Maa Bamleshwari Temple : मां बम्लेश्वरी का नाम कैसे पड़ा? जानिए डोंगरगढ़ मंदिर से जुड़ी चार रहस्यमयी कहानियां
पुराने ऐतिहासिक दस्तावेजों में मंदिर से जुड़े कुछ दिलचस्प उल्लेख मिलते हैं। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले का डोंगरगढ़ धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां पहाड़ी पर विराजित मां बम्लेश्वरी के दर्शन के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं। नवरात्रि के दौरान यहां विशेष धार्मिक माहौल रहता है। दूर-दूर से भक्त माता के दर्शन करने आते हैं।
मां बम्लेश्वरी का नाम कैसे पड़ा और मंदिर की स्थापना किसने कराई? इन सवालों को लेकर कई कहानियां सुनाई जाती हैं। कुछ कथाएं राजाओं और प्रेमियों से जुड़ी हैं। वहीं कुछ में आदिवासी समाज की धार्मिक परंपराओं का उल्लेख मिलता है। इन मान्यताओं के साथ पुराने दस्तावेज भी मंदिर के अतीत की जानकारी देते हैं।
राजा विक्रमादित्य से जुड़ी है पहली कहानी
मां बम्लेश्वरी मंदिर की एक प्रसिद्ध कहानी माधवानल और कामकंदला की प्रेमकथा है। लोकमान्यता के अनुसार कामाख्या नगरी पर राजा कामसेन का शासन था। उनके राज्य में कामकंदला नाम की एक प्रसिद्ध राजनर्तकी रहती थी। माधवानल संगीत कला में निपुण था।
दोनों के बीच प्रेम संबंध बन गए। दूसरी ओर राजा कामसेन का पुत्र मदनादित्य भी कामकंदला से प्रेम करता था। इस कारण दोनों प्रेमियों के सामने मुश्किलें खड़ी हो गईं। कथा के अनुसार माधवानल ने डोंगरगढ़ की पहाड़ियों में शरण ली। इसके बाद उज्जैन के राजा विक्रमादित्य उसकी सहायता के लिए आगे आए। उन्होंने कामाख्या नगरी पर आक्रमण किया।
प्रेमी युगल को जीवनदान मिलने की मान्यता
लोककथा के अनुसार युद्ध के दौरान कामकंदला को माधवानल की मृत्यु की सूचना मिली। दुखी होकर उसने पहाड़ी के नीचे स्थित तालाब में छलांग लगा दी। कामकंदला की मृत्यु का समाचार मिलने पर माधवानल ने भी प्राण त्याग दिए।
कहानी के एक रूप में राजा विक्रमादित्य देवी की आराधना करते हैं। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी प्रेमी युगल को जीवनदान देती हैं। इसके बाद विक्रमादित्य माता से डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर विराजने का अनुरोध करते हैं। मान्यता है कि देवी ने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया। हालांकि यह प्रसंग लोककथा का हिस्सा है। इसकी स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
गोंड समाज की बमलाई और समलाई की कहानी
मां बम्लेश्वरी की दूसरी कथा गोंड समुदाय की धार्मिक परंपराओं से जुड़ी है। इस मान्यता के अनुसार गिरोलागढ़ के गोंड राजा की दो जुड़वां बेटियां थीं। उनके नाम बमलाई और समलाई बताए जाते हैं।
दोनों बहनें भीमाल पोय से विवाह करना चाहती थीं। भीमाल पोय ने अपने गुरु को अविवाहित रहकर समाजसेवा करने का वचन दिया था। कथा के अनुसार उन्होंने दोनों बहनों के सामने एक शर्त रखी। जो सुबह मुर्गे की पहली बांग से पहले उनके पीछे पहुंच जाएगी, उससे विवाह करेंगे। इसके बाद भीमाल पोय डोंगरगढ़ की ओर निकल पड़े। दोनों बहनें भी उनके पीछे चल दीं।
बमलाई डोंगरगढ़ में रुकीं, समलाई कोराड़ी पहुंचीं
गोंड समुदाय की गाथा के मुताबिक भीमाल पोय डोंगरगढ़ पहुंचे। वहां उन्होंने गुफा में स्थापित बड़े देव के दर्शन किए। इसके बाद वह आगे निकल गए। बमलाई और समलाई भी डोंगरगढ़ पहुंच गईं। बमलाई ने बड़े देव के स्थान पर रुकने का निर्णय लिया। वहीं समलाई आगे बढ़ते हुए रास्ता भटक गईं।
कथा के अनुसार समलाई महाराष्ट्र के कोराड़ी क्षेत्र तक पहुंच गईं। उन्होंने वहीं रहकर लोगों की सेवा शुरू कर दी। इस परंपरा में उन्हें कोराड़ी दाई के रूप में पूजा जाता है। वहीं बमलाई ने डोंगरगढ़ में बड़े देव की सेवा की। गोंड समाज की मान्यता में उन्हें मरई गोत्र की कुलवधू माना जाता है। उनके निधन के बाद समाधि और प्रतिमा स्थापित किए जाने की कथा प्रचलित है।
