छत्तीसगढ़ के निजी स्कूलों के लिए नए नियम, ड्रेस-किताबों के लिए दुकान तय की तो होगी कार्रवाई, फीस की भी सीमा तय
NEWS IN SHORT
- निजी स्कूलों में फीस वृद्धि अब आठ प्रतिशत तक सीमित
- हर स्कूल में फीस समिति बनाना हुआ अनिवार्य अब
- ज्यादा फीस के लिए जिला समिति से अनुमति जरूरी
- कॉपी किताब यूनिफॉर्म के लिए दबाव बनाने पर रोक
- नियम तोड़ने पर स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी
NEWS IN DETAIL
छत्तीसगढ़ में नए शिक्षा सत्र के आगाज के साथ ही राज्य सरकार ने निजी स्कूलों के एकाधिकार और मनमानी को चुनौती देते हुए एक ही दिन में दो कड़े आदेश जारी किए हैं। शिक्षा विभाग द्वारा जारी इन निर्देशों का उद्देश्य अभिभावकों को आर्थिक शोषण से बचाना और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाना है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब आरटीई (RTE) प्रतिपूर्ति को लेकर सरकार और निजी स्कूलों के बीच पहले से ही खींचतान चल रही है।
फीस वृद्धि के लिए लक्ष्मण रेखा तय
सरकार के पहले आदेश के अनुसार, अब कोई भी निजी स्कूल अपनी इच्छाशक्ति से फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी नहीं कर सकेगा। सरकार ने सभी निजी स्कूलों के लिए विद्यालय फीस समिति का गठन अनिवार्य कर दिया है।
8% की सीमा: कोई भी स्कूल एक शिक्षा सत्र में अधिकतम 8 प्रतिशत तक ही फीस बढ़ा पाएगा।
विशेष अनुमति: यदि स्कूल को 8 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि करनी है, तो उसे ठोस कारणों के साथ जिला स्तरीय फीस समिति से औपचारिक अनुमति लेनी होगी।
पारदर्शिता: स्कूलों को अपनी फीस का विवरण और समिति के निर्णय को सार्वजनिक करना होगा। नियमों की अनदेखी करने वाले संस्थानों पर भारी जुर्माना और मान्यता रद्द करने जैसी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
यूनिफॉर्म और किताबों की सेटिंग पर प्रहार
दूसरे महत्वपूर्ण आदेश में स्कूलों, प्रकाशकों और दुकानदारों के बीच चलने वाले कमीशन के खेल को निशाने पर लिया गया है। अक्सर देखा जाता है कि स्कूल प्रबंधन अभिभावकों पर किसी विशेष दुकान से ही किताबें, कॉपियां या यूनिफॉर्म खरीदने का दबाव बनाते हैं।
नए निर्देशानुसार, स्कूल अब किसी खास वेंडर का नाम नहीं थोप सकेंगे। अभिभावक अपनी सुविधा और बजट के अनुसार खुले बाजार से सामग्री खरीदने के लिए स्वतंत्र होंगे। इसके अलावा, शिक्षा के बोझ और खर्च को कम करने के लिए कक्षा पहली से आठवीं तक एनसीईआरटी (NCERT) की किताबें अनिवार्य कर दी गई हैं। इससे निजी प्रकाशकों की महंगी किताबों के सिंडिकेट पर लगाम लगने की उम्मीद है।
अभिभावकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया
हालांकि सरकार की इस सख्ती का स्वागत हो रहा है, लेकिन इसके 'टाइमिंग' पर सवाल भी खड़े हो रहे हैं। रायपुर और बिलासपुर सहित प्रदेश के कई हिस्सों में सीबीएसई (CBSE) सत्र 1 अप्रैल से शुरू हो चुका है। अधिकांश अभिभावक पहले ही ऊंचे दामों पर किताबें और यूनिफॉर्म खरीद चुके हैं।
अभिभावक संघों का कहना है कि यदि ये आदेश फरवरी या मार्च के महीने में आते, तो मध्यमवर्गीय परिवारों को हजारों रुपयों की बचत होती। अब चुनौती इन आदेशों के जमीनी क्रियान्वयन की है, क्योंकि हर साल निर्देश तो जारी होते हैं, लेकिन स्कूल प्रबंधन अक्सर कागजी खानापूर्ति कर बच निकलता है।
प्रशासनिक मुस्तैदी और आगामी चुनौती
मुख्य सचिव के निर्देश पर प्रदेश के सभी कलेक्टरों और जिला शिक्षा अधिकारियों (DEOs) को इन नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि फीस समिति में अभिभावकों की वास्तविक भागीदारी होनी चाहिए, न कि केवल उनके हस्ताक्षर।
अब देखना यह होगा कि शिक्षा विभाग का यह हंटर निजी स्कूलों के रसूख के आगे कितना प्रभावी साबित होता है और क्या वास्तव में आम जनता को इस 'शिक्षा के व्यापार' से राहत मिल पाती है।
निष्कर्ष
सरकार के नए आदेश निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने की कोशिश हैं, लेकिन समय पर लागू न होने से अभिभावकों को तत्काल राहत नहीं मिली। अब असली चुनौती इन नियमों के सख्त पालन की है, ताकि फीस नियंत्रण और खरीद दबाव जैसी समस्याओं से स्थायी समाधान मिल सके। जिला शिक्षा अधिकारी को इन नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है।
यह खबरें भी पढ़ें...
निजी स्कूलों की लूट पर सरकार का बड़ा प्रहार, कमीशनखोरी बंद, NCERT किताबें अनिवार्य
निजी स्कूलों की मनमानी पर सख्ती, NCERT किताबों से ही पढ़ाई का आदेश
महंगी किताबों का खेल खत्म, NHRC ने प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर 30 दिन में मांगा जवाब
Sootr Campaign | प्राइवेट स्कूलों और बुक स्टोर्स की मनमानी, हर साल महंगी किताबें खरीदने का दबाव !