मेडिकल कॉलेज में यौन शोषणः आरोपी को बचाने प्रशासनिक दबाव का खेल
समझें क्या है पूरा मामला
- यौन उत्पीड़न केस में प्रशासनिक दबाव का खेल
- कुलसचिव ने पूरे PG बैच पर रोक लगाई
- डॉ. इक्षित को नियम उल्लंघन का नोटिस
- कुलपति ने आदेश तत्काल प्रभाव से निरस्त किया
- कुलसचिव बोले, जांच जारी है रिपोर्ट देंगे
पीजी छात्रा से यौन उत्पीडन
रायपुर मेडिकल कॉलेज में पीजी छात्रा से यौन उत्पीडन मामलेे की शिकायत को दबाने के लिए प्रशासनिक बल का प्रयोग होने लगा है। आरोप है कि यौन उत्पीड़न के मामले में आरोपी डॉ. आशीष सिन्हा को बचाने की कवायद की जा रही है।
इस पूरे मामले में आयुष विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. दिनेश सिन्हा की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। कुलसचिव ने मेडिकल कॉलेज के पीएसएम यानी कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के पीजी छात्रों को परीक्षा से रोकने का आदेश जारी कर दिया।
खास बात यह है कि आदेश में पीजी छात्र डॉ. इक्षित सिंह को केंद्र में रखा गया और उनके खिलाफ नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया। सवाल यह है कि विश्वविद्यालय के कुलसचिव को मेडिकल कॉलेज के पीजी छात्रों को परीक्षा से रोकने का अधिकार आखिर किस नियम के तहत मिला?
क्या लिखा है आदेश में?
कुलसचिव डॉ. दिनेश सिन्हा की ओर से जारी आदेश में पीजी छात्र डॉ. इक्षित सिंह पर डिस्ट्रिक्ट रेजिडेंट पोस्टिंग के नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। आदेश में कहा गया कि डॉ. इक्षित सिंह को मुख्य परीक्षा में बैठने से रोका जाए।
साथ ही मामले की जांच कराने और जांच रिपोर्ट आने तक कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के अन्य पीजी छात्रों को भी परीक्षा में शामिल नहीं करने के निर्देश दिए गए। यानी एक छात्र पर लगे कथित नियम उल्लंघन के मामले में पूरे विभाग के पीजी छात्रों की परीक्षा पर ही सवाल खड़ा कर दिया गया। यही आदेश अब विवाद के केंद्र में है।
क्या है पीछे की कहानी?
मामला जुलाई 2025 का है। रायपुर मेडिकल कॉलेज के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग की एक पीजी छात्रा ने विभाग के तत्कालीन एचओडी डॉ. आशीष सिन्हा पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।
छात्रा ने स्वास्थ्य विभाग से शिकायत की। काफी समय तक कार्रवाई नहीं होने के बाद उसने मौदहापारा थाने में शिकायत दर्ज कराई। मामले की जांच के दौरान छात्रा के सहपाठी डॉ. इक्षित सिंह ने भी उसकी शिकायत को सही बताया। इसके बाद मामले में एफआईआर दर्ज हुई और डॉ. आशीष सिन्हा की गिरफ्तारी की गई।
अब दबाव बनाने का प्रयास:
गिरफ्तारी के बाद डॉ. आशीष सिन्हा जेल गए। जमानत मिलने के बाद उन्हें मेडिकल एजुकेशन डायरेक्टोरेट में अटैच किया गया। दूसरी ओर मामले में गवाही की प्रक्रिया जारी है। डॉ. इक्षित सिंह का नाम भी गवाह के तौर पर बताया जा रहा है।
इसी बीच उनके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई और जांच का आदेश सामने आया। आरोप लगाया जा रहा है कि यह पूरा कदम डॉ. इक्षित सिंह को गवाही से रोकने और आरोपी डॉ. आशीष सिन्हा को राहत पहुंचाने के लिए उठाया गया।
अधिकार से बाहर जाकर आदेश:
कॉलेज स्तर पर हुई जांच के दौरान डॉ. इक्षित सिंह ने आरोप लगाया था कि डॉ. आशीष सिन्हा उन पर दबाव बनाते थे। शिकायतकर्ता छात्रा से दूर रहने की धमकी दिए जाने का भी आरोप लगाया गया। अब शिकायत के पक्ष में गवाही देने वाले छात्र पर ही प्रशासनिक कार्रवाई का दबाव बनने का आरोप है।
कुलसचिव डॉ. दिनेश सिन्हा ने डॉ. इक्षित सिंह को परीक्षा से रोकने का आदेश जारी किया। लेकिन आदेश जारी होने के बाद इसके अधिकार क्षेत्र को लेकर सवाल उठने लगे। मामला सामने आते ही आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पीके पात्रा ने इस आदेश को समाप्त कर दिया।
क्या कह रहे कुलसचिव?
इस पूरे मामले को लेकर ‘द सूत्र’ ने आयुष विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. दिनेश सिन्हा से बात की। उनसे पूछा कि संबंधित आदेश किस आधार पर जारी किया गया? क्या मेडिकल कॉलेज के पीजी छात्रों की परीक्षा रोकने का अधिकार कुलसचिव के पास है?
क्या डॉ. इक्षित सिंह के खिलाफ कार्रवाई का संबंध यौन उत्पीड़न मामले में उनकी गवाही से है? साथ ही यह भी पूछा गया कि क्या आरोपी डॉ. आशीष सिन्हा को बचाने के लिए पद का दुरुपयोग किया गया? इन सवालों पर कुलसचिव ने सिर्फ इतना कहा कि जांच जारी है। रिपोर्ट आने के बाद पूरी जानकारी दी जाएगी।
निष्कर्ष:
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर जांच रिपोर्ट आने तक परीक्षा रोकने का आधार था, तो कुलपति को आदेश खत्म करने की जरूरत क्यों पड़ी? और अगर आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर था, तो इसे जारी ही क्यों किया गया? पूरे मामले में प्रशासनिक कार्रवाई और यौन उत्पीड़न मामले की गवाही के बीच कथित कनेक्शन ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
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