राजा कमलनारायण को सपने में दिखा था मंदिर
मंदिर की तीसरी कहानी खैरागढ़ राजपरिवार से जुड़ी है। राजपरिवार के सदस्य भवानी बहादुर सिंह ने इसकी अलग जानकारी दी है। उनके अनुसार मां की मूल प्रतिमा पहाड़ी की एक गुफा में थी। राजा कमलनारायण को सपने में देवी ने अपना स्थान बताया था।
राजा जब वहां पहुंचे तो गुफा में तीन देवियों की प्रतिमाएं मिलीं। इस विवरण के मुताबिक देवी ने अपना नाम बमलाई बताया था। उस समय पहाड़ी तक पहुंचने का रास्ता बेहद कठिन था। स्थानीय बैगा-बैगीन द्वारा देवी की पूजा किए जाने का भी उल्लेख मिलता है।
901 सीढ़ियों और मूल प्रतिमा का रहस्य
भवानी बहादुर सिंह के मुताबिक राजा को क्षीरपानी की ओर जाने वाला रास्ता बताया गया। इस मार्ग से मंदिर पहुंचने के लिए 901 सीढ़ियों का उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार देवी की पुरानी प्रतिमा खंडित हो गई थी। इसके बाद राजा कमलनारायण नई प्रतिमा लेकर पहाड़ी पर पहुंचे।
नई प्रतिमा गुफा में स्थापित नहीं हो सकी। राजपरिवार की मान्यता के अनुसार देवी को गढ़माता के रूप में स्थापित किया गया। आगे चलकर यही देवी मां बम्लेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
प्रदीप मिश्रा ने शिव के डमरू से जोड़ा नाम
चौथी कहानी कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने अपने प्रवचन में सुनाई थी। अगस्त 2026 में भिलाई में उन्होंने देवी के नाम की आध्यात्मिक व्याख्या की। उनके मुताबिक भगवान शिव के डमरू से निकले 'बम' नाद का विशेष महत्व है। माता पार्वती ने इसी नाद के साथ भगवान शिव की आराधना की थी।
प्रवचन में पार्वती की तीन परीक्षाओं का उल्लेख किया गया। पहली परीक्षा में उन्होंने मगर से एक बच्चे को बचाने का प्रयास किया। दूसरी परीक्षा नीलकमल अर्पित करने के संकल्प से जुड़ी थी। तीसरी परीक्षा में उन्होंने आग से तोते के बच्चे की रक्षा की। इस कथा में 'बम' नाद को देवी के नाम से जोड़ा गया। यह धार्मिक व्याख्या है, कोई प्रमाणित ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं।
पुराने दस्तावेजों में क्या मिलता है?
डोंगरगढ़ के मंदिर का उल्लेख पुराने ऐतिहासिक दस्तावेजों में भी मिलता है। वर्ष 1884 में प्रकाशित अलेक्जेंडर कनिंघम की पुरातात्विक रिपोर्ट में इस क्षेत्र की जानकारी है। रिपोर्ट में डोंगरगढ़ के पास बगलामुखी देवी की पूजा का उल्लेख मिलता है। वहीं 1909 के सेंट्रल प्रोविंसेज गजेटियर में 'Bomlai temple' नाम दर्ज है।
गजेटियर में मंदिर के निर्माण से जुड़ी परंपरा राजा कामसेन से जोड़ी गई है। इन दस्तावेजों से मंदिर की पुरानी धार्मिक पहचान सामने आती है। हालांकि सभी लोककथाओं की ऐतिहासिक पुष्टि नहीं होती।
FAQ
- मां बम्लेश्वरी का नाम कैसे पड़ा और मंदिर की स्थापना किसने कराई?
मां बम्लेश्वरी का नाम स्थानीय किंवदंतियों से जुड़ा हुआ है, जिसमें राजा विक्रमादित्य की सहायता से प्रेमी युगल को जीवनदान देने के बाद देवी के पहाड़ी पर विराजने का प्रसंग शामिल है। - डोंगरगढ़ के मां बम्लेश्वरी मंदिर की पुरातात्विक जानकारी क्या है?
मंदिर का उल्लेख पुराने ऐतिहासिक दस्तावेजों में मिलता है, जैसे 1884 की अलेक्जेंडर कनिंघम की पुरातात्विक रिपोर्ट और 1909 के सेंट्रल प्रोविंसेज गजेटियर में 'Bomlai temple' का नाम दर्ज है। - मां बम्लेश्वरी की किंवदंतियाँ कौनसी हैं?
मां बम्लेश्वरी से संबंधित कई किंवदंतियाँ हैं, जिनमें राजा विक्रमादित्य, गोंड समुदाय की बमलाई और समलाई की कहानी, और राजा कमलनारायण के स्वप्न की कथा शामिल हैं। यह सभी कहानियाँ मंदिर की धार्मिक महत्ता को दर्शाती हैं।