रायपुर की फोरेंसिक लैब हुई हाईटेक, अब डीपफेक वीडियो और लॉक आईफोन की भी जांच, विदेशों में भी रिपोर्ट को मान्यता
खास बात यह है कि यहां की जांच रिपोर्ट को विदेशों में भी मान्यता मिलने का दावा किया गया है।
सेंट्रल इंडिया में नई जांच सुविधा
रायपुर की राज्य फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) में आधुनिक डिजिटल जांच सुविधाएं शुरू की गई हैं। यहां सिंथेटिक मीडिया डिटेक्शन की सुविधा भी उपलब्ध है। इसे मध्य भारत की पहली ऐसी सुविधा बताया जा रहा है।
इस तकनीक से एआई के जरिए बनाए गए फर्जी फोटो और वीडियो पकड़े जा सकते हैं। इसके अलावा पुराने और धुंधले सीसीटीवी फुटेज की जांच भी की जा रही है।अधिकारियों के मुताबिक लैब में अब तक 1200 से ज्यादा मोबाइल और लैपटॉप की जांच की जा चुकी है। वहीं 130 से अधिक डिवाइस की जांच रिपोर्ट भी तैयार की गई है।
बिना पासवर्ड वाले मोबाइल की भी जांच
अपराध की जांच में मोबाइल और लैपटॉप अहम सबूत बनते हैं। लेकिन कई बार पुलिस के पास इनका पासवर्ड नहीं होता। ऐसे में जरूरी जानकारी निकालना मुश्किल हो जाता है।
फोरेंसिक अधिकारियों के मुताबिक करीब 90 फीसदी मामलों में मोबाइल का पासवर्ड या पैटर्न लॉक उपलब्ध नहीं होता। खासकर आईफोन से डेटा निकालना ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है।
रायपुर की लैब में लॉक आईफोन और टैबलेट की भी जांच की जा रही है। इसके अलावा टूटे या पानी में खराब हुए मोबाइल से भी डेटा निकालने की कोशिश होती है। यहां व्हाट्सएप और टेलीग्राम चैट की जांच की जा रही है। फेसबुक और इंस्टाग्राम से जुड़े डिजिटल डेटा को भी रिकवर किया जा रहा है।
डीपफेक फोटो और वीडियो कैसे पकड़े जाते हैं?
आजकल एआई से किसी व्यक्ति का नकली वीडियो बनाना आसान हो गया है। कई बार इन वीडियो में असली और नकली का फर्क करना मुश्किल होता है। रायपुर की फोरेंसिक लैब में ऐसे वीडियो की कई तरीकों से जांच की जाती है।
सबसे पहले फोटो और वीडियो के पिक्सल देखे जाते हैं। इससे चेहरे के आसपास एडिटिंग और धुंधलेपन का पता लगाया जाता है। इसके बाद चेहरे पर पड़ रही रोशनी और परछाई की जांच होती है। वीडियो में होंठों की हरकत और आवाज का मिलान भी किया जाता है।
ऑडियो की जांच में आवाज के उतार-चढ़ाव और बैकग्राउंड की आवाजें देखी जाती हैं। वहीं मेटाडेटा से फाइल बनने और एडिट होने से जुड़ी जानकारी निकाली जाती है।इन सभी जांचों से पता लगाने की कोशिश होती है कि फोटो या वीडियो के साथ छेड़छाड़ हुई है या नहीं।
CBI और ED जैसी एजेंसियां भी ले रहीं मदद
रायपुर की फोरेंसिक लैब का इस्तेमाल अब केवल छत्तीसगढ़ पुलिस तक सीमित नहीं है। कई केंद्रीय जांच एजेंसियां भी यहां डिजिटल सबूतों की जांच करा रही हैं। इनमें सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय (ED), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA), राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) शामिल हैं।
आयकर विभाग भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की जांच के लिए लैब की मदद ले रहा है। इस सुविधा से जब्त मोबाइल और लैपटॉप को जांच के लिए दूसरी जगह भेजने की जरूरत कम हुई है। इससे जांच प्रक्रिया को तेज करने में मदद मिल सकती है।
लैब को मिलेंगे 80 करोड़ रुपए
रायपुर की राज्य फोरेंसिक प्रयोगशाला को और आधुनिक बनाने की तैयारी है। केंद्र सरकार से इसके लिए करीब 80 करोड़ रुपए मिलने की बात कही गई है। इस राशि से नए उपकरण और आधुनिक सॉफ्टवेयर खरीदे जाएंगे।
खासतौर पर डीपफेक की पहचान करने वाली तकनीक को बेहतर बनाया जाएगा। लैब में एआई आधारित जांच उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ाने की भी योजना है। इससे डिजिटल सबूतों की जांच क्षमता बढ़ने की उम्मीद है।
18 देशों में जांच रिपोर्ट का मिलान
रायपुर की फोरेंसिक लैब की जांच रिपोर्ट को लेकर एक बड़ा दावा सामने आया है। अधिकारियों के मुताबिक यहां की रिपोर्ट 18 देशों में दोबारा जांच के लिए भेजी गई थी। बताया गया है कि उन देशों में हुई जांच के नतीजे रायपुर की रिपोर्ट से मेल खाते थे। इसी आधार पर अधिकारियों ने विदेशों में भी रिपोर्ट मान्य होने की बात कही है।
हालांकि किन देशों में यह जांच हुई और मान्यता किस प्रक्रिया से मिली, इसकी विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। अधिकारियों का यह भी दावा है कि उत्तरप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और झारखंड जैसे कई राज्यों में फिलहाल ऐसी जांच सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
धुंधले CCTV फुटेज से भी मिल सकते हैं सुराग
कई आपराधिक मामलों में सीसीटीवी कैमरे अहम सबूत होते हैं। लेकिन कम रोशनी और खराब कैमरे के कारण फुटेज साफ नहीं मिलते। ऐसे मामलों में फोरेंसिक विशेषज्ञ आधुनिक सॉफ्टवेयर की मदद लेते हैं।
इससे वीडियो की गुणवत्ता सुधारने और उसमें मौजूद जानकारी का विश्लेषण करने में मदद मिलती है। हालांकि बहुत खराब फुटेज से हर बार स्पष्ट पहचान निकाल पाना संभव नहीं होता।
राज्य फोरेंसिक लैब के संयुक्त संचालक टीएल चंद्रा के मुताबिक प्रयोगशाला में कई तरह की डिजिटल जांच की जा रही है। इनमें टूटे मोबाइल और धुंधले फुटेज की जांच भी शामिल है। उन्होंने बताया कि लैब में डीपफेक सामग्री की जांच की सुविधा भी उपलब्ध है।
कुल मिलाकर रायपुर की फोरेंसिक लैब डिजिटल अपराधों की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। नई तकनीक और प्रस्तावित आर्थिक मदद से इसकी जांच क्षमता और बढ़ सकती है। इससे छत्तीसगढ़ के साथ दूसरी जांच एजेंसियों को भी फायदा मिलने की उम्मीद है।