राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस ; युवा थाम रहे गांव की शान, छत्तीसगढ़ में शिक्षित सरपंचों का नया दौर
NEWS IN SHORT
- 56% सरपंच 40 वर्ष से कम उम्र के हैं।
- युवा सरपंच शिक्षा और स्वास्थ्य पर जोर दे रहे हैं।
- नक्सल प्रभावित इलाकों में भी बदलाव दिख रहा है।
- ग्राम सभाएं अब गांव के फैसलों का मंच बनीं।
- शिक्षित सरपंचों ने बेहतर कार्यों की मिसाल पेश की।
NEWS IN DETAIL
छत्तीसगढ़ के ग्राम पंचायतों में नेतृत्व की तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब पंचायतों की कमान अनुभव से ज्यादा शिक्षा और सेवा भाव के साथ युवा सरपंच संभाल रहे हैं। राज्य की 11,693 ग्राम पंचायतों में करीब 56% सरपंच 40 वर्ष या उससे कम उम्र के हैं। ये युवा सरपंच अब पंचायत स्तर पर फैसले लेने में नई सोच लेकर आ रहे हैं। इनमें से 21% सरपंच ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट हैं, जो पंचायतों में शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के मामलों में अपने अनुभव से बेहतर काम कर रहे हैं।
नक्सल प्रभावित इलाकों में भी दिख रहा बदलाव
यह बदलाव नक्सल प्रभावित इलाकों बीजापुर, दंतेवाड़ा और नारायणपुर तक पहुंच चुका है। यहां के युवा सरपंच अब विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे इन क्षेत्रों में भी बदलाव दिखने लगा है। मैदानी जिलों में भी शिक्षित और प्रेरित सरपंचों का असर देखने को मिल रहा है। बालोद, धमतरी और दुर्ग जैसे जिलों में शिक्षित सरपंचों ने योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन की मिसाल पेश की है।
ग्राम सभाएं बनीं ताकतवर मंच
ग्राम सभाएं अब औपचारिकता नहीं रही, बल्कि गांव के फैसलों का मजबूत मंच बन चुकी हैं। स्वास्थ्य, पोषण और बाल कल्याण जैसे मुद्दों पर पंचायतों की सक्रिय भूमिका देखने को मिल रही है। कई पंचायतों को अपने अच्छे कार्यों के लिए पुरस्कार भी दिए जा रहे हैं, जो 1.50 करोड़ रुपये तक हो सकते हैं। यह युवा सरपंच केवल चुनाव नहीं, बल्कि बदलाव की लड़ाई लड़ रहे हैं।
योग्यता की कोई बाधा नहीं, फिर भी बढ़ी शिक्षित सरपंचों की भागीदारी
पंच या सरपंच बनने के लिए शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं है, लेकिन फिर भी पंचायतों में पढ़े-लिखे युवाओं की भागीदारी बढ़ी है। 2019 में राज्य सरकार ने पंच के लिए पांचवीं और सरपंच के लिए आठवीं तक की अनिवार्यता खत्म कर दी थी। इसके बावजूद, कई पढ़े-लिखे युवा सरपंचों ने पंचायतों में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी है।
जमीनी बदलाव की कहानियां
जयंती कश्यप – बस्तर के अडवाल गांव की यह युवा सरपंच 2010 से कार्य कर रही हैं। उन्होंने पंच पति की मृत्यु के बाद सेवा का दामन थामा। उनके कार्यकाल में सड़कों, स्कूलों, आंगनबाड़ी, गार्डन, पंचायत भवन और जल मिशन जैसे महत्वपूर्ण कार्य पूरे हुए हैं। उनकी पहचान अब दिल्ली तक हो चुकी है।
नवधा लालू वर्मा – सक्ती के ग्राम पंचायत बंदोरा के युवा सरपंच बीएससी ग्रेजुएट हैं। उनके नेतृत्व में गांवों में बुनियादी सुविधाओं, स्वास्थ्य जागरूकता और बच्चों के विकास में बड़ा बदलाव आया है। अब वे वॉटर हार्वेस्टिंग और शिक्षा पर जोर दे रहे हैं।
नक्सल प्रभावित इलाकों में सुधार
छत्तीसगढ़ के गांवों में अब नक्सल प्रभावित इलाकों में भी बदलाव की बयार बह रही है। शिक्षित युवा सरपंच अब इन क्षेत्रों के विकास में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। यह बदलाव न सिर्फ गांवों की तस्वीर बदलने के लिए बल्कि समाज में सकारात्मक सोच और बेहतर सेवाएं प्रदान करने के लिए जरूरी है। छत्तीसगढ़ के ग्राम पंचायतों में हो रहे इस बदलाव के साथ, अब इन गांवों में सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि विकास और बदलाव की नई लड़ाई लड़ी जा रही है।
निष्कर्ष
आज राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस है। छत्तीसगढ़ की ग्रामीण राजनीति में आया यह 'यूथ टर्न' इस बात का प्रमाण है कि गांव अब तकनीक, शिक्षा और आधुनिक प्रबंधन के साथ आगे बढ़ने को तैयार हैं। युवाओं की यह भागीदारी आने वाले समय में राज्य के ग्रामीण विकास को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी
यह खबरें भी पढ़ें...
एमपी के युवाओं के लिए मौका, IGNTU University Vacancy में 10 मई तक करें आवेदन
BPCL Recruitment 2026: इंजीनियरिंग युवाओं के लिए 250 पदों पर वैकेंसी, 1 लाख तक सैलरी
जब 'कद' नहीं, काबिलियत बनती है मिसाल, आज हैं लाखों युवाओं के लिए रोल मॉडल