प्रोफेसर जेएन पांडेय ने फहराया था पहला राष्ट्रीय ध्वज, अब उन्ही के नाम पर स्कूल
रायपुर का पं. जेएन पांडेय स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं है। यह उस दौर की गवाही देता है, जब तिरंगा फहराना अंग्रेजी हुकूमत को सीधी चुनौती माना जाता था। इसी स्कूल की छत पर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान छत्तीसगढ़ में पहली बार छात्र जयनारायण पांडेय ने राष्ट्रीय ध्वज फहराकर रायपुर में अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी थी।
छत पर चढ़ा क्रांतिकारी छात्र
अंग्रेजों की निगरानी के बीच स्कूल की छत पर चढ़ना और तिरंगा लहराना मामूली बात नहीं थी। यह वह दौर था, जब ब्रिटिश सरकार राष्ट्रवादी गतिविधियों को कुचलने में लगी थी। लेकिन युवा जयनारायण पांडेय पीछे नहीं हटे। उनके इस कदम के प्रदेश के लाखों युवा आजादी के आंदोलन में कूद पड़े।
तिरंगा फहरा, जेल यातना शुरु
जयनारायण पांडेय के हाथों तिरंगा लहराते ही अंग्रेजी पुलिस सक्रिय हो गई। उन्हें गिरफ्तार कर रायपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। देश के झंडे के लिए उन्हें जेल की यातनाएं सहनी पड़ीं।
जेल में राजनीतिक बंदियों के लिए हालात बेहद कठिन थे। सुविधाएं नाममात्र की थीं और कठोर श्रम भी कराया जाता था। लेकिन जेल की दीवारें भी उनके हौसले को नहीं तोड़ सकीं। वे वहां भी साथी बंदियों को शिक्षा, देशभक्ति और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देते रहे।
क्रांतिकारी से बने प्रोफेसर
आजादी के बाद जयनारायण पांडेय ने हथियार या आंदोलन की राह नहीं चुनी। उन्होंने शिक्षा को अपना हथियार बनाया। वे आगे चलकर प्रोफेसर बने और नई पीढ़ी को पढ़ाने में जुट गए।
उनकी सोच साफ थीकृदेश को मजबूत करना है तो नई पीढ़ी को शिक्षित और जागरूक करना होगा। जिस छात्र ने कभी इसी स्कूल की छत पर तिरंगा फहराया था, वही आगे चलकर शिक्षक बना और हजारों विद्यार्थियों के जीवन को दिशा दी।
अंग्रेजों ने बनाया था जिला स्कूल
जेएन पांडेय स्कूल की कहानी जयनारायण पांडेय से भी पुरानी है। अंग्रेजी शासन के दौर में रायपुर में 1864 में जिला स्कूल की स्थापना हुई थी। शुरुआत मिडिल स्कूल के रूप में हुई। इसके बाद 1884-85 में यहां नौवीं से 11वीं तक की पढ़ाई शुरू हुई।
यानी यह संस्था छत्तीसगढ़ की शुरुआती आधुनिक शिक्षण संस्थाओं में शामिल रही। अंग्रेजों ने इसे शिक्षा के लिए बनाया था, लेकिन इसी परिसर ने आगे चलकर ऐसे विद्यार्थी तैयार किए, जिन्होंने अंग्रेजी राज को चुनौती दी।
एक स्कूल, कई ऐतिहासिक नाम
इस स्कूल की पहचान सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी तक सीमित नहीं है। यहां पढ़े विद्यार्थियों की सूची अपने आप में इतिहास है।
पूर्व उपराष्ट्रपति हिदायतुल्ला ने यहां शिक्षा हासिल की। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माधव राव सप्रे और ठाकुर प्यारेलाल यादव भी इसी संस्था से जुड़े रहे। पंडित विद्याचरण शुक्ल, महंत लक्ष्मीनारायण दास महंत, हाईकोर्ट के जस्टिस गणेश प्रसाद भट्ट, बैरिस्टर राजेंद्र सिंह, शहीद मेजर यशवंत गोरे और कई अन्य नाम इस स्कूल की विरासत का हिस्सा हैं।
उपराष्ट्रपति भी लौटे थे
हिदायतुल्ला जब देश के उपराष्ट्रपति बने, तब उनका अपने पुराने स्कूल से रिश्ता खत्म नहीं हुआ। स्कूल के शताब्दी समारोह में उनकी मौजूदगी ने इस संस्था के गौरव को और बढ़ाया। किसी स्कूल की इससे बड़ी पहचान क्या होगी कि उसका विद्यार्थी देश के सर्वाेच्च संवैधानिक पदों में पहुंचे और फिर उसी परिसर में लौटकर अपने पुराने दिनों को याद करे।
2002 में मिला सेनानी का नाम
जिस स्कूल की छत पर जयनारायण पांडेय ने राष्ट्रीय ध्वज फहराकर इतिहास रचा था, उसी स्कूल को आखिरकार उनके नाम से पहचान मिली। वर्ष 2002 में जिला स्कूल का नाम बदलकर प्रोफेसर जेएन पांडेय शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय किया गया। यह सिर्फ नाम बदलने का फैसला नहीं था। यह उस छात्र के साहस को संस्थान की पहचान बनाने का सम्मान था, जिसने अंग्रेजों के शासन में इसी परिसर पर भारतीय ध्वज फहराया था।
आज भी तिरंगा सबसे ऊपर
आज स्कूल की पहचान एक पुराने सरकारी विद्यालय से कहीं आगे है। इसकी सबसे बड़ी विरासत वह कहानी है, जिसमें एक छात्र ने अंग्रेजों के स्कूल की छत पर भारतीय ध्वज लहराया, गिरफ्तारी दी और जेल की यातनाएं सहीं। फिर उसी छात्र ने शिक्षा को अपना मिशन बनाया। समय बदला। अंग्रेज चले गए। जिला स्कूल का नाम भी बदल गया। रायपुर का जेएन पांडेय स्कूल इसलिए खास है, क्योंकि यहां सिर्फ इतिहास पढ़ाया नहीं जाता, इस स्कूल ने खुद इतिहास बनाया है।
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