दो साल, चार नोटिस और नतीजा सिफर, निजी विश्वविद्यालयों की मनमानी

Arun Tiwari | Aug 24, 2026, 16:34 IST
निजी विश्वविद्यालयों की मनमानी
छत्तीसगढ़ के निजी विश्वविद्यालयों में फीस और एडमिशन को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। 2024 से 2026 तक सरकार को बार-बार फीस और प्रवेश नियमों के पालन के लिए निर्देश जारी करने पड़े।

छत्तीसगढ़ में निजी विश्वविद्यालयों में संचालित तकनीकी और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस और प्रवेश प्रक्रिया को लेकर सरकारी स्तर पर लगातार पत्र और नोटिस जारी किए जा रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन निर्देशों का जमीन पर पूरी तरह पालन हो रहा है।



दस्तावेज बताते हैं कि सितंबर 2024 से शुरू हुई प्रक्रिया अगस्त 2026 तक पत्राचार और निर्देश जारी करने के स्तर पर ही चल रही है। मामला मुख्य रूप से दो बिंदुओं से जुड़ा है व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस कौन तय करेगा और छात्रों को दाखिला किस प्रक्रिया से दिया जाएगा। फीस कमेटी है लेकिन फीस कॉलेज ही तय कर रहे हैं।



2024 में सामने आया फीस निर्धारण का मामला:

प्रवेश एवं शुल्क विनियामक समिति (AFRC) के 13 सितंबर 2024 के पत्र में कहा गया कि कुछ निजी विश्वविद्यालय अपने यहां संचालित विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस खुद तय कर रहे हैं। समिति के अनुसार यह व्यवस्था छत्तीसगढ़ निजी व्यावसायिक शिक्षण संस्था (प्रवेश का विनियमन एवं शुल्क का निर्धारण) अधिनियम, 2008 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।



इस अधिनियम के तहत व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस तय करने के लिए प्रवेश एवं शुल्क विनियामक समिति की व्यवस्था है। इसी आधार पर संबंधित मामले में उचित निर्देश जारी करने को कहा गया।



2025 में निजी विश्वविद्यालयों को फिर निर्देश:

इसके बाद 23 जून 2025 को छत्तीसगढ़ निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग (PURC) ने सभी विश्वविद्यालयों को निर्देश जारी किया। इसमें साफ कहा गया कि अधिनियम 2008 के तहत आने वाले व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस संबंधित शुल्क निर्धारण समिति से ही तय कराई जाए।



विश्वविद्यालयों को यह भी निर्देश दिया गया कि फीस निर्धारण की प्रक्रिया पूरी कर इसकी जानकारी संबंधित कार्यालय को दी जाए। यानी 2024 में उठे सवाल के करीब नौ महीने बाद भी सरकार को दोबारा निजी विश्वविद्यालयों को यह बताना पड़ा कि फीस किस नियम के तहत तय की जानी है।



विश्वविद्यालयों को नोटिस


2026 में DTE ने माना दोहरी व्यवस्था से भ्रम:

15 अप्रैल 2026 को तकनीकी शिक्षा संचालनालय (DTE) ने मामले को लेकर एक और महत्वपूर्ण पत्र जारी किया। इसमें कहा गया कि निजी विश्वविद्यालयों और संस्थानों में तकनीकी एवं व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस तय करने में एकरूपता नहीं है।



कुछ संस्थानों में फीस निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के माध्यम से तय की जा रही थी, जबकि कुछ संस्थान प्रवेश एवं शुल्क विनियामक समिति, रायपुर के माध्यम से फीस निर्धारित करा रहे थे।



DTE ने माना कि इस दोहरी व्यवस्था से फीस निर्धारण में पारदर्शिता की कमी और छात्रों-अभिभावकों में भ्रम की स्थिति बन रही है। पत्र में 2008 के अधिनियम का हवाला देते हुए कहा गया कि AICTE, PCI और COA जैसे नियामक संस्थानों से अनुमोदित तकनीकी एवं व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस भी प्रवेश एवं शुल्क विनियामक समिति के माध्यम से निर्धारित किया जाना अपेक्षित है।



इसी आधार पर राज्य के सभी निजी विश्वविद्यालयों और संस्थानों को आवश्यक निर्देश जारी करने का प्रस्ताव रखा गया, ताकि फीस निर्धारण में एकरूपता और पारदर्शिता लाई जा सके। दस्तावेज के अनुसार इस प्रस्ताव को संचालक स्तर से अनुमोदित भी किया गया।



अब प्रवेश प्रक्रिया पर भी सख्ती का निर्देश:

फीस के बाद अब दाखिले की प्रक्रिया को लेकर भी निजी विश्वविद्यालयों को निर्देश दिए गए हैं। 9 जून 2026 के DTE पत्र में कहा गया कि निजी विश्वविद्यालयों में BE/BTech, MTech, MBA, MCA, इंजीनियरिंग डिप्लोमा, फार्मेसी सहित तकनीकी पाठ्यक्रमों में प्रवेश 2008 के अधिनियम के नियमों के अनुसार ही किया जाना चाहिए।



इसका मतलब है कि जहां राज्य सरकार ने किसी पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए सामान्य प्रवेश परीक्षा और मेरिट सूची की व्यवस्था तय की है, वहां निजी विश्वविद्यालय अपनी मर्जी से सीधे प्रवेश नहीं दे सकते। पत्र में CG PET, CG PPHT, PPT, PreMCA और JEE जैसी प्रवेश परीक्षाओं की मेरिट सूची और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर दाखिला देने के निर्देश दिए गए हैं।





नियम तोड़कर प्रवेश दिया तो दाखिला अवैध:

DTE ने अपने पत्र में 2008 के अधिनियम की धारा 6 और 7 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि नियमों के विपरीत किया गया प्रवेश शून्य यानी अमान्य माना जा सकता है। इसका सीधा असर छात्रों पर पड़ सकता है।



मसलन, भविष्य में डिग्री की मान्यता, छात्रवृत्ति या अन्य शैक्षणिक सुविधाओं को लेकर समस्या खड़ी हो सकती है। ऐसे नियम विरुद्ध प्रवेश के कारण पैदा होने वाली समस्या और कानूनी विवाद की जिम्मेदारी संबंधित निजी विश्वविद्यालय की होगी।



दो साल में चार दौर के निर्देश, कार्रवाई पर सवाल:

पूरे मामले की टाइमलाइन देखें तो 13 सितंबर 2024 से लेकर 9 जून 2026 तक फीस और प्रवेश व्यवस्था को लेकर लगातार पत्र जारी हुए। पहले फीस निर्धारण को लेकर सवाल उठा, फिर निजी विश्वविद्यालय आयोग ने निर्देश दिए, इसके बाद DTE ने फीस की दोहरी व्यवस्था खत्म करने का प्रस्ताव रखा और आखिर में प्रवेश प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करने के निर्देश दिए।



इससे बड़ा सवाल यही है कि जब नियम 2008 से मौजूद हैं तो उनके पालन के लिए बार-बार पत्र और नोटिस जारी करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। निजी विश्वविद्यालयों को नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी आखिर किस स्तर पर तय होगी? छात्रों से फीस वसूलने और दाखिला देने की व्यवस्था कब पूरी तरह एकरूप होगी? फिलहाल दस्तावेजों की टाइमलाइन यही बताती है कि मामला निर्देशों और पत्राचार से आगे बढ़कर ठोस अनुपालन और कार्रवाई तक पहुंचने का इंतजार कर रहा है।



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