द सूत्र की खबर का असर : भारी विवाद के बाद नवा रायपुर का 800 करोड़ का टेंडर रद्द

Umeshwari Baghel | Jul 02, 2026, 22:25 IST
भारी विवाद के बाद नवा रायपुर का 800 करोड़ का टेंडर रद्द
नवा रायपुर में 1,100 एकड़ की टाउन डेवलपमेंट स्कीम के लिए जारी निविदा विवादों में घिर गई थी। द सूत्र ने टेंडर की शर्तों, सरकारी जमीन के बिक्री अधिकार और संभावित कानूनी विवाद पर सवाल उठाए थे। अब प्राधिकरण ने पूरी निविदा प्रक्रिया रद्द कर दी है।

समझें क्या है पूरा मामला

एनआरडीए ने करीब 800 करोड़ रुपए का टेंडर रद्द किया।


तकनीकी जांच से पहले वित्तीय बोलियां सामने आ गई थीं।


टेंडर से जुड़ी दरें इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित हुईं।


डेवलपर को अधिकतम 232.35 एकड़ जमीन मिल सकती थी।


प्राधिकरण अब नए सिरे से निविदा जारी कर सकता है।


द सूत्र की खबर के बाद टेंडर पर बड़ा फैसला



Raipur : नवा रायपुर अटल नगर विकास प्राधिकरण ने करीब 800 करोड़ रुपए की टाउन डेवलपमेंट स्कीम का टेंडर रद्द कर दिया है। यह परियोजना नवा रायपुर के लगभग 1,100 एकड़ क्षेत्र में प्रस्तावित थी।



द सूत्र ने इस टेंडर की विवादित शर्तों को प्रमुखता से उठाया था। खबर में बताया गया था कि निजी डेवलपर को केवल सड़क, नाली और दूसरी आधारभूत सुविधाएं बनाने का काम नहीं मिलना था। इसके बदले उसे सरकारी मिक्स्ड यूज जमीन के विकास और बिक्री अधिकार भी दिए जाने थे।



टेंडर खुलने के बाद तकनीकी और वित्तीय प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए। अब प्राधिकरण ने प्रक्रिया में तकनीकी गड़बड़ी स्वीकार करते हुए निविदा रद्द कर दी है।



नवा रायपुर का 800 करोड़ का टेंडर हुआ रद्द


तकनीकी जांच से पहले खुल गई वित्तीय बोली

यह निविदा दो चरणों में पूरी होनी थी। पहले कवर-ए में जमा तकनीकी दस्तावेजों की जांच होनी थी। तकनीकी रूप से योग्य कंपनियों का चयन होने के बाद ही कवर-बी की वित्तीय बोलियां खोली जानी थीं। टेंडर प्रक्रिया के दौरान दोनों कवर एक साथ खुल गए। इससे कंपनियों की पात्रता तय होने से पहले ही उनकी वित्तीय दरें सामने आ गईं।



कुछ समय बाद वित्तीय बोलियों से जुड़ी जानकारी इंटरनेट मीडिया पर भी प्रसारित होने लगी। इससे ई-टेंडरिंग प्रक्रिया की गोपनीयता और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा पर सवाल उठे। प्राधिकरण के अधिकारियों का कहना है कि तकनीकी मूल्यांकन से पहले वित्तीय बोलियां खुलना प्रक्रिया के अनुरूप नहीं था। इसी कारण निविदा रद्द करने का निर्णय लिया गया।



प्राधिकरण ने गड़बड़ी पर क्या कहा

एनआरडीए के अनुसार कुछ कंपनियों ने तकनीकी दस्तावेजों के साथ वित्तीय प्रस्ताव भी अपलोड कर दिए थे। इसके कारण वित्तीय दरें सिस्टम में समय से पहले दिखाई देने लगीं।



एनआरडीए के मुख्य कार्यपालन अधिकारी चंदन कुमार के मुताबिक कवर-ए और कवर-बी तकनीकी कारणों से एक साथ खुल गए थे। पूरे मामले की तकनीकी टीम से जांच कराई गई है। प्राधिकरण अब टेंडर प्रक्रिया को नए सिरे से शुरू कर सकता है।



हालांकि यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि ई-टेंडरिंग सिस्टम में ऐसी गड़बड़ी कैसे हुई। साथ ही वित्तीय जानकारी सार्वजनिक होने के बाद प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया की गोपनीयता कैसे सुरक्षित रखी जाएगी।



800 करोड़ का काम, हजारों करोड़ की जमीन

यह निविदा सामान्य निर्माण ठेके से अलग थी। इसमें चुने गए डेवलपर को आधारभूत संरचना विकसित करने के बदले मिक्स्ड यूज जमीन के विकास और बिक्री अधिकार दिए जाने थे।



निविदा प्रावधानों के अनुसार डेवलपर को अधिकतम 232.35 एकड़ जमीन मिल सकती थी। एनआरडीए की अनुमानित दर करीब 4,500 रुपए प्रति वर्गफीट मानी जाए तो इस जमीन का मूल्य लगभग 4,500 से 5,000 करोड़ रुपए तक पहुंचता है।



ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि करीब 800 करोड़ रुपए के विकास कार्य के बदले हजारों करोड़ रुपए मूल्य की सरकारी जमीन के व्यावसायिक अधिकार देना कितना उचित है। यह भी स्पष्ट नहीं था कि जमीन का अंतिम मूल्यांकन कैसे होगा। बिक्री से मिलने वाले लाभ, सरकारी हिस्सेदारी और मूल्य वृद्धि का फायदा किसे मिलेगा, इसे लेकर भी सवाल बने हुए थे।



