बस्तर के खनिज पर किसका अधिकार? NMDC से मांगा पाई-पाई का हिसाब, स्थानीय युवाओं और प्रभावितों के अधिकारों पर बड़ा सवाल!
फिर प्रभावित परिवारों और युवाओं को कितना लाभ मिला? यह खबर 27 अक्टूबर 2026 को सामने आई। चांद ने सीधे एनएमडीसी की कार्यप्रणाली पर सवाल रखे। उनकी मांग है कि हर जवाब तथ्यों के साथ आए।
समझें क्या है पूरा मामला
- नवनीत चांद ने एनएमडीसी से जवाबदेही मांगी।
- मांग स्थानीय युवाओं की भर्ती, नियमित रोजगार और ठेका श्रमिकों के ब्योरे की है।
- प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, मुआवजे और आजीविका पर भी जवाब मांगा गया है।
- पर्यावरणीय प्रभाव और ग्रामसभा की वैधानिक भूमिका के पालन पर भी जोर है।
- चांद ने बस्तर की बुनियादी सुविधाओं का आकलन भी जरूरी बताया।
एनएमडीसी पर सवाल क्यों उठे?
एनएमडीसी पर सवाल इसलिए उठे कि बस्तर में खनन परियोजनाएं चल रही हैं। प्रभावित परिवार, स्थानीय युवा और कारोबारी इन परियोजनाओं के दायरे में आते हैं। चांद ने इन सबके लिए हिसाब मांगा है।
छत्तीसगढ़ गठन को 26 साल हुए हैं। चांद मानते हैं कि इस दौरान बस्तर में औद्योगिक गतिविधियों में इजाफा हुआ। मगर विकास का असली लाभ जनता तक कितना पहुंचा, इसका साफ हिसाब आना चाहिए। यानी सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं, पूरे हिसाब का है।
विकास की असली कसौटी क्या है?
नवनीत चांद, मुख्य संयोजक ने कहा औद्योगिक विकास की असली कसौटी यह है कि स्थानीय युवाओं को रोजगार, परिवारों को आर्थिक सुरक्षा और क्षेत्र को बेहतर बुनियादी सुविधाएं कितनी मिलीं।
चांद के मुताबिक उत्पादन और निवेश की संख्या से विकास नहीं नापा जा सकता। उनकी मांग है कि एनएमडीसी इन सवालों का तथ्यात्मक जवाब दे। चांद के मुताबिक कसौटी तीन हिस्सों में बंटी है। पहला रोजगार, दूसरा आर्थिक सुरक्षा और तीसरा बुनियादी सुविधाएं। हर हिस्से पर जवाब चाहिए।
बस्तर के युवाओं को रोजगार कितना?
चांद ने एनएमडीसी स्थानीय रोजगार का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करने को कहा है। इसमें भर्ती, नियमित रोजगार और ठेका श्रमिकों की जानकारी शामिल है। सवाल यह भी है कि बस्तर के युवाओं को रोजगार कितना मिला।
ठेका श्रमिकों और कारोबारियों की स्थिति
NMDC नौकरी के साथ स्थानीय कारोबारियों को मिले अवसरों का ब्योरा भी मांगा गया। स्थानीय कारोबारियों को कितने अवसर मिले, यह भी साफ होना चाहिए। ठेका व्यवस्था पर भी जानकारी की मांग है। स्थानीय प्राथमिकता के दावों पर भी पारदर्शी जानकारी की मांग है। तब स्थानीय भागीदारी की असली तस्वीर सामने आएगी।
प्रभावित परिवारों का पुनर्वास
प्रभावित परिवारों का पुनर्वास और मुआवजा भी सवालों के घेरे में है। आजीविका और पर्यावरणीय प्रभावों पर जवाबदेही तय करने की मांग भी उठी है। प्रभावित परिवारों को मिला लाभ और लंबित मामले भी सार्वजनिक हों।
चांद ने पर्यावरणीय स्वीकृति और वृक्षों की कटाई से जुड़े प्रावधानों का जिक्र किया। उनका कहना है कि इनका पालन सुनिश्चित होना चाहिए। ग्रामसभा की वैधानिक भूमिका का सम्मान भी जरूरी है।
नगरनार स्टील प्लांट पर भी नजर
चांद ने एनएमडीसी और नगरनार स्टील प्लांट सहित औद्योगिक परियोजनाओं का तुलनात्मक ब्योरा मांगा। इसमें स्थानीय रोजगार, ठेका व्यवस्था और स्थानीय कारोबारियों की भागीदारी शामिल है।
इस ब्योरे में तुलना अहम है। चांद चाहते हैं कि दोनों की स्थिति एक साथ सामने रखी जाए। इससे स्थानीय रोजगार, ठेका और कारोबार की तस्वीर साफ होगी।
बुनियादी सुविधाओं का आकलन जरूरी
चांद ने शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, बिजली और सिंचाई जैसी सुविधाओं का आकलन जरूरी बताया। जनजातीय कल्याण योजनाओं के बजट और जमीनी नतीजों की समीक्षा की बात भी उठी। पेसा के पालन पर जोर दिया गया। वन अधिकार कानून के प्रावधानों का पालन भी जरूरी बताया गया।
बस्तर की खनिज संपदा से उद्योगों को लाभ मिल रहा है। चांद के मुताबिक स्थानीय जनता को मिले लाभ का हिसाब भी सामने आए। मांग है कि एनएमडीसी भर्ती, ठेका श्रमिकों, पुनर्वास और विकास का ब्योरा सार्वजनिक करे।
यह खबर क्यों जरूरी है
खनन का असर सिर्फ खदान तक सीमित नहीं रहता। यह परिवारों के रोजगार, जमीन और आजीविका तक पहुंचता है। इसलिए पुनर्वास, मुआवजे और भर्ती का हिसाब सीधे उनके जीवन से जुड़ा होता है। चांद ने पेसा और वन अधिकार कानून के पालन की भी बात उठाई है।
पारदर्शी जानकारी से जनता का भरोसा मजबूत होता है। संवैधानिक व्यवस्था में कानूनों का पालन हर संस्था की जिम्मेदारी है। एनएमडीसी का पक्ष मिलने पर तस्वीर और साफ होगी।