेकर स्थायी रोक लगाने की मांग भी अदालत के सामने रखी गई है।



जनकपुर कोर्ट पहुंचा जमीन विवाद

पूरा विवाद तब अदालत पहुंचा जब बिरेंद्र कुमार ने जनकपुर सिविल कोर्ट में मामला दायर किया। उन्होंने दरैन गांव के साथ घटई और खरिका टोला की जमीन को लेकर दावा पेश किया। उनकी मांग थी कि अदालत जमीन पर अधिकार तय करे। संपत्ति का बंटवारा किया जाए और विवादित जमीन को लेकर स्थायी निषेधाज्ञा भी जारी हो।



इस केस की खास बात जमीनों की अलग-अलग जगह है। दरैन गांव शहडोल जिले में आता है। यह मध्य प्रदेश का हिस्सा है। दूसरी तरफ घटई और खरिका टोला गांव छत्तीसगढ़ में आते हैं। ये दोनों गांव मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले की सीमा में स्थित हैं।




इसी कारण सवाल उठा कि पूरा मामला किस अदालत में सुना जाएगा। क्या मध्य प्रदेश की जमीन को लेकर छत्तीसगढ़ की अदालत फैसला कर सकती है। इसी मुद्दे पर विवाद हाई कोर्ट तक पहुंचा।



याचिकाकर्ताओं ने उठाया सवाल

मामले में बृजेंद्रनाथ कुशवाहा सहित छह याचिकाकर्ताओं ने जनकपुर सिविल कोर्ट की सुनवाई पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि दरैन गांव की जमीन मध्य प्रदेश में है। इसलिए छत्तीसगढ़ की अदालत को उस जमीन से जुड़े विवाद की सुनवाई का अधिकार नहीं होना चाहिए।



याचिकाकर्ताओं ने यह दावा भी किया कि दरैन की जमीन उनकी खुद की अर्जित संपत्ति है। उनका तर्क था कि इस जमीन को छत्तीसगढ़ में चल रहे मुकदमे का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।



इसी आधार पर उन्होंने सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 16 के तहत आवेदन दिया। इसमें अदालत के क्षेत्राधिकार पर सवाल उठाया गया। याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि मध्य प्रदेश स्थित जमीन का विवाद छत्तीसगढ़ की अदालत में नहीं सुना जाए।



जनकपुर कोर्ट ने आवेदन खारिज किया

जनकपुर की सिविल अदालत ने याचिकाकर्ताओं की दलील स्वीकार नहीं की। अदालत ने 10 अगस्त 2026 को उनका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।



हाई कोर्ट में मुख्य सवाल यही था कि अलग-अलग अदालतों की सीमा में स्थित जमीनों से जुड़े एक ही विवाद को किस अदालत में सुना जा सकता है। हाई कोर्ट ने मामले में सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 17 को महत्वपूर्ण माना।




हाई कोर्ट ने क्या कहा

जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों के लिए कानून में व्यवस्था मौजूद है। यदि एक ही विवाद से जुड़ी अचल संपत्तियां अलग-अलग अदालतों की सीमा में आती हैं तो मुकदमा किसी एक संबंधित अदालत में दायर किया जा सकता है।



इसके लिए जरूरी है कि विवादित संपत्तियों में से कम से कम एक संपत्ति उस अदालत की सीमा में हो। इस स्थिति में वही अदालत पूरे विवाद पर सुनवाई कर सकती है।



हाई कोर्ट ने माना कि घटई और खरिका टोला की जमीन जनकपुर अदालत के क्षेत्र में आती है। ये जमीनें उसी विवाद का हिस्सा हैं जिसमें दरैन गांव की जमीन भी शामिल है। इसलिए जनकपुर की अदालत पूरे मामले की सुनवाई कर सकती है।



धारा 17 बनी फैसले का आधार

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 17 का उल्लेख किया। इस प्रावधान के अनुसार अगर अचल संपत्ति से जुड़ा एक विवाद अलग-अलग अदालतों के अधिकार क्षेत्र में फैला हो तो मुकदमा उस अदालत में दाखिल किया जा सकता है जहां संबंधित संपत्ति का कोई हिस्सा मौजूद हो।



इस नियम का उद्देश्य एक ही विवाद को अलग-अलग अदालतों में बांटने से बचाना है। इससे एक ही मामले को लेकर कई अलग मुकदमे चलने की स्थिति भी कम होती है।



हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शिवनारायण बनाम मणिकलाल मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी तरह के मामले में स्पष्ट किया था कि अलग-अलग क्षेत्रों में मौजूद संपत्तियों से जुड़े एक ही विवाद की सुनवाई किसी एक सक्षम अदालत में हो सकती है।



छत्तीसगढ़ में जारी रहेगी सुनवाई

हाई कोर्ट ने माना कि जनकपुर की अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कोई आदेश नहीं दिया है। घटई और खरिका टोला की जमीन जनकपुर अदालत की सीमा में आती है। इसलिए उस अदालत को पूरे जमीन विवाद की सुनवाई का अधिकार है।



इसी आधार पर हाई कोर्ट ने छह याचिकाकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी। अब दरैन गांव की मध्य प्रदेश स्थित जमीन से जुड़ा विवाद भी जनकपुर की सिविल अदालत में चल रहे मूल मामले के साथ सुना जा सकेगा।



यह फैसला उन जमीन विवादों के लिए भी महत्वपूर्ण है जिनमें एक ही संपत्ति विवाद की जमीन अलग-अलग जिलों या राज्यों में फैली होती है। ऐसे मामलों में केवल राज्य की सीमा देखकर अदालत का अधिकार तय नहीं होगा। अदालत यह भी देखेगी कि पूरा विवाद आपस में जुड़ा है या नहीं और विवादित संपत्तियों में से कोई हिस्सा उसके क्षेत्र में मौजूद है या नहीं।



FAQ - अक्सर पूछे जानें वाले सवाल

  1. किस मामले में हाई कोर्ट ने जनकपुर की सिविल अदालत के आदेश को सही माना?
    हाई कोर्ट ने मध्यप्रदेश के शहडोल जिले के दरैन गांव की जमीन से जुड़े विवाद में जनकपुर की सिविल अदालत के आदेश को सही माना और याचिकाकर्ता बृजेंद्रनाथ कुशवाहा सहित छह लोगों की याचिका खारिज कर दी।
  2. जनकपुर कोर्ट मामले में क्या सुनवाई की गई थी?
    जनकपुर कोर्ट में सुनवाई की गई थी जिसमें बिरेंद्र कुमार ने दरैन गांव के साथ घटई और खरिका टोला की जमीन पर अधिकार तय करने, संपत्ति के बंटवारे और विवादित जमीन पर स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की थी।
  3. हाई कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता की किस धारा का उल्लेख किया है?
    हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 17 का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि यदि अचल संपत्तियों का विवाद अलग-अलग अदालतों में फैला हो, तो वह मुकदमा उस अदालत में दाखिल किया जा सकता है जहां संबंधित संपत्ति का कोई हिस्सा मौजूद हो।
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