डेवलपर को जमीन बेचने का अधिकार क्यों बना विवाद

टेंडर के अनुसार निजी कंपनी पहले सड़क, नाली और दूसरी सुविधाएं विकसित करती। इसके बदले उसे चिह्नित भूमि पर परियोजनाएं विकसित करने और जमीन बेचने का अधिकार मिलता। इस व्यवस्था में डेवलपर केवल निर्माण एजेंसी नहीं रहता। वह सरकारी जमीन के व्यावसायिक उपयोग और बिक्री में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता।



नवा रायपुर जैसे तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्र में जमीन की कीमतें भविष्य में बढ़ सकती हैं। इसलिए विकास अधिकारों की अवधि, जमीन की कीमत, बिक्री प्रक्रिया और सरकारी राजस्व की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही थी। टेंडर दस्तावेजों में इन्हीं अधिकारों को लेकर पारदर्शिता और सार्वजनिक हित के सवाल उठाए गए थे।



विवाद की आशंका में पहले ही हाईकोर्ट पहुंचा था एनआरडीए

टेंडर जारी करने के बाद एनआरडीए ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में कैविएट भी दाखिल की थी। प्राधिकरण ने आशंका जताई थी कि कोई व्यक्ति या संस्था टेंडर अथवा इससे जुड़ी कार्रवाई को अदालत में चुनौती दे सकती है। कैविएट के माध्यम से एनआरडीए ने मांग की थी कि किसी याचिका पर अंतरिम आदेश देने से पहले उसका पक्ष सुना जाए।



कानून के तहत कैविएट दाखिल करना वैध प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य किसी मामले में एकतरफा आदेश से बचना होता है। इसके बावजूद टेंडर जारी होने के तुरंत बाद कानूनी चुनौती की आशंका जताने पर सवाल उठे थे।



आशंका यह थी कि विवाद केवल निविदा प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगा। सरकारी जमीन के विकास और बिक्री अधिकार निजी कंपनी को देने का पूरा मॉडल भी न्यायिक जांच के दायरे में आ सकता था।



ब्लैकलिस्ट कंपनी की भागीदारी पर भी उठे थे सवाल

टेंडर खुलने के बाद एक कथित ब्लैकलिस्ट कंपनी की भागीदारी को लेकर भी शिकायतें सामने आई थीं। हालांकि प्राधिकरण ने उस समय कहा था कि निविदा तकनीकी मूल्यांकन के अधीन है।



एनआरडीए का पक्ष था कि किसी कंपनी की पात्रता पर अंतिम निर्णय मूल्यांकन समिति करेगी। अब पूरी निविदा रद्द होने के कारण कंपनियों की तकनीकी पात्रता पर कोई अंतिम चयन नहीं हुआ है। नई निविदा जारी होने पर पात्रता, ब्लैकलिस्टिंग, वित्तीय क्षमता और पूर्व परियोजनाओं से जुड़ी शर्तों पर अधिक स्पष्टता की आवश्यकता होगी।



IMP FACTS

परियोजना क्षेत्र: लगभग 1,100 एकड़



अनुमानित टेंडर राशि: करीब 800 करोड़ रुपए



टेंडर जारी होने की तारीख: 23 अप्रैल 2026



भूमि का अधिकतम प्रावधान: 232.35 एकड़



अनुमानित भूमि दर: लगभग 4,500 रुपए प्रति वर्गफीट



अनुमानित भूमि मूल्य: करीब 4,500 से 5,000 करोड़ रुपए



टेंडर की स्थिति: रद्द



मुख्य कारण: तकनीकी जांच से पहले वित्तीय बोलियां खुलना



अब आगे क्या होगा

टेंडर रद्द होने के बाद एनआरडीए को पूरी प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करनी पड़ सकती है। नई निविदा में तकनीकी और वित्तीय बोलियों के लिए अलग एवं सुरक्षित व्यवस्था बनानी होगी।



प्राधिकरण को यह भी स्पष्ट करना होगा कि डेवलपर को कितनी जमीन दी जाएगी। जमीन का मूल्यांकन कौन करेगा और बिक्री से सरकार को क्या लाभ मिलेगा, इसकी जानकारी भी सार्वजनिक करनी होगी।



सरकारी जमीन के विकास अधिकार देने से पहले स्वतंत्र मूल्यांकन और कानूनी परीक्षण की मांग भी उठ सकती है। नई प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं रही तो मामला दोबारा विवाद और अदालत तक पहुंच सकता है।



फिलहाल निविदा रद्द होने से 800 करोड़ रुपए की परियोजना रुक गई है। इसके साथ ही टेंडर की तैयारी, ई-टेंडरिंग सिस्टम और हजारों करोड़ रुपए की जमीन से जुड़े निर्णयों पर प्राधिकरण के अधिकारियों की जवाबदेही का सवाल भी खड़ा हो गया है।



FAQ

  1. नवा रायपुर का 800 करोड़ रुपए का टेंडर क्यों रद्द हुआ?
    तकनीकी और वित्तीय बोलियां एक साथ खुल गई थीं। इससे वित्तीय दरें समय से पहले सार्वजनिक हो गईं।
  2. यह टेंडर किस परियोजना से जुड़ा था?
    यह टेंडर नवा रायपुर के 1,100 एकड़ क्षेत्र में टाउन डेवलपमेंट स्कीम विकसित करने के लिए जारी हुआ था।
  3. डेवलपर को क्या अधिकार मिलने थे?
    डेवलपर को इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के बदले मिक्स्ड यूज जमीन के विकास और बिक्री अधिकार मिलने थे।

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