रिम्स को सरकार का नोटिस: छात्रावास और ट्रांसपोर्ट के नाम पर फीस वसूलने पर सात दिन में जवाब तलब
बाहर रहकर पढ़ने वाले छात्रों को डे-स्कॉलर के रूप में पढ़ाई करने की अनुमति देनी होगी।
लेकिन सवाल है कि क्या नोटिस से निजी मेडिकल कॉलेजों की मनमानी रुकेगी या जवाब मांगने के बाद मामला फिर ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
छात्रों पर खर्च का दबाव
मेडिकल की पढ़ाई पहले ही महंगी है। ऐसे में छात्रावास या ट्रांसपोर्ट की जरूरत नहीं होने पर भी उसका शुल्क देना छात्रों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है। इसी मुद्दे पर निजी मेडिकल कॉलेजों की व्यवस्था पर सवाल उठे हैं। फीस विनियामक समिति ने अंतिम फैसला आने तक छात्रों को राहत दी है। अब कॉलेजों को बताना होगा कि इन सुविधाओं को अनिवार्य करने का आधार क्या है।
हालांकि, नोटिस जारी होने का मतलब यह नहीं है कि आरोप साबित हो गए हैं। कॉलेजों का जवाब और समिति का अंतिम फैसला अहम होगा।
शिकायत के बाद ही कार्रवाई?
इस मामले को सामाजिक कार्यकर्ता निश्चय बाजपेई ने उठाया था। उन्होंने छात्रावास और ट्रांसपोर्ट की अनिवार्यता पर सवाल उठाए और छात्रों को राहत देने की मांग की। उन्होंने इस मुद्दे पर प्रेसवार्ता भी की। इसके बाद पुलिस कमिश्नर डॉ. संजीव शुक्ला को ज्ञापन सौंपकर हस्तक्षेप की मांग की। मामला सामने आने के बाद फीस विनियामक समिति ने कॉलेजों से जवाब मांगा।
यहीं प्रशासन की निगरानी पर सवाल उठता है। क्या विभाग और नियामक संस्थाओं को ऐसी गड़बड़ियों की जानकारी शिकायत के बाद ही मिलती है? क्या कॉलेजों की फीस और दूसरी सुविधाओं के शुल्क की नियमित जांच नहीं होती? अगर निगरानी की व्यवस्था है, तो छात्रों या सामाजिक कार्यकर्ताओं को ही सामने क्यों आना पड़ता है? इन सवालों का जवाब संबंधित अधिकारियों को देना चाहिए।
मनमानी करने की छूट?
निजी कॉलेज ऐसी शर्तें लागू करने का जोखिम कैसे लेते हैं? क्या उन्हें लगता है कि दाखिले और करियर के दबाव में छात्र विरोध नहीं करेंगे? मेडिकल की पढ़ाई बीच में छोड़ना या कॉलेज बदलना आसान नहीं है। ऐसे में शुल्क से जुड़े नियमों की निगरानी जरूरी है।
हालांकि, संबंधित कॉलेजों का पक्ष सामने आए बिना यह कहना सही नहीं होगा कि सभी संस्थान ऐसा कर रहे हैं।
नियम टूटे तो क्या होगा?
समिति ने सात दिन के भीतर जवाब मांगा है। अंतिम फैसला आने तक डे-स्कॉलर के रूप में पढ़ाई का विकल्प देने को कहा गया है। आगे की कार्रवाई समिति के निष्कर्षों और लागू नियमों पर निर्भर करेगी। अगर जांच में नियमों का उल्लंघन साबित होता है, तो संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई हो सकती है।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी में किसी कॉलेज पर जुर्माना लगाने या अंतिम दंड का आदेश सामने नहीं आया है।
छात्रों को राहत कब तक?
अभी छात्रों को अंतरिम राहत मिली है। स्थायी समाधान अंतिम फैसले के बाद ही स्पष्ट होगा। समिति को यह भी देखना होगा कि कॉलेज उसके निर्देशों का पालन कर रहे हैं या नहीं। असली परीक्षा यह है कि नोटिस के बाद अनिवार्य शुल्क की शर्तों में बदलाव होता है या नहीं।
छात्रों को उन सुविधाओं का शुल्क देने से राहत मिलनी चाहिए, जिनका वे इस्तेमाल ही नहीं करना चाहते। अगर प्रशासन शिकायत के बाद ही सक्रिय होगा, तो ऐसे विवाद दोबारा खड़े हो सकते हैं।